हमेशा शांति से निपट जाने वाला MLC चुनाव इस बार खासा हंगामेदार रहा। वोटिंग के दिन वाराणसी, गोरखपुर, आगरा, बरेली और मुजफ्फरनगर समेत करीब 25 शहरों में हंगामा और मारपीट हुई। MLC चुनावों के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ।
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आखिर शिक्षक जैसे पढ़े-लिखे वर्ग के इस चुनाव में राजनीति इतनी हावी क्यों रही? इसी की वजह जानेंगे आज यूपी एक्सप्लेनर में…
सवाल 1: इस बार शिक्षक-स्नातक चुनाव में मारपीट क्यों हुई, राजनीति इतनी हावी कैसे?
जवाब: इसकी कई वजहें दिखती हैं…
- अतीत में ये चुनाव मुख्य रूप से गैर-राजनीतिक शिक्षक संगठनों (जैसे शर्मा गुट, चंदेल गुट, ठकुराई गुट) और स्थानीय निर्दलीय बुद्धिजीवियों के इर्द-गिर्द लड़े जाते थे। इनके मुद्दे टीचरों के वेतन, पुरानी पेंशन और एरियर तक सीमित होते थे। लेकिन, समय के साथ-साथ राजनीतिक पार्टियों ने भी इसमें दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी।
- ये चुनाव सीधे पार्टी सिंबल पर नहीं लड़े जाते, लेकिन पार्टियां अपने आधिकारिक उम्मीदवार उतारती हैं। इस बार विधानसभा चुनाव से पहले माहौल बनाने के लिए भाजपा और सपा ने इस चुनाव को नाक की लड़ाई बना लिया।
- मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चुनाव की कमान अपने हाथों में लेते हुए प्रदेशभर में सभाएं कीं। लखनऊ में शिक्षक प्रत्याशी उमेश द्विवेदी और स्नातक प्रत्याशी अवनीश सिंह के लिए शिक्षक-स्नातक मतदाता सम्मेलन किया। इसी तरह गाजियाबाद, गोरखपुर, बरेली, वाराणसी, बलिया और आगरा में विशेष सभाएं और बैठकें करके कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाया। उनके साथ भाजपा का पूरा कैडर नजर आया।
- गोरखपुर और वाराणसी की सीटों पर प्रतिष्ठा की लड़ाई, मुजफ्फरनगर में राज्य मंत्री और दोनों पार्टियों के पदाधिकारियों की बूथ पर मौजूदगी ने जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच आक्रामकता बढ़ा दी। तीखे आरोप-प्रत्यारोप ने तनाव और ज्यादा बढ़ा दिया। आखिर में यह मारपीट और हंगामे की वजह बना।
- MLC चुनाव सपा और भाजपा के लिए यह परखने का मौका है कि उनका जमीनी संगठन और बूथ मैनेजमेंट 2027 के लिए कितना तैयार है। यही वजह रही कि पार्टियों ने विधानसभा चुनाव के सेमीफाइनल के तौर पर इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। इससे अमूमन शांतिपूर्ण रहने वाले चुनाव भी हिंसक और राजनीतिक हो गया।

मुजफ्फरनगर में सपा ने आरोप लगाया कि राज्यमंत्री कपिल देव अग्रवाल कई लोगों के साथ जबरन मतदान केंद्र के अंदर जा रहे थे। इसे लेकर सपा-भाजपा कार्यकर्ताओं में मारपीट हुई।
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सवाल 2: गोरखपुर और वाराणसी सीटें भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल क्यों बनीं?
जवाब: साफ नजर आने वाली वजह है कि ये सीटें सीएम योगी और पीएम मोदी के इलाकों की हैं। यहां हुई किसी भी तरह की चूक सीधे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल खड़ा करेगी। इसके अलावा कुछ और वजहें भी हैं…
- 2020 के चुनाव में वाराणसी की शिक्षक और स्नातक दोनों सीटों पर सपा जीती थीं। पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र की सीटें हारने से भाजपा की बहुत किरकिरी हुई थी। इसके बाद 2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के अजय राय कई राउंड तक पीएम मोदी से आगे रहे। इससे संदेश गया कि सिर्फ भाजपा ही नहीं पीएम मोदी की लोकप्रियता भी घट रही है। लेकिन, भाजपा इस बार कोई गलती करने के मूड में नहीं है।
- गोरखपुर-फैजाबाद सीट पर इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प और व्यक्तिगत हो गया है। यहां भाजपा से टिकट न मिलने पर डॉ. संजयन त्रिपाठी बागी हो गए। अखिलेश ने मौका देखकर अपने घोषित प्रत्याशी कमलेश यादव का टिकट काटकर संजयन को प्रत्याशी बना दिया।
- इसके अलावा भाजपा के एक अन्य नेता अजय सिंह भी टिकट न मिलने से नाराज होकर निर्दलीय मैदान में उतर गए। रही-सही कसर इसी इलाके में स्नातक कोटे से भाजपा MLC देवेंद्र प्रताप सिंह ने पूरी कर दी। पार्टी के एक कार्यक्रम में मंच पर न बैठाए जाने से नाराज होकर भाजपा के अपने प्रत्याशी ध्रुव त्रिपाठी के खिलाफा मोर्चा खोल दिया।
- देवेंद्र ने 19 अक्टूबर को सोशल मीडिया पर खुला पत्र लिखकर ‘अपमान’ के खिलाफ वोट देने की अपील की। इसके बाद वोटिंग से ठीक एक दिन पहले 22 अक्टूबर को वीडियो जारी करके आरोप लगाया कि शिक्षकों को धमकाकर MLC चुनाव में वोट हासिल करने की कोशिश की जा रही है।
- इस वजह से गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन सीट पर मुकाबला 'अपनों की बगावत बनाम पार्टी कैडर' का बन गया। मुख्यमंत्री के क्षेत्र में किसी बागी या विपक्षी उम्मीदवार की आक्रामकता ने भाजपा को बैकफुट पर न जाने देने के लिए आक्रामक होने पर मजबूर किया।
- सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस बार पूर्वांचल के इन दोनों बड़े केंद्रों पर खास रणनीति के तहत फोकस किया था। सपा का मानना है कि अगर वे योगी आदित्यनाथ और पीएम मोदी के राजनीतिक गढ़ों में भाजपा को कड़ी टक्कर देने या हराने में सफल रहते हैं, तो यह 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के आत्मविश्वास को तोड़ने का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक हथियार होगा।
- शॉर्ट में कहें तो गोरखपुर और वाराणसी केवल सीटें नहीं हैं, बल्कि यह सीएम योगी का ‘किला’ और पीएम मोदी का ‘काशी मॉडल’ है। इसी वजह से इन सीटों पर बढ़त भी भाजपा की साख पर बट्टा लगा सकती है। इसके चलते दोनों दलों के लिए यह चुनाव करो या मरो की लड़ाई बन गया।

