पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने साल 2016 के जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हांसी में हुई मिंटू नामक युवक की हत्या मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट के जस्टिस राजेश भारद्वाज और जस्टिस पूजा चोपड़ा की खंडपीठ ने हिसार सेशन कोर्ट द्वारा तीन आरोपियों को द
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तीनों आरोपियों दलजीत उर्फ सिसाय, पवन उर्फ पोना और सुरेंदर उर्फ ढांडा को ये सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने तीनों को संदेह का लाभ देते हुए बाइज्जत बरी कर दिया है।
कोर्ट ने कहा कि जब सभी चश्मदीद गवाह अदालत में मुकर गए हों, तो सिर्फ संदिग्ध एफएसएल (FSL) रिपोर्ट और पुलिस हिरासत में दिए गए बयानों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
बता दें कि दिलजीत सिहाग फिरौती, लूटपाट, जानलेवा हमला और हत्या प्रयास सहित करीब 61 मुकदमों में वांछित रहा है। हिसार पुलिस ने उसे बीच बाजार बेड़ियां पहनाकर परेड करवाई थी।

पुलिस ने मामले में दलजीत को गिरफ्तार किया था।
पहले जानिए, क्या था पूरा मामला…
आंदोलन के दौरान आगजनी और गोलीबारी, एक की मौत
22-23 फरवरी 2016 को जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हांसी के लालपुरा और ढाणी पाल इलाके में 70-75 लोगों की भीड़ ने उपद्रव मचाया था। इस दौरान आगजनी और अंधाधुंध गोलीबारी हुई थी, जिसमें मिंटू नाम के युवक की गोली लगने से मौत हो गई, जबकि कृष्ण और हरफूल गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
2019 में तीनों आरोपियों को उम्रकैद
मामले में पुलिस ने शिकायतकर्ता राम अवतार के बयान पर केस दर्ज कर दलजीत, पवन और सुरेंदर को गिरफ्तार किया था। जनवरी 2019 में हिसार की सेशन कोर्ट ने तीनों आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

हांसी के गांव सिसाय में दलजीत सिहाग के समर्थन में पंचायत भी हो चुकी है। पत्नी ने समाज से समर्थन मांगा था।
जानिए 4 बड़े कारण, हाईकोर्ट में कैसे पलटा पूरा केस
- सभी पीड़ित और गवाह अदालत में मुकर गए: सुनवाई के दौरान घायलों कृष्ण और हरफूल तथा शिकायतकर्ता राम अवतार ने अदालत में आरोपियों को पहचानने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि हमला करने वाली भीड़ में आरोपी शामिल नहीं थे। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस ने उससे सादे कागजों पर हस्ताक्षर करवा लिए थे।
- 2 साल बाद सप्लीमेंट्री चालान और हथियार की बरामदगी: हाईकोर्ट ने पाया कि मुख्य गवाहों के मुकरने के बाद पुलिस ने दो साल से अधिक की देरी से सप्लीमेंट्री चालान पेश किया। हत्या में इस्तेमाल किए जाने का दावा किया गया .32 बोर का पिस्टल एक अन्य एफआईआर (नंबर 337) में बलवंत उर्फ बल्लू से बरामद हुआ था। बलवंत ने अपने बयान में कहा था कि उसने यह हथियार सोनू गुर्जर से खरीदा था, न कि आरोपी दलजीत से।
- पुलिस हिरासत में दिए बयान की सीमित कानूनी अहमियत: अदालत ने माना कि पुलिस हिरासत में दिए गए डिस्क्लोजर स्टेटमेंट के आधार पर हुई बरामदगी अपने आप में पूर्ण सबूत नहीं हो सकती, खासकर तब, जब स्वतंत्र गवाह मौजूद न हों और मामले में गंभीर खामियां हों।
- अन्य मामलों में पहले ही बरी हो चुके थे आरोपी: आरोपियों की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप सिंह पूनिया ने अदालत में दलील दी कि पवन और सुरेंदर को उन अन्य मामलों में पहले ही बरी किया जा चुका था, जिनके जरिए हथियारों की बरामदगी दिखाई गई थी।
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