Time Published: Thursday, September 24, 2026, 7:25 [IST]

एक दशक से भी ज्यादा लंबे इंतजार के बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिकी सरजमीं पर कदम रख चुके हैं। उनके स्वागत के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद जॉइंट बेस एंड्रयूज एयरपोर्ट पहुंचे। यह सामान्य प्रोटोकॉल से अलग कदम था। ट्रंप के साथ फर्स्ट लेडी मेलानिया ट्रंप भी मौजूद थीं। जिनपिंग के साथ उनकी पत्नी पेंग लियुआन अमेरिका पहुंचीं।

सामान्य तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की अगवानी के लिए एयरपोर्ट नहीं जाते। ट्रंप का यह कदम सीधे तौर पर बीजिंग को एक बड़ा सियासी संकेत माना जा रहा है। आज रात व्हाइट हाउस में जिनपिंग के सम्मान में एक भव्य स्टेट डिनर रखा गया है, जिसके बाद दोनों सुपरपावर्स देशों के बीच सीधी बातचीत का दौर शुरू होगा।

Xi Jinping Trump Meeting

आमतौर पर किसी विदेशी राष्ट्रपति के अमेरिका पहुंचने पर अमेरिकी राष्ट्रपति खुद एयरपोर्ट जाकर स्वागत नहीं करते। इस बार ट्रंप ने यह परंपरा बदली। वह व्हाइट हाउस में इंतजार करने के बजाय सीधे जॉइंट बेस एंड्रयूज पहुंचे।

जिनपिंग की यह तीन दिन की स्टेट विजिट है। दोनों देशों के बीच इस समय व्यापार, टैरिफ, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ताइवान, रूस और ईरान जैसे मुद्दों पर खींचतान है। ऐसे माहौल में ट्रंप का खुद एयरपोर्ट पहुंचना इस यात्रा की कूटनीतिक अहमियत को दिखाता है। व्हाइट हाउस के मुताबिक 24 सितंबर को ट्रंप और मेलानिया ट्रंप जिनपिंग और पेंग लियुआन के सम्मान में औपचारिक स्टेट अराइवल सेरेमनी भी करेंगे।

ट्रंप ने प्रोटोकॉल क्यों तोड़ा?

जॉइंट बेस एंड्रयूज एयरपोर्ट पर एयरफोर्स वन से नीचे उतरते ही शी जिनपिंग का रेड कारपेट पर भव्य स्वागत हुआ। इस दौरान मीडिया से बात करते हुए ट्रंप ने कहा,

"चीनी राष्ट्रपति शी के लिए आयोजित स्टेट डिनर में पूरी टेक दुनिया, बैंकिंग सेक्टर और कई बड़े दिग्गज शामिल हो रहे हैं। काश हमारे पास मेहमानों को बैठाने के लिए और सीटें होतीं। यह एक शानदार स्वागत था और मुझे उम्मीद है कि वो इसे पसंद करेंगे। साथ ही उस नए हेलीपैड पर उतरना बहुत अच्छा अनुभव है, जिसे वो दुनिया का सबसे खूबसूरत हेलीपैड मानते हैं।"

ईरान और वैश्विक तनाव पर जब पत्रकारों ने ट्रंप से सवाल किया, तो उन्होंने साफ कहा,

"देखते हैं, मैं ईरान के साथ-साथ कई दूसरे ज्वलंत मुद्दों पर भी जिनपिंग से सीधी बात करूंगा। आज हम दुनिया के सबसे ताकतवर और सम्मानित देश हैं। दो साल पहले लोग हम पर हंसते थे और हमें बेवकूफ समझते थे, लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।"

1 साल में तीसरी मुलाकात का गणित

कूटनीतिक जानकारों की मानें तो जिनपिंग अमेरिका के साथ जारी व्यापारिक और सैन्य तनाव को बेकाबू नहीं होने देना चाहते। यही वजह है कि पिछले एक साल के अंदर दोनों शीर्ष नेताओं की यह तीसरी सीधी मुलाकात है। इससे पहले अक्टूबर 2025 में दक्षिण कोरिया के अंदर दोनों ने द्विपक्षीय वार्ता की थी। इसके बाद मई 2026 में जब ट्रंप चीन पहुंचे थे, तब जिनपिंग ने भी बीजिंग में उन्हें 21 तोपों की सलामी और गार्ड ऑफ ऑनर देकर शाही स्वागत किया था।

साल 2026 के अंत तक दोनों नेताओं की दो और बड़ी मुलाकातें तय मानी जा रही हैं। नवंबर में चीन के शेनझेन शहर में होने वाले APEC समिट और दिसंबर में अमेरिका के मियामी में होने वाले G20 सम्मेलन में दोनों आमने-सामने होंगे। अगर शेनझेन में सहमति बनती है, तो साल 2017 के वियतनाम समिट के बाद पहली बार एक ही मंच पर ट्रंप, जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन एक साथ नजर आ सकते हैं।

