परमाणु हथियारों में इस्तेमाल होने वाला मटेरियल दो प्रमुख रूपों में होता है. पहला- हाईली एनरिच्ड यूरेनियम यानी HEU और दूसरा अलग किया गया प्लूटोनियम. अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन और पाकिस्तान ने दोनों तरह की सामग्री तैयार की है, जबकि भारत और इजराइल ने मुख्य रूप से प्लूटोनियम पर भरोसा किया है.
इंटरनेशनल पैनल ऑन फिसाइल मटेरियल (IPFM) के 2025 के अनुमान के मुताबिक, हथियारों के लिए उपलब्ध प्लूटोनियम सबसे ज्यादा रूस के पास करीब 88 टन और अमेरिका के पास 38.4 टन है. फ्रांस के पास करीब 6 टन, ब्रिटेन के पास 3.2 टन और चीन के पास करीब 2.9 टन है. भारत के पास करीब 0.73 टन यानी लगभग 730 किलो हथियार-ग्रेड प्लूटोनियम, पाकिस्तान के पास करीब 0.62 टन और इजराइल के पास करीब 0.87 टन का अनुमान है. उत्तर कोरिया का अनुमान करीब 0.04 टन है.

भारत के पास 225 और हथियार बनाने की क्षमता
अमेरिकी थिंक टैंक फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स (FAS) ने अनुमान जताया है कि भारत के पास 730 किलो प्लूटोनियम है, जिससे लगभग 140 से 225 परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं. इसी रिपोर्ट में भारत का कुल परमाणु हथियार भंडार अधिकतम करीब 190 बताया गया है, जिनमें 160 से ज्यादा हथियार ऑपरेशनल सिस्टम के लिए माने गए हैं.
जापान के 5,500 बम वाली बात कितनी सही?
2024 के अंत में जापान पास करीब 44.4 टन अलग किया हुआ प्लूटोनियम था. लेकिन यह नागरिक परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा प्लूटोनियम है और जापान इसे हथियारों के लिए उपलब्ध सामग्री के तौर पर घोषित नहीं करता. हालांकि चीनी मिलिट्री के एक अखबार ने मार्च 2026 में दावा किया था कि इतने प्लूटोनियम से जापान 5500 न्यूक्लियर बम बना सकता है. IPFM के मुताबिक, जापान दुनिया का सबसे बड़ा गैर-परमाणु हथियार देश है, जिसके पास अलग किया हुआ प्लूटोनियम है.

किन देशों के पास कितने परमाणु हथियार?
SIPRI के जनवरी 2026 के अनुमान के मुताबिक, रूस के पास कुल करीब 5,420 परमाणु हथियार, अमेरिका के पास 5,042, चीन के पास 620, फ्रांस के पास 370, ब्रिटेन के पास 225, भारत के पास 190, पाकिस्तान के पास 170, इजराइल के पास 90 और उत्तर कोरिया के पास करीब 60 हैं. इसलिए इसे सिर्फ प्लूटोनियम से बने हथियारों की संख्या नहीं माना जा सकता.
फिर प्लूटोनियम की ओर इतना ध्यान क्यों?
प्लूटोनियम प्राकृतिक रूप से जमीन से नहीं मिलता. यह मुख्य रूप से परमाणु रिएक्टरों में यूरेनियम ईंधन के इस्तेमाल के दौरान बनता है और इसे अलग करने के लिए इस्तेमाल किए गए ईंधन की री-प्रोसेसिंग करनी पड़ती है. IAEA के मुताबिक अलग किया गया प्लूटोनियम परमाणु ईंधन चक्र में प्रसार के लिहाज से सबसे संवेदनशील गतिविधियों में से एक है. यही इसकी रणनीतिक अहमियत बढ़ाता है. जिन देशों के पास प्लूटोनियम उत्पादन और अलग करने की क्षमता है, वे परमाणु हथियारों के लिए जरूरी सामग्री की दिशा में अहम तकनीकी क्षमता रखते हैं. भारत में भी प्लूटोनियम क्षमता बढ़ने की चर्चा इसलिए अहम है.
फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स (FAS) के मुताबिक, 100 मेगावाट का ध्रुव रिएक्टर भारत में हथियार बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले प्लूटोनियम का प्रमुख सोर्स रहा है. वहीं, 500 मेगावाट का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) अप्रैल 2026 में पहली बार क्रिटिकल हुआ. रिपोर्ट के मुताबिक, अगर PFBR को 80% क्षमता पर चलाया जाए, तो यह र हर साल करीब 140 किलो Pu-239 (प्लूटोनियम-239) पैदा कर सकता है.
यूरेनियम और प्लूटोनियम में क्या अंतर?
यूरेनियम प्राकृतिक तत्व है और इसमें U-235 जैसे फिसाइल आइसोटोप मौजूद होते हैं. हथियारों के संदर्भ में HEU यानी बहुत ज्यादा समृद्ध यूरेनियम अहम है. दूसरी तरफ प्लूटोनियम प्राकृतिक रूप से नहीं मिलता. यह रिएक्टर्स में यह बनता है. परमाणु हथियारों में प्लूटोनियम-239 को यूरेनियम-235 की तुलना में अधिक खतरनाक और विनाशकारी माना जाता है, क्योंकि इसका क्रिटिकल मास (विस्फोट के लिए जरूरी न्यूनतम मात्रा) बहुत कम होता है जिसके कारण बेहद कम मात्रा में भी यह यूरेनियम से कहीं ज्यादा शक्तिशाली विस्फोट कर सकता है. प्लूटोनियम एक मानव-निर्मित तत्व है जो यूरेनियम के मुकाबले अधिक रेडियोएक्टिव और टॉक्सिक होता है, जिससे इसके इस्तेमाल से बने परमाणु बम आकार में छोटे, हल्के लेकिन कई गुना अधिक घातक होते हैं.
हिरोशिमा पर 6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने ‘लिटिल बॉय’ परमाणु बम गिराया. यूरेनियम-235 बम था, जिसकी क्षमता करीब 12.5 से 15 किलोटन TNT और वजन लगभग 4,400 किलो था. विस्फोट के तुरंत बाद करीब 70 हजार से 80 हजार लोग मारे गए. रेडिएशन और गंभीर रूप से झुलसने समेत अन्य प्रभावों से 1945 के अंत तक मृतकों की संख्या करीब 1.40 लाख पहुंच गई.
नागासाकी पर 9 अगस्त 1945 को अमेरिका ने फैट मैन गिराया. यह प्लूटोनियम-239 बम था, जिसकी क्षमता करीब 21 किलोटन TNT और वजनलगभग 4,670 था और यह लिटिल बॉय से आकार और वजन दोनों में बड़ा था. विस्फोट में तुरंत करीब 40 हजार लोग मारे गए, जबकि रेडिएशन और अन्य प्रभावों से 1945 के अंत तक कुल मृतकों की संख्या करीब 74 हजार हो गई. फैट मैन ज्यादा शक्तिशाली था, लेकिन नागासाकी की भौगोलिक स्थिति के कारण तबाही का दायरा हिरोशिमा की तुलना में कम रहा.
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शुभेंदु प्रताप भूमंडल
पत्रकारिता में बीते 5 साल से सक्रिय हैं. नेशनल और इंटरनेशनल न्यूज राइटिंग का अनुभव. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से साइंस में ग्रेजुएशन, फिर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता और वीडियो प्रोडक्शन की पढ़ाई. दैनिक भास्कर डिजिटल से करियर की शुरुआत. बतौर न्यूज ब्रीफ एडिटर भास्कर डिजिटल में 800 से ज्यादा बाइलाइन स्टोरी. वीडियो स्क्रिप्टिंग का भी अनुभव. अगस्त 2025 से टीवी9 डिजिटल के साथ नई पारी का आगाज.
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