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पंजाब में गिरता भूजल स्तर गंभीर समस्या है। जालंधर के कई इलाकों में स्थिति इतनी चिंताजनक है कि सरकारी ट्यूबवेल 600 से 650 फीट की गहराई तक पहुंच चुके हैं। ऐसे समय में शहर के दो प्रमुख शिव मंदिरों दोमोरिया पुल स्थित प्राचीन शिव मंदिर और पारदेश्वर गौरी शंकर मंदिर ने आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का एक ऐसा प्रैक्टिकल मॉडल पेश किया है, जिससे हर साल लाखों लीटर पानी बचाया जा रहा है।

दोनों मंदिरों ने यह साबित किया है कि अगर नीयत साफ हो, तो धार्मिक परिसरों को 'वॉटर हार्वेस्टिंग और रिसाइक्लिंग हब' में बदला जा सकता है। इन दो शिव मंदिरों का यह प्रयास शहर के बाकी धार्मिक स्थलों, स्कूलों और सोसायटियों के लिए एक नजीर है। अगर हम आज अपने स्तर पर पानी नहीं बचाएंगे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सिर्फ सूखा बचेगा।

मंदिर परिसर और उसके पास बने पार्क का एरिया काफी बड़ा है, जहां मानसून में लाखों लीटर पानी बरस कर बह जाता था। लेकिन अब यही पानी बर्बाद नहीं हो रहा बल्कि भूजल स्तर को बढ़ाने में मददगार साबित हो रहा है। कैसे काम करता है सिस्टम: बारिश के पानी को सहेजने के लिए मंदिर में 120 फीट गहरा रिचार्ज बोरवेल और एक विशेष 'सिल्ट ट्रैप' (फिल्टर टैंक) बनाया गया है।

बारिश का पानी पाइपों के जरिए पहले इस टैंक में आता है, जहां रेत और बजरी की परतों से धूल-मिट्टी छन जाती है। इसके बाद बिल्कुल साफ पानी सीधे जमीन के नीचे (भूजल स्तर) में समाहित हो जाता है। मंदिर प्रबंधन का अनुमान है कि इस तकनीक से हर साल लाखों लीटर वर्षा जल सीधे जमीन के खाते में जमा हो रहा है। ग्राउंड रिपोर्ट : 17 साल की कानूनी लड़ाई... जहां पहले कूड़े के ढेर थे, आज पार्क है दोमोरिया पुल वाले मंदिर की कहानी सिर्फ पानी बचाने की नहीं, बल्कि एक बड़े बदलाव की है।

मंदिर के प्रधान यादव खोसला ने बताया डंपिंग ग्राउंड से पार्क तक: साल 2002 में फ्लाईओवर निर्माण के लिए मंदिर ने अपनी जमीन रेलवे और नगर निगम को दी थी। काम पूरा होने के बाद विभाग ने वहां मलबा छोड़ दिया, जो धीरे-धीरे डंपिंग ग्राउंड बन गया। हालात इतने बदतर थे कि लोग यहां मरे हुए पशु तक दफनाने लगे थे। 2023 में इसकी काया पलट गई। करीब 17 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद मंदिर को यह जमीन वापस मिली।

2023 में यहां पार्क का निर्माण शुरू हुआ। बंजर जमीन को सुधारने के लिए 200 टिप्पर उपजाऊ मिट्टी डाली गई। आज इस पार्क में पीपल, बरगद, नीम, कदंब जैसी आम प्रजातियों के साथ-साथ कल्पवृक्ष, चंदन, पारिजात, सीता अशोक और सिंदूर जैसे दुर्लभ व औषधीय पौधे लहलहा रहे हैं। इसके अलावा, रेलवे ट्रैक के साथ बनाई गई 500 फीट लंबी ग्रीन वॉल (हरित दीवार) ट्रेनों से गुजरने वाले यात्रियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

इस मंदिर में हर दिन सैकड़ों श्रद्धालु जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक करते हैं। मंदिर के प्रधान जतिंदर महाराज ने बताया कि पहले रोजाना 500 लीटर से अधिक जल और दूध नालियों में बहकर बर्बाद हो जाता था। कैसे काम करता है सिस्टम: मंदिर ने एक थ्री-स्टेज फिल्ट्रेशन टैंक बनाया है।

गर्भगृह से निकलने वाला दूध मिश्रित जल सीधे नालियों में जाने के बजाय इस फिल्टर टैंक में आता है। यहां से फिल्टर होने के बाद इस पानी का उपयोग मंदिर के पार्क और औषधीय पौधों को सींचने में किया जा रहा है। वहीं, छत पर गिरने वाले शुद्ध मानसूनी पानी को वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से जोड़ा गया है। बेहतर फिल्ट्रेशन के लिए हर तीन महीने में इस सिस्टम की सफाई की जाती है।