डिंडौरी का हजारों हेक्टेयर में फैला साल का घना जंगल अगले कुछ महीनों में बदलने वाला है। साल बोरर कीट के प्रकोप के कारण डिंडौरी के पूर्व करंजिया, पश्चिम करंजिया, दक्षिण समनापुर और बजाग वन परिक्षेत्र के करीब 30 हजार हेक्टेयर जंगल में फैले 1.46 लाख से ज्

.

यह जिले के साल वनों का करीब 15 प्रतिशत हिस्सा है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह कीट करीब 30 साल के प्राकृतिक चक्र में बड़े स्तर पर फैलता है। 1996 से 2001 के बीच इसने करीब 3 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 35 लाख पेड़ों को नुकसान पहुंचाया था।

अब डिंडौरी के अलावा मंडला, उमरिया, शहडोल, जबलपुर, अमरकंटक, अनूपपुर और छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों में भी इसका असर देखा जा रहा है।

डिंडौरी में 30 हजार हेक्टेयर जंगल पर लगे साल के वृक्ष काटे जाएंगे।

डिंडौरी में 30 हजार हेक्टेयर जंगल पर लगे साल के वृक्ष काटे जाएंगे।

वन विभाग की देरी से बढ़ा नुकसान- एक्सपर्ट

विशेषज्ञों का कहना है कि साल बोरर का प्रकोप तीन से साढ़े तीन साल पहले शुरू हो गया था, लेकिन वन विभाग को इसकी जानकारी करीब आठ महीने पहले लगी। जबकि जबलपुर स्थित राज्य वन अनुसंधान संस्थान (SFRI) ने करीब 15 साल पहले ही इस खतरे और रोकथाम के उपायों की रिपोर्ट विभाग को भेज दी थी। (दैनिक भास्कर के पास यह रिपोर्ट उपलब्ध है।)

SFRI के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सी. मोहन के अनुसार पिछले साल ज्यादा बारिश से डिंडौरी-अमरकंटक क्षेत्र में नमी बढ़ी, जिससे साल बोरर तेजी से फैला। उनका कहना है कि वन विभाग के फ्रंटलाइन स्टाफ को इस कीट और 'ट्री ट्रैप ऑपरेशन' की पर्याप्त जानकारी नहीं है। इसके लिए प्रशिक्षण का प्रस्ताव भेजा गया है, लेकिन अभी मंजूरी नहीं मिली है।

अभी तक करीब 15 लाख कीड़े इकट्‌ठे किए जा चुके हैं।

अभी तक करीब 15 लाख कीड़े इकट्‌ठे किए जा चुके हैं।

वन विभाग ने 'ऑपरेशन ट्रैप ट्री' अभियान शुरू किया

बढ़ते प्रकोप को देखते हुए वन विभाग ने 'ऑपरेशन ट्रैप ट्री' अभियान शुरू किया है। ग्रामीणों को एक कीड़े का सिर लाने पर 2 रुपए दिए जा रहे हैं। अब तक करीब 15 लाख कीड़े इकट्ठे किए जा चुके हैं और ग्रामीण इससे लाखों रुपए कमा चुके हैं। इसके साथ ही प्रभावित पेड़ों की कटाई की तैयारी भी चल रही है।

पेड़ों की छाल में कीड़ों को फंसाते हैं, फिर पकड़ते हैं ग्रामीण।

पेड़ों की छाल में कीड़ों को फंसाते हैं, फिर पकड़ते हैं ग्रामीण।

दैनिक भास्कर की टीम डिंडौरी के चौरा दादर गांव पहुंची, जहां साल का बड़ा जंगल है। बारिश के चलते जहां तक नजर जाती है हरियाली ही नजर आती है। शहरी इलाके से तापमान भी 3-4 डिग्री कम लग रहा है। हवा की शुद्धता का तो बस अहसास ही किया जा सकता है।

गांव के विष्णु मरावी बताते हैं कि लाखों पेड़ इस कीट से खोखले हो चुके हैं। वे कहते हैं-

QuoteImage

जै कीड़ा नई, कोरोना से खतरनाक बीमारी है। बा में लाखन लोग मरन गए। जा कीड़ा ने लाखन पेड़ मार डाले। हमारे लिए तो ये पेड़ पुरखों की तरह हैं। इन्हीं की छांव में रहकर खेले और बड़े हुए।

