Time Published: Wednesday, September 2, 2026, 14:53 [IST]

सुबह जब गांव के बच्चे अपने बस्ते लेकर स्कूल की ओर निकलते हैं, तो उनके लिए घर से विद्यालय तक का रास्ता रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा होता है। लेकिन बलिया की सात वर्षीय रागिनी राजभर के लिए यही रास्ता हर दिन एक चुनौती लेकर आता है।

घर से करीब 400 मीटर दूर प्राथमिक विद्यालय दिघेड़ा तक पहुंचने के लिए रागिनी एक पैर के सहारे कूदते हुए आगे बढ़ती है। रास्ते में थक जाती है तो कुछ देर बैठकर आराम करती है और फिर स्कूल की ओर चल पड़ती है। एक पैर गंवाने के बावजूद पढ़ाई के लिए उसकी यह कोशिश बताती है कि स्कूल जाने की इच्छा उसके सामने आने वाली मुश्किलों से कहीं बड़ी है।

Ragini Rajbhar

हादसे में गंवाया पैर, लेकिन पढ़ाई की चाह नहीं

रागिनी मनियर ब्लॉक के रानीपुर गांव की रहने वाली है और प्राथमिक विद्यालय दिघेड़ा में कक्षा एक की छात्रा है। बचपन में हुए एक सड़क हादसे में उसका एक पैर गंभीर रूप से घायल हो गया था। परिवार ने इलाज के लिए कई जगह प्रयास किया, लेकिन पैर को बचाया नहीं जा सका।

रागिनी की मां बबीता देवी के मुताबिक, हादसे के समय परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। इलाज का खर्च उठाना भी मुश्किल था। समय बीतने के साथ रागिनी एक पैर के सहारे अपने रोजमर्रा के काम करने लगी, लेकिन स्कूल जाने की चुनौती उसके सामने बनी रही।

दूसरे बच्चों को देखकर उसके मन में भी जगी स्कूल जाने की इच्छा

रागिनी के माता-पिता मजदूरी करते हैं। काम की वजह से वे हर दिन उसे स्कूल छोड़ने नहीं जा सकते थे। ऐसे में कई बार रागिनी घर पर ही रह जाती थी। आसपास के बच्चों को स्कूल जाते देखकर उसके मन में भी पढ़ने और स्कूल जाने की इच्छा होती थी।

जब उसे हर दिन किसी के सहारे स्कूल पहुंचाना संभव नहीं हुआ, तो रागिनी ने खुद ही रास्ता निकाल लिया। अब वह एक पैर से कूदते हुए स्कूल जाती है। करीब 400 मीटर का रास्ता तय करने में उसे सामान्य बच्चों की तुलना में काफी अधिक मेहनत करनी पड़ती है। थकान बढ़ने पर रास्ते में बैठकर कुछ देर आराम करती है और फिर आगे बढ़ती है।

आर्थिक स्थिति के कारण नहीं मिल सका कृत्रिम पैर

रागिनी के पिता देवेंद्र राजभर मजदूरी करते हैं। परिवार की आमदनी सीमित है और इसी में घर का खर्च चलता है। ऐसे में रागिनी के लिए कृत्रिम पैर या उसकी जरूरत के मुताबिक कोई सहायक उपकरण खरीदना परिवार के लिए संभव नहीं हो पाया।

परिवार चाहता है कि रागिनी को ऐसा सहारा मिले जिससे उसे स्कूल आने-जाने में कम परेशानी हो। कृत्रिम अंग या उपयुक्त सहायक उपकरण मिलने से उसके लिए रोज का यह सफर काफी आसान हो सकता है।

प्रधानाध्यापक ने बताई परेशानी

प्राथमिक विद्यालय दिघेड़ा के प्रधानाध्यापक अजीत पाल के मुताबिक, रागिनी कक्षा एक की छात्रा है और पढ़ाई में रुचि रखती है। एक पैर न होने के कारण उसे विद्यालय आने-जाने में काफी परेशानी होती है। विद्यालय की ओर से भी संबंधित विभाग के अधिकारियों से उसे आवश्यक सहायता दिलाने का प्रयास किया जा रहा है।

बीएसए ने लिया संज्ञान, छात्रवृत्ति और कृत्रिम अंग का भरोसा

रागिनी की स्थिति की जानकारी सामने आने के बाद बेसिक शिक्षा अधिकारी मनीष कुमार सिंह ने मामले का संज्ञान लिया है। उन्होंने रागिनी को कृत्रिम अंग उपलब्ध कराने के साथ प्रतिमाह 2,000 रुपये की छात्रवृत्ति दिलाने का भरोसा दिया है।

सरकारी मदद का यह भरोसा रागिनी के परिवार के लिए राहत की उम्मीद लेकर आया है। हालांकि, उनके लिए असली बदलाव तब होगा जब यह सहायता वास्तव में उसे मिल पाएगी और स्कूल तक पहुंचने में उसकी मुश्किल कम होगी।

स्कूल तक पहुंचना भी शिक्षा का हिस्सा

रागिनी की कहानी यह याद दिलाती है कि किसी बच्चे के लिए शिक्षा का मतलब सिर्फ स्कूल में दाखिला मिल जाना नहीं है। स्कूल तक पहुंचने के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। खासकर दिव्यांग बच्चों के लिए सहायक उपकरण और सुगम आवागमन उनकी पढ़ाई को नियमित रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।

फिलहाल रागिनी अपने एक पैर के सहारे रोज 400 मीटर का रास्ता तय कर रही है। हर दिन की यह छोटी-सी यात्रा उसके लिए मेहनत मांगती है, लेकिन स्कूल पहुंचने की उसकी इच्छा कायम है। अब इंतजार इस बात का है कि मदद का जो भरोसा दिया गया है, वह जल्द हकीकत बने, ताकि रागिनी को पढ़ने के लिए हर दिन इतनी बड़ी बाधा पार न करनी पड़े।