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दैनिक उपयोग से दूर, वर्षों की उपेक्षा और गंदगी के आगोश में दम तोड़ चुकी करीब 400 साल पुरानी ऐतिहासिक कोलुआ-जटपुरा बावड़ी अब पूरी तरह संवर चुकी है। कभी अपनी बदहाली पर आंसू बहाने वाली यह प्राचीन जल संरचना अब जिला प्रशासन, मनरेगा और ग्रामीणों के सामूहिक प्रयासों से क्षेत्र में जल संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत का नया प्रेरणास्रोत बन गई है। यह उपलब्धि सप्ताह की शुरुआत में एक बेहद सकारात्मक और सुकून भरी खबर लेकर आई है। इतिहास के पन्नों समेटे यह बावड़ी लंबे समय से देखरेख के अभाव में टूट-फूट और गंदगी का शिकार थी। इससे न केवल इसकी भव्यता धूमिल हुई थी, बल्कि इसकी जल संचयन क्षमता भी समाप्त प्राय हो गई थी। जल गंगा संवर्धन अभियान 2026 के तहत जिला पंचायत सीईओ ओपी सनोडिया के विशेष निर्देशों पर इस अमूल्य धरोहर को बचाने का बीड़ा उठाया गया। प्रशासन की इच्छाशक्ति और जनसहयोग के मेल से इसके जीर्णोद्धार का कार्य युद्धस्तर पर शुरू किया गया।
कायाकल्प: गांव में जगी जल संरक्षण की अलख इस कायाकल्प का असर केवल एक पुरानी इमारत के संवरने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने पूरे इलाके में जल संरक्षण के प्रति एक नई जन-चेतना जागृत कर दी है। इससे न केवल गांव का जलस्तर बढ़ा बल्कि फसलों की सिंचाई की समस्या भी दूर हुई। यह ऐतिहासिक बावड़ी ग्रामीणों को बारिश के पानी को सहेजने और अपनी पारंपरिक जल धरोहरों को संरक्षित करने का संदेश दे रही है। कोलुआ-जटपुरा के ग्रामीणों और मनरेगा टीम की यह साझेदार कोशिश अब पूरे जिले के लिए एक मिसाल बन गई है, जो यह साबित करती है कि सामूहिक इच्छाशक्ति से सदियों पुरानी पहचान को फिर से जीवंत किया जा सकता है।
इन कार्यों से बदली बावड़ी की सूरत पुनरुद्धार अभियान के दौरान बावड़ी में कई महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार किए गए, जिससे इसे एक नया और आकर्षक स्वरूप मिला। बावड़ी के भीतर जमी वर्षों पुरानी गंदगी को पूरी तरह साफ कर दीवारों व सीढ़ियों पर आकर्षक रंग-रोगन किया गया। जीर्ण-शीर्ण हो चुकी दीवारों और सीढ़ियों की विशेष तकनीक से मरम्मत कर इसे सुरक्षित बनाया गया। इस पूरे अभियान को सफल बनाने में सहायक यंत्री रायचन्द्र अष्टपुत्रे, जनपद पंचायत नटेरन की अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी अर्चना सिंह, सहायक अभियंता पवन शर्मा और स्थानीय ग्राम पंचायत के सरपंच-सचिव की टीम ने मैदानी स्तर पर अहम भूमिका निभाई।