टेबल पर 4 सबसे बड़े विवाद

1. ट्रेड और टैरिफ की जंग

दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा सबसे बड़ा सिरदर्द है। पिछले साल ट्रंप के भारी टैरिफ लगाने के बाद चीन ने भी अमेरिकी इंपोर्ट पर तगड़े टैक्स ठोक दिए थे। फिलहाल 30-30 अरब डॉलर के सामान पर टैक्स कटौती को लेकर बातचीत चल रही है। टैरिफ पर लगी मौजूदा रोक की डेडलाइन 10 नवंबर को खत्म हो रही है। ऐसे में दोनों नेता कृषि और एनर्जी सेक्टर में राहत देने वाले नए फार्मूले पर काम कर रहे हैं।

2. AI चिप्स और टेक रेस

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एडवांस माइक्रोचिप्स को लेकर दोनों सुपरपावर्स आमने-सामने हैं। वाशिंगटन को डर है कि उसकी संवेदनशील AI तकनीक का इस्तेमाल चीन अपनी सेना को मजबूत करने में कर सकता है। इसलिए अमेरिका ने एडवांस AI चिप्स के एक्सपोर्ट पर सख्त बैन लगा रखा है। वहीं चीन इसे फ्री ट्रेड के नियमों का उल्लंघन बताता है। न्यूयॉर्क मीटिंग के बाद अब दोनों देश AI सुरक्षा और नेशनल सिक्योरिटी रिस्क पर पहली बार आधिकारिक डेटा शेयरिंग पर राजी हुए हैं।

3. ताइवान का संवेदनशील मुद्दा

चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और किसी भी विदेशी दखल के खिलाफ है। दूसरी तरफ अमेरिका ताइवान को हथियारों की सप्लाई जारी रखकर उसकी सुरक्षा की गारंटी देता नजर आता है। ताइवान दुनिया की सेमीकंडक्टर सप्लाई और समुद्री व्यापार का केंद्र है। ऐसे में शी जिनपिंग की कोशिश अमेरिकी सैन्य मदद को रुकवाने की होगी, जबकि ट्रंप ताइवान के जरिए बीजिंग पर दबाव बनाए रखना चाहते हैं।

4. रूसी तेल पर अमेरिकी दबाव

अमेरिकी संसद ने ट्रंप को अधिकार दिया है कि वे रूस से सस्ता क्रूड ऑयल खरीदने वाले देशों पर 100% तक का पेनल्टी टैरिफ ठोक सकते हैं। चीन इस वक्त रूस से सबसे ज्यादा कच्चा तेल और गैस खरीद रहा है। जिनपिंग साफ कह चुके हैं कि वे अपने बिजनेस में किसी तीसरे देश की दादागिरी बर्दाश्त नहीं करेंगे। ऐसे में एनर्जी ट्रेड पर ट्रंप का रुख इस मीटिंग का सबसे बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।

अमेरिका में विरोध और घरेलू राजनीति

वाशिंगटन में जिनपिंग के इस ग्रैंड वेलकम को लेकर सियासी भूचाल भी आ गया है। सीनेट की आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के चेयरमैन सीनेटर रोजर विकर ने ट्रंप के इस कदम पर सवाल उठाते हुए कहा कि चीन के आक्रामक रवैये और अमेरिकी हितों के खिलाफ काम करने के बावजूद जिनपिंग को व्हाइट हाउस बुलाना गलत फैसला है। विकर के मुताबिक डिनर टेबल पर ट्रंप को चीन के तेजी से बढ़ते सैन्य बजट और ईरान को दिए जा रहे गुप्त समर्थन पर सख्त जवाब मांगना चाहिए।

हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस फैसले का बचाव किया है। उन्होंने मीडिया को बताया कि अमेरिका और चीन दुनिया की दो सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य ताकतें हैं। वैश्विक स्थिरता बनाए रखने के लिए शीर्ष स्तर पर संवाद का दरवाजा खुला रखना बेहद जरूरी है।

भारत पर क्या पड़ेगा असर?

अमेरिका और चीन के बीच अगर कोई बड़ी ट्रेड डील होती है, तो उसका सीधा असर भारतीय बाजार पर दिखेगा। दोनों देशों के बीच टैरिफ कम होने से ग्लोबल सप्लाई चेन का ढांचा फिर से बदल सकता है। इसके अलावा, रूस से तेल खरीद पर अमेरिका की सख्ती भारत के लिए भी मायने रखती है, क्योंकि भारत और चीन दोनों ही बड़े पैमाने पर रूसी तेल के खरीदार हैं।

अगर चीन को राहत मिलती है, तो भारत के लिए भी दबाव कम होगा। AI और सेमीकंडक्टर तकनीक के नए ग्लोबल नियम भारतीय आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए नई चुनौतियां और अवसर पैदा कर सकते हैं।