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फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो के युवा अधिकारी अंकित शर्मा की बर्बर हत्या के मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने पूर्व आप (AAP) पार्षद ताहिर हुसैन समेत 5 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। यह मामला सिर्फ एक हत्या का नहीं, बल्कि सांप्रदायिक वैमनस्य, उग्र भीड़ की क्रूरता और न्याय की 6 साल लंबी कानूनी प्रक्रिया का एक बड़ा उदाहरण है। इस लेख के माध्यम से पूरे घटनाक्रम और अब तक हुई कार्रवाई को सिलसिलेवार तरीके से समझिए।
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2020 दिल्ली दंगे और ताहिर हुसैन की भूमिका (फोटो: एआई इमेज)
फरवरी 2020 में पूर्वोत्तर दिल्ली जब नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में भड़के दंगों की आग में जल रही थी, तब 25 फरवरी को एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) में बतौर सिक्योरिटी असिस्टेंट तैनात 26 वर्षीय अंकित शर्मा की बेहद क्रूरता से हत्या कर दी गई।
जुलाई 2026 में दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने इस मामले में पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत 5 लोगों को दोषी ठहराते हुए उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। आइए बेहद आसान भाषा में समझते हैं कि उस दिन क्या हुआ था, कोर्ट के फैसले के मायने क्या हैं और यह केस न्याय प्रणाली की दृष्टि से कितना अहम है।
25 फरवरी 2020 को क्या हुआ था? 25 फरवरी की शाम करीब 4 से 5:30 बजे के आसपास चांद बाग पुलिया और खजूरी खास इलाके में भारी हिंसा हो रही थी। प्रत्यक्षदर्शियों और परिजनों के अनुसार, अपने घर लौटे अंकित शर्मा इलाके में दोनों समुदायों के बीच शांति बनाने और हालात का जायजा लेने बाहर निकले थे।इसी दौरान हिंसक भीड़ ने उन्हें घेर लिया। भीड़ उन्हें घसीटते हुए ले गई और उन पर चाकू, धारदार हथियारों और भारी पत्थरों से हमला कर दिया।

अंकित शर्मा के दोषी ताहिर हुसैन को कोर्ट ले जाती पुलिस (Photo:ANI)
कोर्ट में पेश पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक, अंकित के शरीर पर 51 गहरे और घातक घाव पाए गए थे। हत्या के बाद आरोपियों ने सबूत मिटाने के इरादे से उनके शव को पास ही खजूरी खास के नाले में फेंक दिया। 26 फरवरी को जब नाले से अधनग्न हालत में उनका शव बरामद हुआ, तब इस जघन्य वारदात का खुलासा हुआ।
अंकित शर्मा मर्डर केस: घटना से लेकर सजा तक की पूरी टाइमलाइन
23–26 फरवरी 2020
नागरिकता संशोधन कानून (CAA-NRC) के विरोध प्रदर्शनों के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे भड़के, जिनमें कुल 53 लोगों की जान गई।
25 फरवरी 2020
शाम करीब 4:00 से 5:30 बजे के बीच शांति बनाने की कोशिश कर रहे 26 वर्षीय आईबी (IB) अधिकारी अंकित शर्मा को चांद बाग पुलिया के पास हिंसक भीड़ ने घेर लिया, घसीटा और धारदार हथियारों से हमला कर उनकी बर्बर हत्या कर दी।
26 फरवरी 2020
खजूरी खास के नाले से अंकित शर्मा का अधनग्न शव बरामद हुआ। पोस्टमॉर्टम में शरीर पर 51 गहरे और घातक घाव मिले। इसी दिन दयालपुर थाने (Dayalpur PS) में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई, जिसमें अंकित के पिता रविंदर कुमार ने पूर्व आप (AAP) पार्षद ताहिर हुसैन का नाम दिया।
मार्च 2020
हत्या, दंगा भड़काने और उकसाने के मुख्य आरोपी ताहिर हुसैन को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया।
जून 2020
दिल्ली पुलिस ने मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की। इसमें हत्या, किडनैपिंग, दंगा और साजिश की धाराएं जोड़ी गईं और फॉरेंसिक सबूत, गवाहों के बयान, मोबाइल लोकेशन व CDR (कॉल डिटेल रिकॉर्ड) को आधार बनाया गया।
2023
अदालत ने ताहिर हुसैन और अन्य आरोपियों के खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप (Charges Framework) तय किए।
13 जुलाई 2026
कड़कड़डूमा कोर्ट (ASJ प्रवीण सिंह) ने पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत 5 लोगों (ताहिर हुसैन, नाजिम, कासिम, जावेद और अनास) को हत्या (IPC 302), अपहरण (IPC 365), दंगा (IPC 147/148) और धार्मिक दुश्मनी फैलाने (IPC 153A) समेत धारा 149 के तहत दोषी ठहराया। 6 अन्य आरोपियों को बरी कर दिया गया।
31 जुलाई 2026
अदालत ने दोषी पाए गए सभी 5 आरोपियों को उम्रकैद (आजीवन कारावास) की सजा सुनाई। कोर्ट ने माना कि मामला 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए फांसी की जगह आजीवन कारावास दिया गया।
ताहिर हुसैन की क्या भूमिका पाई गई?