QuoteImage

मट्टू मरावी कहते हैं कि कीड़ा चार-पांच साल पहले से दिख रहा था, लेकिन पिछले एक साल में इसकी संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। उनका कहना है कि जंगल ही गांव वालों की आजीविका है, इसलिए पेड़ों की कटाई आने वाली पीढ़ियों के लिए चिंता का विषय है।

साल के पेड़ में करीब 339 तरह के कीट

साल का पेड़ सागौन के बाद सबसे अहम इमारती वृक्ष माना जाता है। इसमें करीब 339 तरह के कीट पाए जाते हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के साल वनों में साल बोरर का प्रकोप होता है।

साल बोरर तने में सुरंग बनाकर अंदर ही अंदर पेड़ को खोखला कर देता है। डॉ. सी. मोहन के अनुसार मानसून के दौरान जब जंगल में 80 प्रतिशत से ज्यादा नमी और 25 से 28 डिग्री सेल्सियस तापमान रहता है, तब इसकी संख्या तेजी से बढ़ती है।

बारिश में पेड़ों पर कुल्हाड़ी या अन्य कारणों से बने घावों से निकलने वाले रस की ओर कीट आकर्षित होते हैं और वहीं अंडे देते हैं। इसलिए पेड़ों को नुकसान पहुंचाने से बचाना जरूरी है।

सड़क किनारे के पेड़ों में ज्यादा नुकसान

डिंडौरी में रिसर्च में यह भी सामने आया कि सड़क किनारे और मानव गतिविधि वाले क्षेत्रों के पेड़ों में नुकसान ज्यादा हुआ है। कई जगह लोग साल के पेड़ों से राल निकालने के लिए तने में घाव करके राल (गोंद, धूप) निकालते हैं। ये मोटी कीमत में बिकती है। पूजा के अलावा इसकी मेडिसिनल वैल्यू भी है। इससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

इमारती पेड़ों को कीड़े खोखले कर रहे हैं।

इमारती पेड़ों को कीड़े खोखले कर रहे हैं।

सिर काटकर माला बनाती हुई नजर आ रही महिला।

सिर काटकर माला बनाती हुई नजर आ रही महिला।

डिंडौरी के 80,263 हेक्टेयर क्षेत्र में साल के जंगल

टीएफआरआई के वैज्ञानिकों के मुताबिक डिंडौरी और अमरकंटक के अलावा छत्तीसगढ़ के चिल्पी, गरियाबंद और नारायणपुर क्षेत्र में इसके फैलने की सूचनाएं हैं। डिंडौरी जिले के 40.45 प्रतिशत क्षेत्र में वन हैं।

इनमें 80,263 हेक्टेयर क्षेत्र में साल के जंगल फैले हैं, जिनमें 76,230.60 हेक्टेयर सघन और 4,032.42 हेक्टेयर विरल वन हैं। डीएफओ अशोक सोलंकी के अनुसार बीते दो सालों में प्रभावित पेड़ों की संख्या तेजी से बढ़ी है।

पिछले साल जहां 5 से 6 हजार पेड़ों पर निशान लगाए गए थे, वहीं अब यह संख्या करीब डेढ़ लाख तक पहुंच गई है। उनके मुताबिक साल बोरर का प्राकृतिक चक्र लगभग 30 साल का होता है। 1997 में भी इसका बड़ा प्रकोप देखा गया था। इसलिए 30 साल बाद 2026–27 में इसके बढ़ने की आशंका है।

ग्रामीणों का कहना है कि उनका जीवन जंगल पर ही निर्भर है, इसके कटने से नुकसान होगा।

ग्रामीणों का कहना है कि उनका जीवन जंगल पर ही निर्भर है, इसके कटने से नुकसान होगा।

30 साल पहले कटे थे 22 लाख से ज्यादा पेड़

सामान्य वन मंडल के एसडीओ एस.के. जाटव के अनुसार 1997-98 में साल बोरर के कारण 1.42 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 22.15 लाख पेड़ काटने पड़े थे। उस समय 1.39 करोड़ कीट नष्ट किए गए थे और ग्रामीणों को प्रति कीट सिर 75 पैसे दिए गए थे।

