सुप्रीम कोर्ट ने 2008 के Entitlement Rules को लेकर केंद्र की दलीलों पर भी विचार किया. अदालत ने कहा कि नियमों में बदलाव के बावजूद दिव्यांगता पेंशन से जुड़ी पुरानी लाभकारी व्यवस्था पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.

Published byJalaj Kumar Mishra

सुप्रीम कोर्ट ने 2008 के Entitlement Rules को लेकर केंद्र की दलीलों पर भी विचार किया. अदालत ने कहा कि नियमों में बदलाव के बावजूद दिव्यांगता पेंशन से जुड़ी पुरानी लाभकारी व्यवस्था पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.

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Supreme Court: (File Photo)

पूर्व सैन्य अधिकारियों को दिव्यांगता पेंशन दिए जाने से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को राहत नहीं दी. जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अलोक अराधे की पीठ ने केंद्र की ओर से दाखिल करीब 271 अपीलों और विशेष अनुमति याचिकाओं को खारिज कर दिया. ये मामले सशस्त्र बल न्यायाधिकरण और अलग-अलग हाईकोर्ट के उन आदेशों से जुड़े थे, जिनमें पूर्व सैन्यकर्मियों को दिव्यांगता पेंशन का लाभ देने के निर्देश दिए गए थे.

मामले की शुरुआत उन पूर्व सैन्य अधिकारियों की शिकायतों से हुई, जिनकी मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में उनकी दिव्यांगता को सैन्य सेवा से जुड़ा या सैन्य सेवा के कारण बढ़ा हुआ नहीं माना गया था. मेडिकल बोर्ड की इस राय के आधार पर उन्हें दिव्यांगता पेंशन का लाभ नहीं मिला. इसके बाद कई अधिकारियों ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण और हाईकोर्ट का रुख किया. इन मंचों से उन्हें राहत मिलने के बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने 2008 के Entitlement Rules को लेकर केंद्र की दलीलों पर भी विचार किया. अदालत ने कहा कि नियमों में बदलाव के बावजूद दिव्यांगता पेंशन से जुड़ी पुरानी लाभकारी व्यवस्था पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. कोर्ट के मुताबिक केवल यह बदलाव कि सैन्य सेवा में प्रवेश के समय व्यक्ति के पूरी तरह स्वस्थ होने की पुरानी धारणा को हटा दिया गया है, अपने आप में पेंशन से जुड़े मूल सिद्धांतों को बदलने के लिए पर्याप्त नहीं है.

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि सामान्य स्थिति में अगर किसी पूर्व सैन्यकर्मी की सेवा के दौरान दिव्यांगता सामने आती है, तो यह साबित करने का भार सेना यानी नियोक्ता पर होगा कि उसकी दिव्यांगता सैन्य सेवा के कारण नहीं हुई और न ही सेवा की वजह से उसकी स्थिति खराब हुई. हालांकि, अदालत ने एक महत्वपूर्ण अपवाद भी बताया. अगर संबंधित व्यक्ति सैन्य सेवा से बाहर होने, रिटायरमेंट या रिलीज के 15 साल या उससे अधिक समय बाद दावा लेकर आता है, तो सबूत का भार दावेदार पर आ सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के महत्व को भी रेखांकित किया. अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में मेडिकल बोर्ड की राय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. लंबित मामलों पर फैसला करते समय संबंधित न्यायाधिकरणों और अदालतों को बोर्ड की राय और उसके पीछे दिए गए कारणों की गंभीरता से जांच करनी होगी.

मौजूदा मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अपीलों में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया. अदालत ने देरी और मामले के गुण-दोष, दोनों आधारों पर अपीलें खारिज कर दीं. पीठ ने इस तरह के मामलों में लगातार चल रही मुकदमेबाजी पर भी चिंता जताई. कोर्ट के सामने रखे आंकड़ों के मुताबिक प्रथम अपीलीय स्तर पर बड़ी संख्या में दावे खारिज हुए थे.

सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में रक्षा मंत्री की विशेषज्ञ समिति की उस सिफारिश का भी उल्लेख किया, जिसमें दिव्यांग सैनिकों से जुड़े इस तरह के लंबित मुकदमों को वापस लेने की बात कही गई थी. अदालत ने कहा कि उस सिफारिश को पूरी तरह लागू नहीं किया गया. इस फैसले से उन पूर्व सैन्यकर्मियों के मामलों पर असर पड़ेगा, जिनकी दिव्यांगता को सैन्य सेवा से असंबंधित मानते हुए पेंशन से वंचित किया गया था और जिन्होंने अदालतों या सशस्त्र बल न्यायाधिकरण के जरिए राहत की मांग की थी.

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