Published: Tuesday, October 27, 2026, 23:17 [IST]
Supreme Court on Cancer Drug Prices: कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतों और अस्पतालों की ओर से मरीजों से वसूले जाने वाले शुल्क पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। मंगलवार, 27 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान अदालत ने एक ऐसे मामले का जिक्र किया, जिसमें कैंसर मरीज के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाला इंजेक्शन मेडिकल डिस्ट्रीब्यूटर को ₹11,000 में उपलब्ध था, लेकिन अस्पताल ने उसी इंजेक्शन के लिए ₹1.30 लाख वसूले।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने दवा की कीमत में इतने बड़े अंतर पर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार से पूछा कि आखिर इस अंतर का औचित्य क्या है और अतिरिक्त पैसा कहां जा रहा है। अदालत ने दवाओं पर भारी मार्जिन को लेकर कड़ी टिप्पणी की और कहा कि अस्पतालों को मरीजों से इस तरह की वसूली के बजाय अपनी आय के दूसरे रास्ते तलाशने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कीमतों के इस अंतर को लेकर तीखी टिप्पणी की और कहा कि अस्पताल अपनी परिचालन लागत के नाम पर मरीजों से दवाओं की कीमत से 100 या 200 गुना तक रकम वसूलने को सही नहीं ठहरा सकते। अदालत ने केंद्र से पूछा कि इस अंतर का औचित्य क्या है और पैसा आखिर कहां जा रहा है। पीठ ने पूछा कि जब दवा इतनी कम कीमत पर उपलब्ध हो सकती है, तो मरीज से कई गुना ज्यादा रकम क्यों ली जा रही है? आइए विस्तार से जानते हैं कि मामला क्या है? सुप्रीम कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
अदालत ने कीमत के अंतर पर सवाल उठाए
सुनवाई के दौरान पीठ के सामने एक मेडिकल डिस्ट्रीब्यूटर का मामला रखा गया, जिसकी पत्नी कैंसर का इलाज करा रही थीं। डिस्ट्रीब्यूटर ने बताया कि संबंधित इंजेक्शन उसे करीब 11 हजार रुपये में मिल सकता था। उसने अस्पताल को अपनी खरीद कीमत की जानकारी भी दी, लेकिन आरोप के मुताबिक अस्पताल ने बाहर से खरीदी गई दवा लगाने से इनकार कर दिया और इंजेक्शन के लिए 1.30 लाख रुपये वसूले।
इस पर अदालत ने केंद्र से पूछा कि दवा की कीमत में इतना बड़ा अंतर क्यों है और इसका क्या औचित्य है। पीठ की चिंता सिर्फ एक मरीज के बिल तक सीमित नहीं थी। अदालत यह समझना चाहती थी कि दवाओं की कीमत तय करने और उनकी बिक्री की मौजूदा व्यवस्था मरीजों को अत्यधिक खर्च से बचाने में कितनी प्रभावी है।
केंद्र सरकार ने क्या कहा?
केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि भारत में दवाओं की कीमतें दुनिया के कई देशों की तुलना में कम हैं। उन्होंने पूरे फार्मा क्षेत्र को व्यापक रूप से नियंत्रित करने की जरूरत और उससे जुड़ी चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया।
निजी अस्पतालों ने क्या सफाई दी?
अस्पतालों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि निजी अस्पतालों को चौबीसों घंटे डॉक्टरों, नर्सों, उपकरणों और अन्य जरूरी सुविधाओं की व्यवस्था बनाए रखनी पड़ती है। सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव के कारण निजी अस्पतालों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।
उन्होंने यह चिंता भी जताई कि बाहर से खरीदी गई दवाओं की गुणवत्ता और उनके असली होने की पुष्टि करना अस्पतालों के लिए चुनौती हो सकता है। अस्पतालों को अपनी सप्लाई व्यवस्था और मरीजों को दवाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है।
पीठ ने इन दलीलों के बावजूद स्पष्ट किया कि परिचालन लागत के नाम पर दवाओं की कीमत कई गुना बढ़ाना उचित नहीं ठहराया जा सकता। अस्पतालों को अपनी सेवाओं की लागत वसूलने के वैध तरीके अपनाने चाहिए, न कि दवाओं पर असामान्य मार्जिन के सहारे आय बढ़ानी चाहिए।
अब समझें ₹11 हजार की दवा के लिए ₹1.30 लाख क्यों वसूल रहे अस्पताल?
इस सवाल का जवाब समझने के लिए दवा की खरीद कीमत, सप्लाई चेन में जुड़ने वाले मार्जिन और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत के बीच अंतर समझना जरूरी है।

- निर्माता की कीमत: दवा बनाने वाली कंपनी जिस कीमत पर अपना उत्पाद आगे बेचती है।
- डिस्ट्रीब्यूटर या स्टॉकिस्ट की खरीद कीमत: थोक विक्रेता या अस्पताल जिस कीमत पर दवा खरीदता है।
- अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP): दवा के पैक पर छपी अधिकतम खुदरा कीमत, जिसके अधीन बिक्री और लागू नियमों का पालन किया जाना चाहिए।
- अस्पताल का बिल: मरीज से दवा के लिए वास्तव में वसूली गई रकम। इसमें दवा की बिक्री, अस्पताल की फार्मेसी और बिलिंग व्यवस्था से जुड़े पहलू सामने आ सकते हैं। दवा की कीमत और प्रशासन या अन्य सेवाओं के शुल्क को अलग-अलग समझना जरूरी है।
दवा की खरीद कीमत और MRP में अंतर होना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। निर्माण, भंडारण, परिवहन और वितरण की लागत के साथ कारोबार का मार्जिन भी कीमत का हिस्सा हो सकता है। लेकिन जब अंतर असामान्य रूप से बड़ा हो, तो यह सवाल उठता है कि कीमत किस आधार पर तय की गई और मरीज से वसूली गई रकम का औचित्य क्या है?
