भोपाल24 मिनट पहलेलेखक: भीम सिंह मीणा

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मप्र में जिंदगीभर सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के बाद रिटायर हुए बुजुर्ग शिक्षकों की जमा-पूंजी (ग्रेच्युटी) पर दो विभागों के अफसरों ने रोक लगवा दी। सेवानिवृत्ति के बाद इलाज, बच्चों की शादी और बुढ़ापे के सहारे के लिए मिलने वाली इस वैध राशि को देने से बचने के लिए स्कूल शिक्षा और श्रम विभाग के अफसरों ने मिलकर करीब 530 शिक्षकों की ग्रेच्युटी रोक दी।

जबकि जिलों के सहायक श्रम अधिकारियों ने बुजुर्ग शिक्षकों के हक में उपादान भुगतान अधिनियम 1972 के तहत ग्रेच्युटी देने के करीब 2 हजार आदेश जारी किए थे, लेकिन विभागीय अफसरों ने कानूनी रास्ता अपनाने के बजाय वल्लभ भवन से बैकडोर रास्ता निकाला।

स्कूल​ शिक्षा विभाग ने 530 रिटायर शिक्षकों की सूची तैयार कर सीधे मंत्रालय में श्रम सचिव के पास एकजाई अर्जी लगा दी। इसके बाद श्रम सचिव ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर एक आदेश जारी किया और सभी 530 बुजुर्गों के ग्रेच्युटी भुगतान पर अंतरिम रोक (स्टे) लगा दी। इस मामले में जब स्कूल और श्रम विभाग के अफसरों से बात करनी चाही तो दोनों की तरफ से जवाब नहीं मिले।

पूरे 2,000 आदेशों पर आएगी 150 से 200 करोड़ की देनदारी

क्यों- शिक्षकों के अनुसार, औसतन प्रति शिक्षक 5 से 10 लाख रुपए तक ग्रेच्युटी बनती है। यानी केवल इन 530 मामलों में ही सरकार की 35 से 50 करोड़ रुपए की देनदारी बन रही है। यदि पूरे 2,000 आदेशों की बात करें, तो यह आंकड़ा 150 से 200 करोड़ रुपए बैठता है। इसी वित्तीय भार से बचने के लिए अफसरों ने यह तरीका निकाला।

नियम- उपादान भुगतान अधिनियम 1972 की धारा 7(7) के तहत अपील के लिए कर्मचारी की पूरी राशि ब्याज सहित जमा करना अनिवार्य है। इससे छूट देने का अधिकार केवल उच्च न्यायालय को है। इसके बावजूद श्रम सचिव ने आदेश के पैरा-3 में वित्त विभाग की कथित सहमति दिखाकर बिना राशि जमा किए छूट दे दी।

अपील का अधिकार डीईओ को, अर्जी लगी डीपीआई से कानून के मुताबिक जिस जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) के खिलाफ आदेश हुआ है, वही विधिक अपीलार्थी हो सकता है। अपील भी लेबर कमिश्नर (इंदौर) के समक्ष ही की जा सकती है। लेकिन मूल मामलों में पक्षकार न होने के बावजूद डीपीआई ने मंत्रालय में अपील लगाई। श्रम सचिव ने स्वीकार कर स्टे दे दिया।

हाई कोर्ट में जीत चुके शिक्षकों को भी शामिल किया

श्रम सचिव के आदेश के पैरा-10 में लिखा कि इन 530 मामलों में से कोई भी प्रकरण किसी अन्य फोरम पर लंबित नहीं है। जबकि, सूची में शामिल ग्वालियर के रिटायर शिक्षक शिवनाथ सिंह कुशवाह व अनिल त्रिपाठी के पक्ष में हाई कोर्ट की सिंगल बेंच पहले ही फैसला सुना चुकी है। इसके खिलाफ खुद डीईओ ग्वालियर ने हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच में रिट अपील दाखिल कर रखी है।

अंतिम फैसले के लिए लेबर कमिश्नर को भेजा मामला ग्रेच्युटी एक्ट में लेबर कमिश्नर और शासन दोनों को अपील सुनने का अधिकार है। यहां नियोक्ता स्वयं शासन था, इसलिए वित्त विभाग से समन्वय कर अंतरिम आदेश दिया गया। मामला अंतिम फैसले के लिए लेबर कमिश्नर को भेज दिया है। कोर्ट के आदेश वाले प्रकरणों में संबंधित शिक्षक लेबर कमिश्नर के समक्ष अपने दस्तावेज रख सकते हैं। -रघुराज एमआर, सचिव, श्रम विभाग

हक देना नहीं चाहते

विभाग रिटायर्ड शिक्षकों को उनका हक नहीं देना चाहता। गलत प्लेटफॉर्म पर सुनवाई कर नियम विरुद्ध फैसला सुना दिया गया, ताकि शिक्षकों को राशि न देनी पड़े। -राजेश मिश्रा, सेवानिवृत्त शिक्षक एवं मामले के जानकार

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