Published: Saturday, September 19, 2026, 7:25 [IST]
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए कानून ने भारत और चीन से जुड़े व्यापारिक रिश्तों में टैरिफ का खतरा बढ़ा दिया है। इस कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले बड़े देशों के सामान पर 100% तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का अधिकार दिया गया है। भारत भी संभावित निशाने वाले देशों की सूची में आ सकता है। लेकिन क्या ट्रंप भारत पर वाकई 100% टैरिफ लगाएंगे? इस कानून में क्या लिखा है और इसका भारतीय कारोबार पर क्या असर पड़ सकता है? आइए,समझते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार, 18 सितंबर 2026 को लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट, 2026 (Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act) पर हस्ताक्षर कर दिए। यह कानून रूस और ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों का दायरा बढ़ाता है। साथ ही रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले बड़े देशों पर भारी शुल्क लगाने का रास्ता खोलता है।
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर को इस विधेयक को 262-159 वोटों से मंजूरी दी थी। इससे पहले 7 अगस्त को सीनेट में यह विधेयक 86-11 वोटों से पास हुआ था। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह कानून लागू हो गया है।
इस कानून का नाम दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया है। ग्राहम रूस के खिलाफ सख्त आर्थिक कदमों के समर्थक थे। उन्होंने सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल के साथ मिलकर इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया था। इसकी शुरुआत अप्रैल 2025 में हुई थी। करीब 18 महीने की राजनीतिक प्रक्रिया के बाद यह कानून बना।
भारत और चीन पर 100% टैरिफ का खतरा कितना बड़ा है?
इस कानून की सबसे ज्यादा चर्चा उस प्रावधान को लेकर है, जिसके तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े आयातक देशों के सामान पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिलता है। भारत और चीन रूसी कच्चे तेल के बड़े खरीदार हैं। इसलिए दोनों देशों पर इस प्रावधान का असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
हालांकि यहां एक अहम बात समझना जरूरी है। कानून पास होने का मतलब यह नहीं है कि भारत पर तुरंत 100% टैरिफ लग गया है। इस कानून में राष्ट्रपति को शुल्क लगाने की शक्ति दी गई है, लेकिन इसे लागू करना अनिवार्य नहीं है। टैरिफ की दर भी राष्ट्रपति अपने विवेक से तय करेंगे।
कानून के तहत अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि, विदेश मंत्री और ऊर्जा मंत्री से सलाह लेकर रूस के तेल और गैस के सबसे बड़े खरीदारों की पहचान की जाएगी। यह सूची हर 180 दिन में दोबारा तय की जा सकती है। यानी भविष्य में देशों की सूची बदलने की गुंजाइश भी बनी रहेगी।
रूस से तेल खरीदने पर अमेरिका की सख्ती!
सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने बुधवार को विधेयक पास होने के बाद भारत और चीन को रूस से ऊर्जा खरीद बंद करने का संदेश दिया था। उन्होंने कहा, "चीन और भारत को अपना रवैया बदलना चाहिए। रूस से तेल और गैस खरीदने के बजाय कहीं और से ऊर्जा खरीदिए।"
यह बयान ब्लूमेंथल के सार्वजनिक रुख को दर्शाता है। उनके मुताबिक, रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई को सीमित करना यूक्रेन युद्ध के लिए मॉस्को की आर्थिक क्षमता पर दबाव डालने का एक तरीका है।
कानून में रूस के अधिकारियों, बैंकों और उन नेटवर्क पर भी प्रतिबंधों का प्रावधान है, जो रूसी ऊर्जा कारोबार को आगे बढ़ाने या मौजूदा प्रतिबंधों से बचने में मदद करते हैं। रूस के तथाकथित शैडो फ्लीट यानी प्रतिबंधों से बचकर तेल पहुंचाने वाले टैंकरों को भी निशाना बनाया गया है।
कानून में यूरोप के लिए क्या छूट है?
इस कानून में कुछ यूरोपीय देशों को राहत देने का प्रावधान भी रखा गया है। जिन देशों की रूस से होने वाली प्राकृतिक गैस की खरीद रूस के कुल गैस निर्यात के 15 प्रतिशत से कम है और जो रूसी गैस पर निर्भरता घटाने के लिए ठोस कदम उठा रहे हैं, उन्हें टैरिफ से छूट मिल सकती है।
इसके अलावा, रूस से सीधे आने वाले सामान पर 500% तक शुल्क लगाने का अधिकार भी कानून में शामिल है। राष्ट्रपति अमेरिकी राष्ट्रीय हित का हवाला देकर किसी देश को टैरिफ से अस्थायी छूट दे सकते हैं। किसी देश पर लगे शुल्क को पूरी तरह हटाने के लिए यह प्रमाणित करना होगा कि उसने रूसी ऊर्जा खरीदना बंद कर दिया है और भविष्य में इसे दोबारा शुरू नहीं करने का भरोसा दिया है।
भारत पर टैरिफ लगा तो क्या होगा?
अगर ट्रंप प्रशासन भारत से अमेरिका जाने वाले सामान पर 100% टैरिफ लागू करता है, तो भारतीय निर्यातकों पर दबाव बढ़ सकता है। अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पाद महंगे हो सकते हैं। इससे उन कंपनियों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने की आशंका है, जो अमेरिका को सामान भेजती हैं।
हालांकि वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि शुल्क किन उत्पादों पर लगाया जाता है, इसकी दर कितनी होती है और इसे कब लागू किया जाता है। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत के पूरे निर्यात कारोबार पर कितना असर पड़ेगा।
ईरान पर भी बढ़ेगा अमेरिकी दबाव
इस कानून का दायरा सिर्फ रूस तक सीमित नहीं है। इसके जरिए ईरान पर पहले से लागू प्रतिबंधों को भी आगे बढ़ाया गया है। रूस के ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र के साथ काम करने वाले अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों और दूसरे नेटवर्क पर कार्रवाई का रास्ता खोला गया है।
कानून के पीछे अमेरिकी मकसद रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई पर दबाव डालना और यूक्रेन युद्ध को लेकर मॉस्को पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है। लेकिन भारत के लिए यह कानून एक नई व्यापारिक अनिश्चितता लेकर आया है। ट्रंप के पास अब टैरिफ लगाने का अधिकार है, मगर भारत पर 100% शुल्क लगाने का फैसला अभी हुआ नहीं है।