Published: Tuesday, September 8, 2026, 11:28 [IST]
दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत गिरने के बाद अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इमारत क्यों गिरी। बड़ा सवाल यह है कि जिस इमारत में छात्र रह रहे थे, वहां अवैध निर्माण और सुरक्षा से जुड़े सवाल इतने लंबे समय तक कैसे बने रहे? हादसे में 7 लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें 5 छात्र और दो मजदूर शामिल हैं। 12 लोगों को मलबे से बाहर निकाला गया और बचाव अभियान करीब 27-28 घंटे चला। तीन घायलों की हालत गंभीर बताई गई।
पुलिस ने हादसे के बाद प्रॉपर्टी मालिक उर्मिला गुप्ता, उनके पति हरिराम गुप्ता और बेटे महेश गुप्ता को गिरफ्तार किया गया है। नगर निगम (MCD) ने भी तुरंत एक्शन लेते हुए साउथ जोन के डिप्टी कमिश्नर राकेश कुमार समेत 5 अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है। लेकिन सवाल वही है- क्या सिर्फ कुछ अधिकारियों को सस्पेंड कर देने से 7 इंसानी जिंदगियों की भरपाई हो जाएगी? क्या सिस्टम की लापरवाही से होने वाली मौतों का सिलसिला यहीं रुक जाएगा? क्या इससे उस सिस्टम की जिम्मेदारी तय हो गई, जिसने इस इमारत को इतने सालों तक खड़ा रहने दिया?
अफसरों की मेहरबानी या पुरानी आदत?
इस पूरी कार्रवाई में सबसे चौंकाने वाला मोड़ अधिकारियों का ट्रैक रिकॉर्ड है। MCD ने जिन पांच अधिकारियों- राकेश कुमार (डिप्टी कमिश्नर), रणवीर सिंह (सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर), ललित कुमार गोयल (एग्जीक्यूटिव इंजीनियर), सुनील चौहान (असिस्टेंट इंजीनियर) और आशीष कुमार राय (जूनियर इंजीनियर) को सस्पेंड किया है, उनमें से तीन अफसर (राकेश कुमार, रणवीर सिंह और आशीष राय) पहले भी कटघरे में आ चुके हैं।
मालवीय नगर के हौजरानी इलाके में हुए रेस्टोरेंट अग्निकांड के दौरान भी ये तीनों अफसर इसी साउथ जोन में तैनात थे। उस समय बिल्डिंग विभाग के इन अफसरों पर कोई आंच नहीं आई। अब सत्य निकेतन में 7 जानें जाने के बाद इन्हें सस्पेंड कर दिया गया।
फिलहाल IAS अफसर शाश्वत सौरभ को साउथ जोन का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। पर सवाल बना हुआ है कि जांच के नाम पर क्या कुछ महीनों बाद सब ठंडा पड़ जाएगा और ये अफसर फिर कुर्सी पर लौट आएंगे? सोशल मीडिया पर सवाल ये भी उठ रहे हैं कि आखिर इन अफसरों की नौकरी क्यों नहीं जाती है लोगों की जान चली जाए और सजा के तौर पर इन्हें सिर्फ कुछ जिनों का सस्पेंशन मिलता है।
हादसे के बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने मुखर्जी नगर, राजेंद्र नगर, लक्ष्मी नगर, साकेत और सत्य निकेतन जैसे कोचिंग और छात्र इलाकों में चलने वाले सभी पेइंग गेस्ट (PG) हॉस्टलों के स्ट्रक्चरल ऑडिट के आदेश दिए हैं।
दूसरी तरफ MCD ने पूरी दिल्ली में इमारतों के सर्वे का फरमान जारी कर 10 सितंबर तक रिपोर्ट मांगी है। MCD का यह हलफनामा 25 सितंबर को दिल्ली हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई के दौरान दाखिल होगा। हैरान करने वाली बात यह है कि इसी साल की शुरुआत में MCD ने दिल्ली की 27,84,286 इमारतों का सर्वे किया था। उस सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दिल्ली में सिर्फ 19 इमारतें खतरनाक थीं!
शहरी नियोजन विशेषज्ञ (Urban Planning Expert) जगदीश ममगैन के मुताबिक, "दिल्ली के लगभग 75 लाख मकानों में से सिर्फ 1.75 लाख के पास ही पास किया गया बिल्डिंग प्लान है। दिल्ली की पुरानी इमारतें अतिरिक्त मंजिलों का वजन संभालने के लिए नहीं बनी हैं।"

