भोपाल20 मिनट पहलेलेखक: अनिल गुप्ता

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सरकार ने बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए पोषण आहार सप्लाई का काम निजी कंपनियों को देने की तैयारी कर ली है। महिला स्वसहायता समूहों से यह काम छीनने की वजह करीब 270 करोड़ रुपए का घाटा बताया गया है। लेकिन, भास्कर की पड़ताल बताती है, यह ‘सुनियोजित घाटा’ है।

सात सहकारी प्लांटों में 2018 की तय दर से ही 2026 तक पोषण आहार बनवाया गया। हर साल घाटा बढ़ता गया और जब काम छीनने की वजह पुख्ता हो गई तो इसी घाटे को प्रमुखता से कैबिनेट प्रेसी में दिखाया गया। सूत्रों का कहना है कि 2024-25 और 2025-26 के बीच घाटे की रकम 150 करोड़ बढ़कर दो गुना हो गई।

इसकी भरपाई के लिए दिसंबर 2025 में शासन को प्रस्ताव भी भेजा गया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। बाद में फैसला ले लिया गया कि राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन(एसआरएलएम) से काम लेकर महिला बाल विकास विभाग को दे दिया जाए। पूर्व में महिला बाल विकास ही इसे चला रहा था, तब कैग ने करोड़ों के घोटाले को पकड़ा था।

सरकार के 80 करोड़ डूबे, प्लांट का अब क्या होगा पता नहीं

प्लांट चलाने के लिए अंशपूंजी के तौर पर दो साल के लिए 80 करोड़ दिए गए थे। इसे प्लांटों को लौटाना था। अधिकारियों का कहना है कि जब सरकार पोषण आहार का काम कर रही थी, तो वह अनुदान देकर भी चला सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

प्रत्येक प्लांट बनाने पर 10-12 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। अब इनका क्या होगा, इसका कुछ तय नहीं है। इधर, प्लांट में रखा करीब 20 करोड़ रुपए मूल्य का कच्चा सामान फंस गया है। इसमें अनाज, दालें मसाले आदि शामिल है। वहीं पोषण आहार बनाने वाली अर्द्धशासकीय उपक्रम एमपी एग्रो का बाड़ी प्लांट भी अगस्त 2024 से बंद हो गया।

इस प्लांट में 2021-22 और 2022-23 में ही हर माह 50 लाख रुपए का घाटा हुआ। रैसिपी नहीं बदली गई। उत्पादन महंगा हो गया। अब यह प्लांट बंद है।

अब रेट रिवाइज का प्रस्ताव विभाग ने बीच में बात उठाई थी कि समय पर बजट और पैसा न मिलने के कारण प्लांट संचालन में दिक्कत आ रही है। लेकिन, ध्यान नहीं दिया गया। अब जरूर मप्र सरकार ने केंद्र को प्रस्ताव भेजा है कि ये रेट रिवाइज किए जाएं।

2018 के रेट पर 2026 तक बनवाया राशन, अनुदान भी नहीं दिया

इस तरह बढ़ता गया घाटा गर्भवती एवं धात्री माता के लिए टीएचआर बनाने का बजट रोज प्रति हितग्राही 9.50 रुपए व 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए 8 रुपए था। किशोरियों के लिए रोज 9.50 रुपए मिलते थे। अति गंभीर कुपोषित व अति कम वजन के बच्चों के लिए रोज 12 रु. का प्रावधान है।

जबकि बनाने में खर्च ज्यादा हो रहा था। सप्लायर लगातार कह रहे थे कि कीमत बढ़ गई, उतना पैसा दिया जाए। लेकिन सभी को कहा गया, अभी कच्चा माल दे दो, बाद में पैसा दिलवा देंगे। ये सप्लायर अब कोर्ट चले गए हैं, और इन्हें रकम लौटाने की कवायद चल रही है।

प्रबंधन में भी कुशलता की कमी

  • एसआरएलएम के प्लांटों में प्रतिनियुक्ति पर जनपद सीईओ और तकनीकी स्टाफ रखा गया। इन्हें वेतन सरकार दे सकती थी, लेकिन प्लांटों से पैसा दिया।
  • प्लांट घाटे पर थे, लेकिन जनपद सीईओ अप्रोच लगाकर प्लांटों के सीईओ बने।
  • जरूरत हर माह 9500 से 10 हजार टन की थी। सात प्लांट 15000 टन उत्पादन क्षमता के रहे। दो प्लांटों के उपयोग से बनने वाली चीजों का व्यावसायिक उपयोग किया जा सकता था।
  • पूरे माह की बजाए, जितने दिन जरूरत होती, उतने ही दिन प्लांट और मैनपॉवर काम करता।

आजीविका मिशन के पूर्व सीईओ बोले- रेट रिवाइज हों तो आज भी प्लांट चल सकते हैं

  • एलएम बेलवाल (आईएफएस रहे और 2023 तक सीईओ थे) - उत्पादन की दर को सरकार ने रिवाइज नहीं किया। सहकारी प्लांटों में पोषण आहार बनता है तो क्वालिटी बेहतर होती हैं। ठेकेदार का कमीशन बचता है। आज भी रेट रिवाइज हो जाएं तो प्लांट अच्छे से चल सकते हैं।
  • केदार सिंह (आईएएस) - मैं बस छह माह सीईओ था। मंत्री प्रहलाद पटेल ने कहा था कि प्लांट मुनाफे में लाएं। उसकी तैयारी थी। जरूरत के अलावा मशीनरी से दलिया बनाकर कहीं और दिया जा सकता था। सरकार की कोई चीज घाटे में नहीं जा सकती।
  • दीपक आर्य (आईएएस) - मैं बस डेढ़ माह सीईओ रहा। इन प्लांटों के बारे में क्या बोल पाऊंगा।
  • मनोज पुष्प (आईएएस) और हर्षिका सिंह (आईएएस) : ये दोनों भी पूर्व सीईओ हैं। दोनों ने इस बारे में बोलने से किनारा किया। हर्षिका सिंह के 2024-25 से 2025-26 तक के कार्यकाल में घाटा काफी बढ़ा।

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