सुप्रीम कोर्ट की चिंता इसी बिंदु पर है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में मरीज और उसके परिवार के पास इलाज के दौरान सीमित विकल्प होते हैं। दवा की जरूरत तत्काल हो सकती है और इलाज रोकने का जोखिम भी रहता है। ऐसे में मरीज के लिए सामान्य ग्राहक की तरह अलग-अलग विक्रेताओं से कीमत पूछना या मोलभाव करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए दवाओं की कीमत का सवाल सिर्फ कारोबार या अस्पताल के मुनाफे का नहीं, बल्कि मरीज की इलाज तक पहुंच और आर्थिक सुरक्षा का भी है।
DPCO और NPPA क्या हैं? दवाओं की कीमत कौन नियंत्रित करता है?
भारत में दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 यानी DPCO लागू है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) इसके तहत दवाओं की कीमतों की निगरानी करता है और निर्धारित प्रावधानों के अनुसार कीमतें तय या संशोधित कर सकता है। दवाओं को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में समझा जा सकता है...

- अनुसूचित दवाएं: ऐसी दवाएं जिनकी कीमत पर सरकार लागू नियमों के तहत अधिकतम सीमा यानी सीलिंग प्राइस तय करती है।
- गैर-अनुसूचित दवाएं: ऐसी दवाएं जो संबंधित मूल्य नियंत्रण सूची में शामिल नहीं हैं। इनकी कीमत तय करने की व्यवस्था अलग है। हालांकि, असाधारण परिस्थितियों और सार्वजनिक हित में सरकार को हस्तक्षेप करने का अधिकार है।
यही वजह है कि गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण सुनवाई का एक अहम मुद्दा है। याचिकाकर्ताओं की मांग है कि दवाओं की शुरुआती कीमतों और मेडिकल डिवाइस के मार्जिन को लेकर ज्यादा पारदर्शी और प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए। जेनेरिक दवाओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देना भी इस मामले से जुड़े मुद्दों में शामिल है।
कैंसर की 137 दवाओं पर 30% ट्रेड मार्जिन की सीमा क्या है?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बीच केंद्र सरकार ने कैंसर की 137 गैर-अनुसूचित दवाओं के लिए ट्रेड मार्जिन को 30% तक सीमित करने का फैसला किया है। NPPA ने 17 अक्टूबर 2026 को इस संबंध में अधिसूचना जारी की। संशोधित कीमतें 9 नवंबर 2026 से लागू होनी हैं। सरकार के मुताबिक, इस कदम से संबंधित दवाओं की MRP में उनकी मौजूदा कीमत संरचना के आधार पर 70% तक की कमी आ सकती है। सरकार ने इस पहल का उद्देश्य कैंसर के इलाज की लागत कम करना और दवा की सप्लाई चेन में अत्यधिक मार्जिन पर अंकुश लगाना बताया है। सूची में शामिल दवाओं में ये नाम भी हैं...
- पेम्ब्रोलिजुमैब (Pembrolizumab)
- डुरवालुमैब (Durvalumab)
- ओसिमर्टिनिब (Osimertinib)
- डेनोसुमैब (Denosumab)
- बेवासिजुमैब (Bevacizumab)
इन दवाओं का इस्तेमाल कैंसर के अलग-अलग प्रकारों या उससे जुड़ी चिकित्सकीय स्थितियों के इलाज में किया जाता है। किस मरीज को कौन-सी दवा दी जाएगी, यह बीमारी के प्रकार, उसकी स्थिति और डॉक्टर की सलाह पर निर्भर करता है। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। 30% की सीमा का मतलब यह नहीं है कि हर दवा की मौजूदा MRP में सिर्फ 30% की कटौती होगी। सरकार ने ट्रेड मार्जिन को सीमित किया है। कीमत में वास्तविक कमी संबंधित दवा की मौजूदा कीमत और अधिसूचना में निर्धारित गणना पर निर्भर करेगी।
क्या नई व्यवस्था से अस्पतालों में कैंसर का इलाज सस्ता होगा?
सरकार की नई व्यवस्था का सीधा उद्देश्य सूची में शामिल दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करना है। इसके तहत निर्माताओं को संशोधित कीमतों की जानकारी NPPA को देनी होगी। खुदरा विक्रेताओं और अस्पतालों को भी 9 नवंबर से लागू नई दरों का पालन करना होगा।
हालांकि, इससे पूरे कैंसर उपचार की लागत में कितनी कमी आएगी, यह मरीज की बीमारी, इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं, इलाज की अवधि और अस्पताल में मिलने वाली अन्य सेवाओं पर निर्भर करेगा। दवाओं की कीमत कम होने से राहत मिल सकती है, लेकिन जांच, सर्जरी, रेडिएशन, अस्पताल में भर्ती और अन्य चिकित्सकीय सेवाओं का खर्च अलग हो सकता है।
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या विकल्प हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमतों से जुड़ी याचिकाओं पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब अदालत के अंतिम आदेश का इंतजार है। मामले में प्रमुख सवाल हैं...
- क्या गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमतों के निर्धारण के लिए ज्यादा प्रभावी नियम होने चाहिए?
- क्या जेनेरिक दवाओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए अतिरिक्त निर्देश जरूरी हैं?
- दवाओं और मेडिकल डिवाइस पर अत्यधिक मार्जिन को नियंत्रित करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी होनी चाहिए?
- मरीजों से वसूली जाने वाली दवा की कीमत में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जाए?