ताहिर हुसैन घटना के समय आम आदमी पार्टी (AAP) के स्थानीय पार्षद थे (घटना के तुरंत बाद उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया था)। कोर्ट की जांच और गवाहियों से यह साबित हुआ कि
- ताहिर हुसैन उस हिंसक भीड़ का हिस्सा था और भीड़ को उकसा रहे थे।
- ताहिर हुसैन के मकान का इस्तेमाल दंगे के दौरान पेट्रोल बम, पत्थर और गुलेल चलाने के लिए अड्डे के रूप में किया जा रहा था।
- कोर्ट ने माना कि ताहिर हुसैन के इशारे पर भीड़ ने एक खास मंशा के तहत अंकित शर्मा को निशाना बनाया और उनके साथ क्रूरतम बर्ताव किया।
कोर्ट का फैसला और कानूनी धाराएं
कड़कड़डूमा कोर्ट ने 13 जुलाई 2026 को ताहिर हुसैन, नाजिम, कासिम, जावेद और अनास को दोषी करार दिया था और 31 जुलाई को सजा का ऐलान किया।
किन धाराओं में हुई सजा?
दोषियों को हत्या (IPC 302), अपहरण (IPC 365), दंगा फैलाने (IPC 147/148), धार्मिक दुश्मनी को बढ़ावा देने (IPC 153A) और लोक सेवक के आदेश की अवहेलना (IPC 188) का दोषी पाया गया। ये सभी धाराएं IPC की धारा 149 (समान उद्देश्य से गैर-कानूनी जमावड़ा) के तहत लगाई गईं, जिसका मतलब है कि भीड़ में शामिल हर व्यक्ति उस जघन्य अपराध के लिए समान रूप से जिम्मेदार है।
फांसी क्यों नहीं मिली?
अभियोजन पक्ष (पुलिस) ने दोषियों के लिए मृत्युदंड (फांसी) की मांग की थी और इसे 'अत्यंत बर्बर' बताया था। हालांकि, कोर्ट ने माना कि अपराध भले ही बेहद क्रूर और परेशान करने वाला था, लेकिन यह केस कानून के 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' (दुर्लभ से दुर्लभतम) मापदंड को पूरी तरह से संतुष्ट नहीं करता और दोषियों में सुधार की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता। इसलिए अदालत ने सभी 5 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
क्या साबित नहीं हुआ?
अदालत ने पाया कि हालांकि सीसीटीवी कैमरों को जानबूझकर क्षतिग्रस्त किया गया था, लेकिन पुलिस इस मामले में आपराधिक साजिश (IPC Section 120B) के आरोपों को कोर्ट के सामने पुख्ता सबूतों से साबित नहीं कर सकी। इसलिए साजिश के आरोप हटा दिए गए और मामले को मुख्य रूप से उग्र भीड़ द्वारा अंजाम दी गई हिंसा माना गया।