लखनऊ में गोमती नदी का पानी धीरे-धीरे उतर रहा है। फिर भी कई इलाकों में कमर तक पानी भरा हुआ है। यह आलम तब है, जब गोमती नदी खतरे के निशान के नजदीक भी नहीं पहुंची।
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सिंचाई विभाग के मुताबिक, 27 सितंबर को लखनऊ में गोमती का जलस्तर अपने सामान्य स्तर 105.7 मीटर से करीब 1 फीट (42 सेंटीमीटर) ऊपर चला गया था। इसके बाद से ही कई इलाकों में पानी भरने लगा था। हालात ऐसे हुए कि गोमती बैराज के सभी 10 गेट खोलने पड़े।
3 अक्टूबर को नदी का जलस्तर कुछ देर के लिए 108.14 मीटर पहुंच गया। हाल की बाढ़ में यह सबसे ऊंचा स्तर था, लेकिन तब भी नदी खतरे के निशान से करीब डेढ़ मीटर नीचे थी। गोमती 15 अक्टूबर तक इससे भी डेढ़ मीटर नीचे आ चुकी है, फिर भी बाढ़ की स्थिति बनी है।
हैरत की बात है कि जब गोमती खतरे के निशान तक पहुंची ही नहीं, तो लखनऊ में बाढ़ कैसे आ गई? आज इसे ही डिकोड करेंगे यूपी एक्सप्लेनर में…

- गोमती, गंगा-यमुना की तरह पहाड़ी नदी नहीं है। यह यूपी में पीलीभीत जिले के गोमत ताल से निकलती है। गाजीपुर-वाराणसी बॉर्डर पर गंगा में मिल जाती है। 960 किमी के इस सफर में करीब 185 छोटी-बड़ी नदियां गोमती में मिलती हैं। इस तरह गोमती का ‘नदी बेसिन’ 30 हजार वर्ग किमी से ज्यादा का हो जाता है। यानी इतने इलाके में बरसने वाला पानी कई छोटी नदियों के जरिए गोमती में आता है।
- 26 और 27 सितंबर को गोमती के नदी बेसिन वाले इलाके में भीषण बारिश हुई। मौसम विभाग के मुताबिक, शाहजहांपुर में 26 सितंबर को 162.1 mm बारिश हुई। यह उस दिन की औसत बारिश से 100 गुना ज्यादा है।
- पीलीभीत में 27 सितंबर को 56.1 mm बारिश हुई, जबकि सामान्य तौर पर इस दिन सिर्फ 2.2 mm बारिश होती है। लखनऊ में भी सामान्य से करीब 50 गुना ज्यादा बारिश हुई। यह सारा पानी धीरे-धीरे गोमती में इकट्ठा होता गया।
- सिंचाई विभाग के मुताबिक, 27 सितंबर से गोमती का जलस्तर बढ़ने लगा। इसे कम करने के लिए गोमती बैराज के सभी 10 गेट खोल दिए गए। लेकिन, पीछे के जिलों में बरसा पानी गोमती में आता रहा। इससे लखनऊ में गोमती का जलस्तर लगातार बढ़ता रहा। 30 सितंबर तक 2.5 किमी एरिया में करीब 40 हजार घर बाढ़ की चपेट में आ गए।

गोमती नदी पर एक भी बांध नहीं है। इसलिए इसका पानी किसी जलाशय (रिजरवायर) में इकट्ठा करके कंट्रोल नहीं किया जा सकता। डैम क्यों नहीं है, इसके 4 कारण हैं…
1. बांध बनाने के लिए पहाड़ों या ऊंची घाटियों के बीच की जगह की जरूरत होती है। जिससे एक गहरा जलाशय बनाकर पानी रोका जा सके। लेकिन गोमती पहाड़ों से नहीं, बल्कि जमीन से (जल स्रोत- गोमत ताल) निकलती है। वहां से गंगा में मिलते तक के रास्ते में कोई पहाड़ या गहरी खाई नहीं है। इसलिए बांध की दीवार खड़ी करने की कोई प्राकृतिक जगह नहीं है।
2. पहाड़ों से आने वाली नदियां बहुत तेजी से नीचे गिरती हैं। उनके तेज बहाव से बिजली पैदा करने के लिए ही बांध बनाए जाते हैं। वहीं, गोमती बिल्कुल सपाट मैदानी इलाके में बहती है। इस वजह से नदी का बहाव बहुत धीमा है। पानी में रफ्तार न होने की वजह से बांध बनाकर बिजली बनाना भी संभव नहीं है।
3. बांध वहां कामयाब होते हैं, जहां सालभर पानी का फ्लो एक जैसा रहता है। जबकि, गोमती पूरी तरह से जमीन के पानी और मानसूनी बारिश पर निर्भर है। गर्मियों में इसका पानी काफी कम हो जाता है। इसके किनारे बसे शहरों का गंदा पानी और नाले गोमती में गिरते हैं। अगर बांध बनाकर इसके धीमे बहाव को रोका गया, तो नदी एक सड़ते हुए तालाब में बदल जाएगी।
4. मान लीजिए, अगर जबरदस्ती गोमती पर कोई बांध बना दिया जाए, तो क्या होगा? चूंकि आसपास कोई पहाड़ नहीं है, इसलिए जैसे ही पानी रोका जाएगा, वह नदी किनारे बसे गांवों और शहरों की तरफ बढ़ने लगेगा। वे इलाके डूब जाएंगे। इन्हीं वजहों से गोमती पर कोई बांध नहीं है।
तो क्या लखनऊ का ‘गोमती बैराज’ बांध नहीं है…

