
कैंसर दवाओं की कीमतों पर SC सख्त Image Credit source: TV9
सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की दवाओं की अधिक कीमत के मुद्दे पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को दो सप्ताह के भीतर अपना लिखित पक्ष (सबमिशन) दाखिल करने का निर्देश दिया. सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों द्वारा कैंसर की दवाओं को उनकी वास्तविक कीमत से दस गुना अधिक दाम पर बेचने पर एतराज जताया.
SC ने कहा कि एक तरह से मरीजों को बुरी तरह लूटा जा रहा है. इसे लेकर SC ने केंद्र सरकार को फटकार भी लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “यह तो दिन-दहाड़े लूट है; क्या सरकार लोगों के लिए है, ये आखिर चल क्या रहा है?” केंद्र सरकार की ओर से पेश हुईं एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सरकार लगातार सुधार और बदलाव कर रही है. कोर्ट ने टिप्पणी की कि ये बदलाव पूरी तरह से मनमाने हैं, क्योंकि ये 11,000 रुपये से लेकर 1,30,000 रुपये तक की कीमतों के अंतर को दूर करने में नाकाम हैं.
ट्रेड मार्जिन 30% तक सीमित
हाल ही में दाखिल एक हलफनामे में, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कैंसर की दवाओं के लिए ‘ट्रेड मार्जिन’ को अब 30% तक सीमित कर दिया गया है. यह स्पष्ट किया गया कि यह 30% की सीमा दवा के ‘मैक्सिमम रिटेल प्राइस’ (MRP) पर लागू होगी, न कि ‘प्राइस टू रिटेलर’ (PTR) पर.
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उदाहरण देकर पूरे मामले को भी समझाया. कोर्ट ने कहा कि कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाला एक इंजेक्शन की कीमत ₹11,000 है, उसे अस्पताल ₹1.10 लाख में बेचते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को यह बताने का निर्देश दिया कि ‘आवश्यक दवाओं’ (essential drugs) को तय करने के लिए क्या मानदंड अपनाए जाते हैं.
दवाओं और उपकरणों की कीमतों में अंतर क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की ओर से पेश हुईं एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी से पूछा कि निजी अस्पतालों में दवाओं और मेडिकल उपकरणों की कीमतों में इतना भारी अंतर क्यों है, और इसका क्या तर्क है? हाल ही में, सरकार ने एक हलफनामे में कीमतों के इस बड़े अंतर को स्वीकार किया था.
बोझ मरीज पर ही पड़ता है: SC
सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि 90% दवाएं ‘ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर’ (DPCO) के दायरे से बाहर हैं. कीमतों में इस भारी अंतर के बावजूद, इन दवा कंपनियों से 8,000 करोड़ रुपये की वसूली अभी भी लंबित है. कोर्ट ने बताया कि हालांकि सरकार ‘आयुष्मान भारत’ जैसी योजनाओं के तहत खर्च की भरपाई करती है, लेकिन इसकी सीमा 5 लाख रुपये तक ही है. अंततः, इसका आर्थिक बोझ मरीज को ही उठाना पड़ता है.

पीयूष पांडे
प्रमुखत: सुप्रीम कोर्ट, वित्त मंत्रालय और भारतीय निर्वाचन आयोग की खबरों की जिम्मेदारी. पत्रकारिता में 22 वर्षों से ज्यादा का अनुभव. हिंदुस्तान, अमर उजाला, दैनिक भास्कर और आज में सेवाएं दीं. खबरिया चैनल और अखबार के अलावा दैनिक भास्कर के डिजिटल प्लेटफॉर्म में जिम्मेदारी निभाई, जबकि ऑल इंडिया रेडियो के आमंत्रण पर कई विशिष्ट जनों के साक्षात्कार किए.
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