दिल्ली में 3 साल में 1133 इमारत हादसे, कार्रवाई हमेशा हादसे के बाद ही क्यों?
दिल्ली में इमारत गिरने की घटनाओं को लेकर आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। दिल्ली फायर सर्विस के आंकड़ों के मुताबिक, 2022-23 में इमारत गिरने की 349 घटनाएं हुईं। इन हादसों में 43 लोगों की मौत हुई, जबकि 315 लोग घायल हुए। इसके बाद 2023-24 में 371 घटनाएं दर्ज की गईं। इस दौरान 23 लोगों की जान गई और 171 लोग घायल हुए।
वहीं 2024-25 में अप्रैल 2024 से जनवरी 2025 तक के आंकड़ों में ही इमारत गिरने की 413 घटनाएं सामने आ चुकी थीं। इनमें 32 लोगों की मौत हुई और 187 लोग घायल हुए। यानी उपलब्ध आंकड़ों से साफ है कि दिल्ली में इमारत गिरने की घटनाएं लगातार बड़ी संख्या में सामने आ रही हैं।

इस साल भी दक्षिण दिल्ली में इमारत और आग से जुड़ी कई बड़ी घटनाएं हुई हैं। मई में सैदुलाजाब में इमारत गिरने से छह लोगों की मौत हुई थी। जून में हौज रानी के एक बिस्तर और नाश्ता केंद्र में आग से 23 लोगों की जान गई।
उस मामले में एमसीडी ने जांच के बाद एक स्वास्थ्य निरीक्षक की सेवा खत्म की और दक्षिण क्षेत्र के उप स्वास्थ्य अधिकारी को मुख्यालय से जोड़ा था। यानी सवाल किसी एक अधिकारी या एक मकान मालिक तक सीमित नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जो हादसा होने से पहले खतरा पकड़ने के बजाय हादसे के बाद कार्रवाई शुरू करती है।
सत्य निकेतन हादसे उठ रहे इन 5 तीखे सवालों का जवाब कौन देगा?
1. क्या मरम्मत से पहले ढांचे की जांच हुई थी?
हादसे के वक्त बेसमेंट में खुदाई और मरम्मत का काम चल रहा था। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने बताया, "शुरुआती जानकारी के मुताबिक बेसमेंट में खुदाई के दौरान एक पिलर खिसक गया, जिससे पूरी इमारत गिर गई।" स्थानीय लोगों का कहना है कि बेसमेंट में पानी भरने की पुरानी शिकायतें थीं।
पुलिस अब जांच कर रही है कि 50 साल पुरानी जर्जर इमारत में काम शुरू कराने से पहले किसी एक्सपर्ट इंजीनियर से इसकी मजबूती की जांच कराई गई थी या नहीं। ऐसे में सवाल सीधा है, अगर पुरानी इमारत में बेसमेंट पर काम हो रहा था, तो काम शुरू करने से पहले उसकी संरचनात्मक मजबूती की जांच क्यों नहीं हुई?
2. क्या नक्शे के हिसाब से बनी थी इमारत?
पुलिस FIR के मुताबिक, यह ढांचा लगभग 50 साल पुराना था। इसके बावजूद हरिराम गुप्ता और उनके भाई ने नीव कमजोर होने की जानकारी होते हुए भी ऊपर 4 अवैध मंजिलें तान दीं। करीब 55 वर्ग गज के इस प्लॉट पर बेसमेंट और ग्राउंड फ्लोर के अलावा 4 मंजिलें बनी थीं। MCD अधिकारियों के पास इसका कोई पास नक्शा नहीं है।
दिल्ली के मेयर प्रवेश वाही ने कहा, "इमारत बनाने में खराब क्वालिटी का सामान इस्तेमाल हुआ था, जिसकी वजह से वह नए निर्माण का दबाव नहीं झेल सकी।" एक मंजिल के बाद दूसरी मंजिल बनी। बेसमेंट बना। फिर उसे छात्रों के रहने के लिए इस्तेमाल किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में निगम की निगरानी कहां थी?