1980 से 1983 के दौरान लखनऊ में 'गोमती बैराज' बनाया गया था।
नहीं… बैराज, बांध से काफी अलग होता है। इसमें कोई जलाशय नहीं बनाया जाता, बल्कि नदी के बीच में छोटे-छोटे गेट लगा दिए जाते हैं। जिससे जलस्तर थोड़ा-सा उठाकर शहर में पानी सप्लाई किया जा सके। गोमती बैराज भी यही काम करता है। यहां नदी का जलस्तर 105.7 मीटर पर रखा जाता है। यह लखनऊ में गोमती का सामान्य स्तर है।

- यह पहली बार नहीं है, जब लखनऊ में बाढ़ आई हो। जब भी गोमती नदी बेसिन में मूसलाधार पानी बरसा है, लखनऊ में बाढ़ आई है। लेकिन, तब हर बार गोमती ने खतरे के निशान 109.5 मीटर को पार किया है। नदी में पानी की मात्रा भी इस साल के मुकाबले कई गुना ज्यादा रही है।
- लखनऊ में आखिरी बाढ़ साल- 2008 में आई थी। तब गोमती का जलस्तर 109.97 मीटर दर्ज हुआ था। नदी से हर सेकेंड करीब 42 हजार क्यूसेक (पानी का बहाव मापने की इकाई) पानी बहा था। यह 1854 से 2008 तक आई बाढ़ में गोमती का सबसे निचला स्तर था। फिर भी इससे करीब 1 लाख लोग प्रभावित हुए थे और 15 लोगों की जान गई थी।
- इस बार की बात करें, तो 9 अक्टूबर, 2026 को गोमती का पानी 107.32 मीटर के स्तर पर था। सिंचाई विभाग के मुताबिक, इस बार यह नदी का सबसे ऊंचा स्तर है। वहीं, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 3 अक्टूबर को कुछ समय के लिए नदी 108.14 मीटर पर थी। लेकिन, दोनों आंकड़े खतरे के निशान से नीचे हैं।

आंकड़ों के लिहाज से अक्टूबर, 2026 की बाढ़ सबसे कमजोर है। फिर भी करीब 4 लाख लोग बुरी तरह प्रभावित हैं।
- पर्यावरण मामलों पर लिखने वाली न्यूज वेबसाइट ‘डाउन टु अर्थ’ के मुताबिक, लखनऊ में अब तक की सबसे भयानक बाढ़ 1894 में आई थी। उस दौरान गोमती में हर सेकेंड करीब 2 लाख 34 हजार क्यूसेक पानी बह रहा था।
- 1960 में दूसरी सबसे भीषण बाढ़ आई थी। दरअसल, 1923 में आई बाढ़ के बाद गोमती के किनारे कच्चा तटबंध बनाया गया था। 1960 में गोमती का बहाव 1 लाख 25 हजार क्यूसेक तक पहुंच गया था। तटबंध इतने ज्यादा पानी संभाल नहीं सका और 2 जगह से टूट गया।
- इस वजह से पुराने लखनऊ की गलियों में अचानक गले तक पानी भर गया। रेस्क्यू के लिए सेना उतारनी पड़ी। नदी का जलस्तर 113.2 मीटर तक पहुंच गया। शहर में ऐसा कोई सुरक्षित इलाका नहीं बचा था, जहां राहत शिविर लगाया जा सके। तब बड़े इमामबाड़े की छत पर राहत शिविर लगाना पड़ा।
- वरिष्ठ इतिहासकर योगेश प्रवीण ने एक इंटरव्यू में बताया था- तब मेरा घर यहियागंज इलाके में काफी ऊंचाई पर था। रात करीब 9 बजे अचानक लोगों के रोने-चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। पानी इतनी तेजी से घुसा कि देखते ही देखते एक मंजिला घर डूब गए। उस बाढ़ में बड़े से बड़ा अमीर भी फकीर हो गया था।

