पानीपत49 मिनट पहले

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राजबीर का डैथ सर्टिफिकेट दिखाता हुए शिकायतकर्ता जितेंद्र सिंह। इनसेट में मृतक राजबीर की फाइल फोटो। - Dainik Bhaskar

राजबीर का डैथ सर्टिफिकेट दिखाता हुए शिकायतकर्ता जितेंद्र सिंह। इनसेट में मृतक राजबीर की फाइल फोटो।

हरियाणा के पानीपत जिले के गांव नौल्था स्थित अडाणी एग्री लॉजिस्टिक्स कंपनी से जुड़े जमीन धोखाधड़ी मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि पुलिस ने हाईकोर्ट को गुमराह करने और आरोपियों को बचाने के लिए 36 साल पहले (1990) मर चुके एक व्यक्ति के बयान दर्ज कर लिए और उन्हें अदालत में पेश कर दिया।

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान पुलिस ने 3 दिसंबर 2025 को एक जवाब दाखिल किया। पुलिस का दावा था कि उसने विवादित जमीन के आसपास के भू-स्वामियों के बयान दर्ज किए हैं, जिन्होंने शिकायतकर्ता जितेंद्र सिंह के दावों को खारिज किया है। पुलिस द्वारा दर्ज गवाहों की सूची में अजय पुत्र जयपाल, प्रताप पुत्र श्रीचंद, कृष्ण उर्फ अमित और राजबीर पुत्र बारू (निवासी नौल्था) शामिल हैं।

गवाह कंपनी का कर्मचारी निकला

जब याचिकाकर्ता जितेंद्र ने अपने स्तर पर इन गवाहों की पड़ताल की, तो बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ। गवाहों में शामिल अजय अडाणी कंपनी का ही कर्मचारी निकला, जबकि राजबीर पुत्र बारू की मौक साल 1990 में ही हो चुकी थी। यानी पुलिस ने 36 साल पहले मर चुके व्यक्ति को जीवित दिखाकर उसके नाम पर झूठे बयान दर्ज कर कोर्ट में पेश कर दिए।

पुलिस के दस्तावेजों में अदालत द्वारा मौखिक तौर पर भी आदेश देने की बात लिखी गई है, जबकि अदालती कार्यवाही अमूमन लिखित तौर पर ही चलती है।

पुलिस के दस्तावेजों में अदालत द्वारा मौखिक तौर पर भी आदेश देने की बात लिखी गई है, जबकि अदालती कार्यवाही अमूमन लिखित तौर पर ही चलती है।

फरवरी 2023 से लंबित है मामला

अडाणी एग्री लॉजिस्टिक्स कर्मियों और जमीन से जुड़े फर्जीवाड़े को लेकर फरवरी 2023 में एफआईआर (FIR) दर्ज की गई थी। शिकायतकर्ता के अनुसार, एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की और फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया। तफ्तीश आगे न बढ़ने पर जितेंद्र ने 25 अप्रैल 2023 को हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाई कोर्ट की सख्ती के बाद पुलिस ने कोर्ट में पक्ष रखा कि दस्तावेजों के हस्ताक्षरों की फॉरेंसिक (FSL) रिपोर्ट न मिलने के कारण जांच रुकी हुई थी।

FSL रिपोर्ट से खुली फर्जीवाड़े की पोल

4 नवंबर 2025 को आई FSL रिपोर्ट ने जमीन से जुड़े दस्तावेजों और हस्ताक्षरों पर संशय दूर कर दिया। रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि जमीन से जुड़े दस्तावेजों पर किए गए हस्ताक्षर मिसमैच (फर्जी) हैं। इसके बाद 24 नवंबर 2025 को जितेंद्र ने सीएम विंडो पर शिकायत दर्ज कराई कि FSL रिपोर्ट में हस्ताक्षर फर्जी साबित होने के बावजूद पुलिस आरोपियों को गिरफ्तार नहीं कर रही है।

राजबीर पुत्र बारू का डैथ सर्टिफिकेट।

राजबीर पुत्र बारू का डैथ सर्टिफिकेट।

गिरफ्तारी के दावों पर विरोधाभास

सीएम विंडो की सख्ती के बाद पुलिस ने 30 दिसंबर 2025 को जवाब दिया कि मामले के आरोपियों को तफ्तीश में शामिल कर गिरफ्तार किया जा चुका है। हालांकि, याचिकाकर्ता ने पुलिस के इस दावे पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। पुलिस ने कागजों में गिरफ्तार दिखाए गए आरोपियों के नामों का कभी खुलासा नहीं किया।

कोर्ट के ऑनलाइन पोर्टल पर केस नंबर डालने पर भी किसी गिरफ्तारी का रिकॉर्ड नहीं दिखता। निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) में भी पुलिस ने आरोपियों की गिरफ्तारी का कोई रिकॉर्ड पेश नहीं किया।

हाईकोर्ट ने पुलिस से मांगा जवाब

पुलिस द्वारा मृत व्यक्ति के बयान दर्ज करने और जांच में की गई गड़बड़ियों के सभी साक्ष्य जुटाकर जितेंद्र ने 7 जुलाई को हाईकोर्ट में दोबारा अर्जी दाखिल की। 10 अगस्त को मामले पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 17 सितंबर की तारीख तय करते हुए पुलिस प्रशासन से पूरे मामले पर स्पष्ट जवाब तलब किया है।

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