नॉलेज
- Authored by: निशांत तिवारी
- Updated Jul 18, 2026, 04:26 PM IST
वैज्ञानिकों के 37 साल पुराने एक सीक्रेट एक्सपेरिमेंट ने दुनिया को चौंका दिया है। हार्वर्ड फॉरेस्ट में चल रही इस रिसर्च से पता चला है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण मिट्टी में छिपा दशकों पुराना 'सुरक्षित' कार्बन अब खतरनाक गैस बनकर हवा में घुल रहा है, जो तबाही को दोगुना कर सकता है।
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जंगलों की मिट्टी से पता चला खौफनाक सच
Science News: जब भी हम ग्लोबल वार्मिंग या जलवायु परिवर्तन की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान तुरंत आसमान की तरफ जाता है। फैक्ट्रियों से निकलता काला धुआं, गाड़ियों का प्रदूषण या कंक्रीट के जंगल, जिनसे हमारे वायुमंडल का ताप बढ़ से तपता हमारा वायुमंडल। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस जमीन पर हम पैर रखकर खड़े हैं, वहीं एक खतरा बड़ा होता दिख रहा है।मैसाचुसेट्स के 'हार्वर्ड फॉरेस्ट' (Harvard Forest) में पिछले 37 वर्षों से चल रहे दुनिया के सबसे लंबे सॉइल वार्मिंग (मिट्टी को कृत्रिम रूप से गर्म करने) के प्रयोग ने एक ऐसा चौंकाने वाला सच सामने रखा है, जिसने वैज्ञानिकों के पुराने सारे अनुमानों को पलट कर रख दिया है। इस रिसर्च ने साबित कर दिया है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण अब हमारी मिट्टी भी वातावरण में अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ रही है, जो आने वाले समय में विनाश की रफ्तार को कई गुना बढ़ा सकती है।
क्या था यह 37 साल पुराना एक्सपेरिमेंट?
इस ऐतिहासिक रिसर्च के पीछे 'मैरीन बायोलॉजिकल लेबोरेटरी' (Marine Biological Laboratory) के प्रख्यात वैज्ञानिक जेरी मेलिलो (Jerry Melillo) और उनकी टीम का हाथ है। जेरी मेलिलो ने आज से करीब 37 साल पहले यानी 1980 के दशक के उत्तरार्ध में मैसाचुसेट्स के मध्य में स्थित हार्वर्ड फॉरेस्ट के कुछ हिस्सों को चुनकर एक अनोखा प्रयोग शुरू किया था। वैज्ञानिकों ने इन चुनिंदा जमीनी प्लॉट्स की मिट्टी को साल के 365 दिन, चौबीसों घंटे, अपने आस-पास की सामान्य जमीन के तापमान से ठीक 5 डिग्री सेल्सियस (°C) अधिक गर्म रखा।
आखिर 5 डिग्री तापमान ही क्यों चुना गया?
जेरी मेलिलो के अनुसार, जब यह प्रयोग दशकों पहले शुरू हुआ था, तब दुनिया भर के जलवायु मॉडल यह अनुमान लगा रहे थे कि अगर इंसानों ने प्रदूषण कम नहीं किया, तो इस सदी के अंत तक ग्लोबल वार्मिंग के चलते दुनिया का तापमान ऊपरी स्तर पर 5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। वैज्ञानिकों ने इसी 'वर्स्ट केस सिनेरियो' को मानकर मिट्टी को तपाना शुरू किया ताकि यह देखा जा सके कि भविष्य में धरती की मिट्टी इस बढ़े हुए तापमान पर कैसा व्यवहार करेगी।
इस पूरे प्रयोग के केंद्र में हैं मिट्टी के भीतर रहने वाले करोड़ों छोटे-छोटे बैक्टीरिया और फंगस, जिन्हें विज्ञान की भाषा में 'माइक्रोब्स' या सूक्ष्मजीव कहा जाता है। मेलिलो समझाते हैं, ये सूक्ष्मजीव हमारी मिट्टी इकोसिस्टम के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। इनका मुख्य काम पेड़-पौधों के गिरे हुए पत्तों, सूखी लकड़ियों और जैविक पदार्थों को सड़ाकर उन्हें तोड़ना यानी Decompose करना होता है। इस प्रक्रिया से वे पौधों के विकास के लिए जरूरी पोषक तत्वों को रीसायकल करते हैं। लेकिन जैसे-जैसे ग्लोबल वार्मिंग के कारण मिट्टी का तापमान बढ़ रहा है, इन सूक्ष्मजीवों की पूरी दुनिया का संतुलन बिगड़ रहा है। गर्मी की वजह से ये माइक्रोब्स बहुत ज्यादा सक्रिय हो गए हैं और मिट्टी में मौजूद ऑर्गेनिक मैटर को बहुत तेजी से हजम करने लगे हैं। इस तेज मेटाबॉलिज्म का सीधा नतीजा यह हो रहा है कि मिट्टी से कार्बन बहुत तेजी से खत्म हो रहा है और वह गैस बनकर हवा में उड़ रहा है।
टूट गया 'स्थिर कार्बन' का भ्रम