तस्वीर 1960 में आई बाढ़ की है। पुराने लखनऊ में रूमी दरवाजे के पास गले तक पानी में डूबे लोग नजर आ रहे हैं।
- इसी तरह 1971 में तीसरी सबसे भीषण बाढ़ थी। तब नदी का बहाव करीब 1 लाख 7 हजार क्यूसेक था। बाढ़ का पानी हजरतगंज जैसे पॉश इलाकों तक पहुंच गया था। रेस्क्यू के लिए एक बार फिर सेना उतारी गई। 24 घंटे में 25 हजार से ज्यादा लोगों बचाकर 18 राहत कैंपों में रखा गया था।
- इस बार ऐसी स्थिति नहीं है। गोमती में हर सेकेंड सिर्फ 25 हजार क्यूसेक पानी ही बह रहा है। यह 2008 की बाढ़ का आधा है, फिर भी करीब 4 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। 27 सितंबर को नदी का जलस्तर सिर्फ एक फीट बढ़ने पर ही कॉलोनियों में पानी घुसने लगा था।

- लखनऊ में आई बाढ़ प्राकृतिक नहीं है। बल्कि, नियमों को ताक पर रखकर डूब क्षेत्र में तटबंध, सड़क और रिहायशी इलाके बनाने की वजह से आई है। नियमों के मुताबिक, डूब क्षेत्र में किसी भी तरह का पक्का निर्माण करना अवैध है। जबकि, तमाम रिसर्च पेपर और मीडिया रिपोर्ट्स से साबित होता है कि प्रदेश सरकारें मनमाने तरीके से डूब क्षेत्र का इलाका घटा रही हैं।
- पर्यावरण मामलों की जानकार अमिता भादुड़ी एक लेख में बताती हैं कि साल 2015 में गोमती रिवर फ्रंट बनाने के लिए नियमों में बदलाव करके नदी का डूब क्षेत्र 450 मीटर से घटाकर 240 मीटर कर दिया गया।
- इसके बाद करीब 500 एकड़ जमीन अधिग्रहीत करके पक्का निर्माण किया गया। इतना ही नहीं, नदी की चौड़ाई 250 मीटर से घटाकर 100 से 125 मीटर तक कर दी गई। नदी के 8.1 किमी बहाव क्षेत्र में कंक्रीट की मोटी दीवार बनाकर घुमावदार हिस्सों को सीधा कर दिया गया।
- यह सब कुछ तब हुआ, जब 2013 में हुए सरकारी सर्वे में चेतावनी दी गई कि रिवर फ्रंट बनने से गोमती की बाढ़ का पैटर्न बदला सकता है। डूब क्षेत्र की जरूरत पर अमिता लिखती हैं- नदी का डूब क्षेत्र बेकार पड़ी खाली जमीन नहीं है। ये बाढ़ के दौरान आए अतिरिक्त पानी को इकट्ठा करके ग्राउंड वाटर रिचार्ज करता है और बाढ़ रोकने में मददगार साबित होता है।
- मामला यहीं नहीं रुकता, पर्यावरण पत्रकार जुम्बिश के मुताबिक मौजूदा सरकार ने शहर के भीतर करीब 40 किमी लंबा ग्रीन कॉरिडोर बनाने के लिए डूब क्षेत्र का एरिया और ज्यादा कम कर दिया।

गोमती के किनारे सीधे करके दीवार बनाने और डूब क्षेत्र में पक्का निर्माण करने से नदी के प्राकृतिक स्वरूप पर बुरा असर पड़ा है।
- सिंचाई विभाग ने 3 सितंबर, 2020 को 'गवर्नमेंट ऑर्डर' के जरिए गोमती समेत 12 नदियों का 'नो कंस्ट्रक्शन जोन' घटाकर 50 मीटर कर दिया। जबकि, 18 जून 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने यूपी सरकार को नदी के किनारे से 100 मीटर के दायरे में सभी निर्माण गतिविधियां रोकने का आदेश दिया था।
- वहीं, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में लखनऊ के वकील आलोक सिंह की याचिका के मुताबिक लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) गोमती नदी के किनारे से महज 6 से 20 मीटर की दूरी पर तटबंध, 4 लेन हाईवे और कई ऊंची इमारतें बना रहा है। NGT के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव मामले की सुनवाई कर रहे हैं।
- इतना ही नहीं, 2020 के आदेश से गोमती का 'बारहमासी नदी' (पूरे साल बहने वाली नदी) का दर्जा भी हटा दिया गया। जबकि गोमती से पूरे साल रोजाना करीब 45 करोड़ लीटर पानी लखनऊ शहर में सप्लाई किया जाता है।
- इससे अलावा पहले भी LDA और सिंचाई विभाग नदी के किनारों को समतल करके तटबंध बना चुका है। इससे पानी बहने के कई प्राकृतिक रास्ते बंद हो गए और नदी का स्वरूप बुरी तरह बदल गया। इसी का नतीजा है कि गोमती के जलस्तर में मामूली बढ़ोतरी से ही लखनऊ के कई इलाके डूब गए।
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