इस बार भी प्रभावित पेड़ों की कटाई के बाद छोटे पौधों को सुरक्षित रखा जाएगा, लेकिन उन्हें फिर से बड़ा जंगल बनने में 20 से 30 साल लगेंगे। डीएफओ उत्पादन भारती ठाकरे के अनुसार कटाई के लिए केंद्र सरकार से सितंबर के अंत तक अनुमति मिलने की उम्मीद है।

कटाई के बाद लगभग 46,390 घनमीटर इमारती लकड़ी और 43,940 घनमीटर जलाऊ लकड़ी मिलेगी। कटाई और परिवहन पर 8 से 10 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। लकड़ी की नीलामी ई-ऑक्शन के जरिए होगी।

लकड़ी की कीमत 90 हजार रुपए प्रति घनमीटर तक

एक स्वस्थ साल वृक्ष से औसतन 2 से 3 घनमीटर लकड़ी निकलती है। अच्छी गुणवत्ता की इमारती लकड़ी की कीमत करीब 90 हजार रुपए प्रति घनमीटर तक होती है। हालांकि साल बोरर से प्रभावित लकड़ी का मूल्य घटकर लगभग 35 से 40 हजार रुपए प्रति घनमीटर रह जाता है। अनुमान है कि प्रभावित जंगल से कुल लकड़ी का मूल्य करीब 1600 से 1700 करोड़ रुपए तक हो सकता है।

साल बोरर को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता

रिटायर्ड अपर वनमंडल अधिकारी आरएलएस परस्ते का कहना है कि साल बोरर को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन वैज्ञानिक तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। मौजूदा मैकेनिकल ट्रीटमेंट स्थायी समाधान नहीं है। इसके लिए लंबी अवधि की माइक्रो प्लानिंग जरूरी है।

कई प्रभावित पेड़ अब भी जीवित, जिन्हें बचाना संभव

बजाग क्षेत्र के पर्यावरण कार्यकर्ता अरविंद बाबा का कहना है कि कई प्रभावित पेड़ अब भी जीवित हैं और उन्हें बचाया जा सकता है। उनके अनुसार केवल बड़े पैमाने पर पेड़ काटना समाधान नहीं है। जंगल कटने से अतिक्रमण का खतरा बढ़ेगा और वन क्षेत्र को लंबे समय का नुकसान होगा।

साल के जंगल वाले जिलों से मिली रिपोर्ट चिंताजनक

जबलपुर स्थित SFRI के वैज्ञानिक डॉ. सी मोहन के मुताबिक, साल के जंगल वाले जिलों से मिली रिपोर्ट चिंताजनक है। लाखों साल के पेड़ साल बोरर की चपेट में हैं। उन्होंने बताया कि बारिश के दौरान लोग कुल्हाड़ी से पेड़ों पर निशान बनाते हैं। इस पर रोक लगानी होगी।

बरसात में जब साल बोरर के कीड़े बाहर निकलते हैं, तो उन्हें रस की जरूरत होती है। ऐसे में यदि पेड़ पर घाव हो, तो कीड़े उसी जगह से रस चूसते हैं और वहीं अंडे भी दे सकते हैं। इससे संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने बताया कि जंगल में साल बोरर की करीब 5% आबादी हमेशा मौजूद रहती है।

इसका प्रकोप तब बढ़ता है, जब मौसम इसके अनुकूल हो। जंगल में रिलेटिव ह्यूमिडिटी 80% से अधिक होने और तापमान 25 से 28 डिग्री सेल्सियस रहने पर इसकी आबादी तेजी से बढ़ती है। मानसून की पहली बारिश के बाद ऐसे हालात बनते हैं, जिनमें कीड़े मेटिंग करते हैं।

ये खबर भी पढ़ें…

सरकार ने 20 लाख में खरीदे 10-लाख कीड़ों के सिर

मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले में वन विभाग जंगलों को बचाने कीड़ों का सिर कटवा रहा। साल बोरर कीड़े का सिर 2 रुपए में खरीद रहा है। मकसद कीड़ों को खत्म कर साल (सरई) के जंगलों को बचाना है। अब तक करीब 10 लाख कीड़ों के सिर काटे जा चुके हैं। पढ़ें पूरी खबर…