3. क्या PG चलाने की इजाजत थी?
सत्य निकेतन 1965-70 के बीच पुनर्वास के लिए बसा था। लगभग 300 मकानों वाले इस इलाके के 170 से ज्यादा घरों में बिना बोर्ड लगाए प्राइवेट PG चल रहे हैं। 55 वर्ग गज की इस बिल्डिंग को पिछले साल एक संस्था को लीज पर देकर PG में बदल दिया गया था। नियम कहते हैं कि एक तय सीमा से ज्यादा छात्रों वाले PG के लिए फायर NOC चाहिए, जो इस बिल्डिंग के पास बिल्कुल नहीं थी।
दिल्ली पुलिस यह देख रही है कि इस इमारत को पीजी के तौर पर चलाने की जरूरी अनुमति थी या नहीं। फायर सुरक्षा और भवन के इस्तेमाल से जुड़े नियमों की भी जांच हो रही है। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी हादसे के बाद पीजी और छात्रावासों की सुरक्षा पर सवाल उठाते हुए एमसीडी से भवनों और अनुमति से जुड़ी जानकारी मांगी है। मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर को होनी है।
4. क्या इमरजेंसी से निकलने का रास्ता था?
मंजिला इस इमारत में दर्जनों छात्र रह रहे थे, लेकिन बाहर निकलने के लिए सिर्फ एक ही रास्ता था। कोई इमरजेंसी एग्जिट नहीं था। अगर आग लगती या कोई आपदा आती, तो छात्रों के पास बचने का कोई जरिया नहीं था। सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर मासूमों की जान जोखिम में डाली गई।

5. क्या MCD को अवैध निर्माण नहीं दिखा?
यह शायद पूरे मामले का सबसे असहज सवाल है। एमसीडी के मुताबिक इस साल करीब 27 लाख 84 हजार 286 इमारतों का सर्वे किया गया था। इनमें सिर्फ 19 इमारतों को खतरनाक पाया गया। अधिकारियों के मुताबिक इस तरह के सर्वे में आम तौर पर दरार, झुकी दीवार और बाहर से दिखने वाले दूसरे संकेत देखे जाते हैं। हर इमारत की विस्तृत संरचनात्मक जांच नहीं होती।
अब सत्य निकेतन की घटना के बाद इसी तरीके पर सवाल उठ रहा है। अगर कोई पुरानी इमारत बाहर से ठीक दिख रही हो, लेकिन उसके बेसमेंट में बदलाव हो रहा हो, अतिरिक्त मंजिलें जुड़ गई हों या भार उठाने वाली दीवार में बदलाव किया गया हो, तो सिर्फ बाहरी निरीक्षण से खतरा कैसे पकड़ा जाएगा?
स्थानीय लोग लगातार अवैध निर्माण और पानी भरने की शिकायतें कर रहे थे। इसके बावजूद MCD की टीम सोती रही। जब 50 साल पुरानी बिल्डिंग पर बिना इजाजत 4 मंजिलें खड़ी की जा रही थीं, तब बिल्डिंग डिपार्टमेंट के इंजीनियर कहां थे? क्या अफसरों की सांठगांठ के बिना इतना बड़ा अवैध निर्माण मुमकिन था?

अब पूरी दिल्ली की इमारतों की जांच होगी
सत्य निकेतन हादसे के बाद एमसीडी ने सभी क्षेत्रों के भवन विभाग के कार्यकारी अभियंताओं को अपने इलाके की इमारतों का निरीक्षण कर रिपोर्ट देने को कहा है। यह जानकारी दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल किए जाने वाले हलफनामे में भी शामिल की जानी है।
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने पीजी और छात्र इलाकों पर खास निगरानी के निर्देश दिए हैं। मुखर्जी नगर, राजेंद्र नगर, लक्ष्मी नगर, साकेत और सत्य निकेतन जैसे इलाकों में जांच तेज करने की बात कही गई है। अनधिकृत पांचवीं मंजिल वाले भवनों को सील करने का आदेश भी दिया गया है।
लेकिन असली कसौटी अब यही होगी कि यह अभियान सिर्फ कुछ दिनों की कार्रवाई बनकर रह जाता है या दिल्ली की पुरानी और बदली हुई इमारतों की निगरानी का स्थायी सिस्टम तैयार होता है। क्योंकि सत्य निकेतन का मलबा हट चुका है।
सात जिंदगियां वापस नहीं आ सकतीं। अब जिम्मेदारी सिर्फ यह पता करने की नहीं है कि इमारत किसकी थी। जिम्मेदारी यह भी तय करने की है कि इमारत की हालत, उसका इस्तेमाल और उसमें हुए बदलाव देखने की जिम्मेदारी जिन लोगों की थी, उन्होंने समय रहते क्या किया।