इस 37 साल लंबी रिसर्च का सबसे हैरान करने वाला मोड़ इसके चौथे दशक में आया। दरअसल तक तक दुनिया भर के सॉइल साइंटिस्ट यह मानते आए थे कि मिट्टी में दो तरह का कार्बन होता है, एक 'अस्थिर' (Labile Carbon) जो जल्दी टूट जाता है, और दूसरा 'स्थिर कार्बन' (Stable Soil Carbon) जो मिट्टी की गहराइयों में कसकर बंधा होता है। वैज्ञानिकों को भरोसा था कि तापमान कितना भी बढ़ जाए, यह 'स्थिर कार्बन' सुरक्षित रहेगा और वातावरण में नहीं घुलेगा। लेकिन हार्वर्ड फॉरेस्ट के चौथे दशक के नतीजों ने इस पुरानी धारणा को तोड़ दिया। लगातार मिल रही गर्मी के कारण, अब मिट्टी के सूक्ष्मजीवों ने उस 'स्थिर कार्बन' को भी तोड़ना और सड़ाना शुरू कर दिया है जिसे कभी 'अभेद्य' माना जाता था।
सदियों से जो जंगल वातावरण की कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर उसे जमीन के नीचे सुरक्षित तिजोरी की तरह बंद रखते थे, जिन्हें हम Carbon Sink कहते हैं, वे अब इस बढ़ी हुई गर्मी के कारण खुद कार्बन डाइऑक्साइड उगलने वाले स्रोत बनते जा रहे हैं।
'क्लाइमेट चेंज फीडबैक लूप': एक कभी न रुकने वाला चक्र
इस खोज ने विज्ञान जगत में जिस सबसे बड़े खतरे को जन्म दिया है, उसे 'क्लाइमेट फीडबैक लूप' (Climate Feedback Loop) कहा जाता है। यह एक ऐसा खतरनाक दुष्चक्र है जिसे इस तरह से समझा जा सकता है। पहले इंसानों ने कोयला, तेल जलाकर प्रदूषण बढ़ाया, जिससे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ी। बाद में ग्लोबल वार्मिंग से जंगलों की मिट्टी का तापमान बढ़ा, जिससे माइक्रोब्स अत्यधिक सक्रिय हो गए। इन्हीं माइक्रोब्स ने मिट्टी की गहराइयों में दबे 'स्थिर कार्बन' को तोड़ दिया, जिससे भारी मात्रा में अतिरिक्त CO2 गैस हवा में रिलीज होने लगी। यही अतिरिक्त CO2 यही अतिरिक्त ग्लोबल वार्मिंग को और ज्यादा तेज कर देगी।
कुल जमा बात ये, कि गर्मी ही गर्मी को बढ़ाएगी और यह चक्र इंसानों के नियंत्रण से बाहर हो जाएगा। औद्योगिक क्रांति के बाद से अब तक पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.1 से 1.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। अगर इसे रोकने के लिए तुरंत कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो मिट्टी से निकलने वाली यह अदृश्य गैस तबाही की रफ्तार को दोगुना कर देगी।
आगे बेहतर क्लाइमेट मॉडल की जरूरत
जेरी मेलिलो का कहना है कि भविष्य की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि इंसान अब जीवाश्म ईंधन को जलाने में कितनी कटौती करता है और वनों की कटाई को कितना रोकता है। इस 37 साल लंबी चली रिसर्च का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अब दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों को अपने 'क्लाइमेट प्रेडिक्शन मॉडल्स' में मिट्टी के इस व्यवहार को भी शामिल करना होगा। जब तक हम कंप्यूटर सिमुलेशन में मिट्टी से निकलने वाले इस 'स्थिर कार्बन' के डेटा को नहीं जोड़ेंगे, तब तक हमें भविष्य के संकट की सटीक और मुकम्मल तस्वीर नहीं मिल पाएगी। समय रहते जागना और पृथ्वी की इस ऊपरी परत यानी मिट्टी के स्वास्थ्य को बचाना अब केवल खेती के लिए नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व को बचाने के लिए जरूरी हो गया है।
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निशांत तिवारीauthor
निशांत तिवारी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में कॉपी एडिटर हैं। शहरों से जुड़ी खबरों, स्थानीय मुद्दों और नागरिक सरोकार को समझने की उनकी गहरी दृष्टि उन्हें इस बीट का एक भरोसेमंद और प्रभावी कंटेंट राइटर बनाती है। वे जटिल लोकल इश्यूज को सहज, स्पष्ट और असरदार अंदाज में पेश करने में दक्ष हैं और अबतक 2,000 से अधिक न्यूज रिपोर्ट लिख चुके हैं। उनकी लेखन शैली शहर की नब्ज पकड़ते हुए ऐसे कंटेंट पर केंद्रित रहती है, जो सीधे पाठकों के जीवन और उनकी रोजमर्रा की चिंताओं से जुड़ा होता है।
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