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जिले में मानसून की बेरुखी ने रबी सीजन की शुरुआत से पहले ही कृषि और जल प्रबंधन के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। 30 सितंबर तक औसतन 721.9 मिमी बारिश दर्ज हुई है। यह बीते साल की तुलना में करीब 27% कम है। इसका सीधा असर जिले के जलस्रोतों पर पड़ा है। 200 सिंचाई परियोजनाओं में कुल क्षमता का केवल 51 प्रतिशत पानी ही जमा हुआ है। जल संकट के चलते इस बार सिंचाई का रकबा पिछले साल के 94,000 हेक्टेयर से घटकर 55,302 हेक्टेयर रह जाएगा।
ऐसे में जिला प्रशासन और कृषि विभाग ने स्थिति से निपटने के लिए अत्यधिक पानी वाली गेहूं की फसल पर "रेड सिग्नल' लगाते हुए किसानों को कम पानी में पकने वाली दलहन और तिलहन फसलों की ओर रुख करने की सलाह दी है। जिला जल उपयोगिता समिति और जल संसाधन विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, जिले की सभी 200 सिंचाई परियोजनाओं (8 मध्यम+ 192 लघु) में कुल क्षमता (473.270 एमसीएम) का महज 51 प्रतिशत (242.040 एमसीएम) पानी ही उपलब्ध है। बैतूल जिले का सामान्य रबी रकबा 3.30 लाख से 3.72 लाख हेक्टेयर के बीच रहता है। इसमें अकेले गेहूं का हिस्सा 58% से 60% (लगभग 2 लाख हेक्टेयर) होता है।
वर्तमान संकट ने गेहूं- केंद्रित कृषि मॉडल पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। गेहूं को 4 पानी लगते हैं। इसलिए इसकी बोवनी से रोका जा रहा है। चना हर वर्ष 85,000 से 1,00,000 हेक्टेयर के बीच बोया जाता है। इसमें 1 से 2 सिंचाई होती है। एक सिंचाई में भी काम चल सकता है। इस वर्ष चने का रकबा बढ़ेगा। सरसों 18,000 से 25,000 हेक्टेयर में होती है। मसूर 6,000 से 10,000 हेक्टेयर में होती है। ये तीनों सुरक्षित फसलें हैं। कम पानी में हो जाती हैं। कृषि विभाग की सलाह: चना, मसूर लगाएं किसान कृषि विभाग के उपसंचालक रामकिशोर रजक के अनुसार, अल्प वर्षा के इस दौर में किसानों को अपनी फसल रणनीति में तत्काल बदलाव करना होगा।
चना, सरसों, मसूर 1 पानी या ओस में भी पक सकती है। इसलिए इन्हें लगाएं। 7 हजार क्विंटल चना बीज सरकारी योजना से उपलब्ध होगा। रजक का कहना है कि सोयाबीन कटने के कुछ दिन बाद ही चना की बोवनी हो जाएगी। नमी वाले खेत में पलेवा नहीं करना होगा। प्रशासन ने भावी ग्रीष्मकाल में पेयजल संकट की आहट को देखते हुए बाकुड़ (1.2 एमसीएम) और लखापुर (1.2एमसीएम) जलाशयों का पानी पीने के लिए पूरी तरह सुरक्षित कर दिया है। रबी सिंचाई के लिए उपलब्ध कुल 200 में से केवल 74 जलाशय योजनाओं से ही पानी छोड़ा जाएगा। इसमें 1 परियोजना से 5,000 हेक्टेयर में पलेवा । 23 परियोजनाओं से 7,849 हेक्टेयर में पलेवा के लिए पानी । 7 परियोजनाओं से 28,032 हेक्टेयर में पलेवा + 1 पानी छोड़ा जाएगा। वहीं 43 परियोजनाओं से 14,421 हेक्टेयर में पलेवा और 2 बार फसल सिंचाई के लिए ही पानी दिया जाएगा।
इस साल बढ़ेगा चना का रकबा
^बारिश कम होने से जलाशयों में पानी बहुत कम है। ऐसे में हम किसानों से अपील कर रहे हैं कि वे गेहूं के स्थान पर चना, मसूर, सरसों लगाएं। इसी सप्ताह सभी किसान संघों से चर्चा करेंगे। पूरी वस्तुस्थिति सामने रखेंगे। उनकी सलाह भी लेंगे। पेयजल के स्टोरेज के साथ फसलों को भी पानी मिल जाए। इसका प्रबंधन कर रहे हैं। चना, मसूर व सरसों का बीज आसानी से मिल जाए। इसके लिए भी प्रयास कर रहे हैं। - डॉ. सौरभ सोनवणे, कलेक्टर, बैतूल