मां बनना किसी भी स्त्री के लिए सबसे बड़ा सुख माना जाता है और इसके लिए पहले शादी करना जरूरी है। अगर कोई महिला शादी के बिना मां बनने की बात करती है, तो समाज उसे अजीब नजरों से देखता है। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। आज कई महिलाएं खुलकर कह रही हैं कि अगर सही जीवनसाथी नहीं मिलता, तो वे मातृत्व (motherhood) का सपना अधूरा नहीं छोड़ेंगी।
हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे में सामने आया कि करीबन 40 प्रतिशत महिलाएं सही पार्टनर का इंतजार करने के बजाय अकेले मां बनना पसंद करेंगी। यह आंकड़ा सिर्फ एक ट्रेंड नहीं, बल्कि महिलाओं की बदलती सोच और प्राथमिकताओं की ओर इशारा करता है। तो चलिए जानते हैं इसके बारे में-
अब महिलाएं सही पार्टनर चाहती हैं
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कुछ समय पहले तक समाज में यह माना जाता था कि एक तय उम्र तक शादी होना जरूरी है। लेकिन आज महिलाएं सिर्फ उम्र निकलने के डर से शादी का समझौता नहीं करना चाहतीं। उनका मानना है कि गलत रिश्ते में पूरी जिंदगी बिताने से बेहतर है सही फैसला लेना। शायद इसलिए अब वे फैमिली प्लानिंग को केवल किसी रिश्ते के बनने पर निर्भर नहीं रखना चाहतीं।
बायोलॉजिकल क्लॉक भी है सबसे बड़ी वजह
बिना शादी के भी मां बनने की इच्छा के पीछे कहीं ना कहीं बायोलॉजिकल क्लॉक भी एक बड़ी वजह है। सही लड़का मिलने का कोई तय समय नहीं होता, लेकिन महिलाओं की प्रजनन क्षमता समय के साथ बदलती है। करीबन 35 वर्ष के बाद प्राकृतिक रूप से गर्भधारण की संभावना धीरे-धीरे कम होने लगती है। साथ ही साथ, गर्भावस्था से जुड़े जोखिम भी बढ़ सकते हैं। सर्वे में कई महिलाओं ने यह बात स्वीकार की कि वे गलत पार्टनर चुनने से ज्यादा, मातृत्व का मौका खोने से डरती हैं।
आर्थिक आत्मनिर्भरता से बदल रही है सोच
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महिलाओं का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना भी कहीं ना कहीं उन्हें अपने फैसले खुद लेने के लिए प्रेरित कर रहा है। जब आर्थिक निर्भरता कम होती है, तो जीवन के बड़े फैसले लेने का आत्मविश्वास भी बढ़ता है।
क्या बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए दो पैरेंट जरूरी हैं?
अक्सर इस बात को लेकर बहस छिड़ जाती है। हालांकि, मनोविज्ञान और बाल विकास पर हुए कई अध्ययनों में पाया गया है कि बच्चे की भावनात्मक सेहत इस बात पर ज्यादा निर्भर करती है कि उसे कैसा माहौल मिलता है। अगर बच्चे को सुरक्षित वातावरण, प्यार, भावनात्मक सहयोग, स्थिर दिनचर्या और जिम्मेदार देखभाल मिले, तो उसका विकास स्वस्थ तरीके से हो सकता है। अध्ययन बताते हैं कि परिवार के सदस्यों की संख्या नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता ज्यादा मायने रखती है।
सिंगल मदर की चुनौतियां भी नहीं हैं कम
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भले ही यह फैसला सुनने में आत्मनिर्भरता से परिपूर्ण नजर आए, लेकिन सिंगल मदर की चुनौतियां कम नहीं होती है। अकेले बच्चे की परवरिश में महिला को आर्थिक जिम्मेदारी, मानसिक दबाव, करियर व बच्चे के बीच संतुलन और कई बार सामाजिक टिप्पणियों का सामना करना पड़ सकता है। इसीलिए विशेषज्ञ यह सलाह देते हैं कि कि सिंगल मदरहुड कोई इमोशनल डिसीजन नहीं, बल्कि लाइफ प्लानिंग का फैसला होना चाहिए।
अगर आप भी इस बारे में सोच रही हैं, तो पहले खुद से ये 5 सवाल पूछें
अगर आप भी सही पार्टनर का इंतजार करने की जगह मातृत्व का सुख भोगना चाहती हैं तो कोई भी कदम आगे बढ़ाने से पहले आपको खुद से कुछ सवाल जरूर पूछने चाहिए। मसलन-
- क्या मैं आर्थिक रूप से तैयार हूं?
- क्या मेरे पास भरोसेमंद सपोर्ट सिस्टम है?
- क्या मैं मानसिक रूप से इस जिम्मेदारी के लिए तैयार हूं?
- क्या मैंने डॉक्टर और कानूनी विशेषज्ञ से सलाह ली है?
- क्या यह फैसला समाज के दबाव में नहीं, बल्कि मेरी अपनी इच्छा से लिया जा रहा है?
क्योंकि एक बच्चे को हमेशा प्यार, सुरक्षा और जिम्मेदार परवरिश की जरूरत होती है।
FAQ
Q.
0% महिलाएं सिंगल मदरहुड क्यों चुन रही हैं?
A.
सर्वे के मुताबिक, सही जीवनसाथी न मिलने, गलत रिश्ते में बंधने के डर, बढ़ती उम्र (बायोलॉजिकल क्लॉक) और आर्थिक आत्मनिर्भरता के कारण 40% महिलाएं अकेले मां बनने का फैसला ले रही हैं।
Q.
बायोलॉजिकल क्लॉक का मां बनने से क्या संबंध है?
A.
महिलाओं में 35 की उम्र के बाद एग्स (Eggs) की क्वालिटी और फर्टिलिटी प्राकृतिक रूप से कम होने लगती है, इसलिए मातृत्व का मौका न खोने के लिए कई महिलाएं जल्द फैसला ले लेती हैं।
Q.
क्या एक सिंगल मदर बच्चे की अच्छी परवरिश कर सकती है?
A.
बिल्कुल। बाल मनोविज्ञान के अनुसार, बच्चे को सही परवरिश के लिए दो पेरेंट्स की नहीं, बल्कि एक सुरक्षित, प्यार भरे और स्थिर वातावरण की जरूरत होती है।