देवेंद्र प्रताप सिंह ने 19 अक्टूबर को यह खुला पत्र जारी किया था।
सवाल 3: MLC चुनाव को 2027 का सेमीफाइनल क्यों माना जा रहा है?
जवाब: इसकी 3 बड़ी वजहें दिखती हैं…
I) पढ़े-लिखे लोगों का रुझान पता चलेगा: शिक्षक और स्नातक वोटर को समाज का सबसे जागरूक और ओपिनियन मेकर (माहौल बनाने वाला) वर्ग माना जाता है। यह वर्ग सरकारी नीतियों और प्रशासनिक कार्यप्रणाली का सीधा आकलन करता है। 2027 के आम चुनाव से ठीक पहले इस वर्ग का वोटिंग पैटर्न यह दिखाएगा कि प्रदेश का यह तबका किस राजनीतिक धारा के साथ बह रहा है।
II) सपा-भाजपा का आक्रामक आमना-सामना: 2024 लोकसभा चुनाव के बाद यह पहला मौका है, जब भाजपा और सपा आमने-सामने हैं। भाजपा के लिए खुद सीएम योगी ने खुद मोर्चा संभाला। वहीं, सपा ने अपने कैडर को बूथों पर आक्रामक रूप से तैनात किया। दोनों दलों ने इसे प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर 2027 की चुनावी मशीनरी को सक्रिय कर दिया।
III) जमीनी और बूथ स्तर के संगठन का टेस्ट: MLC सीटों का दायरा काफी बड़ा होता है। एक-एक सीट कई जिलों में फैली होती है। इतने बड़े क्षेत्र में अपने वोटरों का रजिस्ट्रेशन कराना, उन्हें बूथ तक लाना और हर बूथ पर मजबूती से टिके रहना, दोनों पार्टियों के संगठनात्मक कैडर की क्षमता का असली टेस्ट है।
हालांकि, यह ध्यान रखना चाहिए कि चुनाव में एक बहुत बड़ी आबादी जैसे ग्रामीण वोटर, किसान, मजदूर, गैर-स्नातक युवा और महिलाएं शामिल नहीं होती हैं। इस चुनाव में उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, उसकी जाति और स्नातक और टीचरों के बीच उसकी पहुंच पार्टी से इतर बड़ा रोल निभाती है। इसलिए, MLC चुनाव की हार-जीत का 2027 विधानसभा चुनाव पर हूबहू असर पड़े, ऐसा जरूरी नहीं है। फिर भी 27 अक्टूबर को आने वाले नतीजों से यूपी की राजनीति को कुछ इशारे जरूर मिलेंगे…
अगर भाजपा जीती
- भाजपा इसे अपनी डबल इंजन सरकार की नीतियों, विकास कार्यों और कानून-व्यवस्था पर पढ़े-लिखे वर्ग की मुहर के रूप में पेश करेगी। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच जाएगा।
- लगातार दो बार सत्ता में रहने के बाद भी अगर भाजपा पढ़े-लिखे लोगों का भरोसा जीतने में कामयाब रहती है, तो संकेत जाएगा कि CJP आंदोलन, वोट चोरी, पेपर लीक जैसे मुद्दों पर विपक्ष का नैरेटिव बेअसर रहा।
अगर सपा जीती
- सपा इसे बेरोजगार युवाओं (ग्रेजुएट) और नौकरीपेशा वर्ग में नाराजगी के तौर पर उछालेगी। नतीजों को यह कहकर प्रचारित किया जाएगा कि यूपी का पढ़ा-लिखा वर्ग बदलाव चाहता है।
- कुल मिलाकर MLC चुनाव के नतीजे भले ही सीधे सरकार नहीं बदलेंगे, लेकिन ये 2027 की राजनीतिक दिशा और हवा का रुख तय कर देंगे। इससे दोनों पार्टियों को अपनी चुनावी रणनीति को आखिरी रूप देने का मौका मिलेगा।

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