अमेरिका में महंगाई अब सिर्फ किराने के सामान या ईंधन तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका सबसे गहरा असर अब हेल्थकेयर सेक्टर पर पड़ता दिख रहा है. एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों की जेब पर हेल्थ इंश्योरेंस और इलाज का बोझ लगातार बढ़ रहा है. साल 2026 में एक औसत कर्मचारी को अपनी हेल्थकेयर जरूरतों पर करीब 5,297 डॉलर यानी लगभग 5.07 लाख रुपये खर्च करने होंगे. सबसे चिंता की बात यह है कि यह सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा. एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि 2027 में एम्प्लॉयर हेल्थ कॉस्ट में करीब 9.5% की और बढ़ोतरी होगी, जिससे प्रति कर्मचारी खर्च 19,000 डॉलर यानी करीब 18.18 लाख रुपये के पार पहुंच जाएगा. यह लगातार चौथा साल होगा जब हेल्थकेयर खर्च में करीब डबल डिजिट ग्रोथ देखने को मिलेगी. इससे साफ है कि अमेरिका में हेल्थकेयर की महंगाई अब एक बड़ी और लगातार बनी रहने वाली समस्या बनती जा रही है.

कंपनियों पर भी बढ़ रहा बोझ

सिर्फ कर्मचारी ही नहीं, बल्कि उन्हें नौकरी देने वाली कंपनियां भी इस महंगाई की चपेट में हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में एम्प्लॉयर यानी नियोक्ताओं का औसत खर्च 8.8% बढ़कर 14,432 डॉलर प्रति कर्मचारी हो जाएगा, जो भारतीय करेंसी में करीब 13.81 लाख रुपये है. वहीं अगर पूरे हेल्थ इंश्योरेंस प्लान की कॉस्ट देखें, तो यह 8.3% बढ़कर 17,562 डॉलर यानी करीब 16.81 लाख रुपये तक पहुंच जाएगी. यानी कंपनियों को कर्मचारियों को हेल्थ सुविधा देने के लिए हर साल पहले से ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है और आने वाले सालों में यह बोझ और बढ़ सकता है.

Kharch Badha

दूसरी तरफ, कर्मचारियों की अपनी जेब से होने वाली पेमेंट भी कम नहीं है. 2026 में एक औसत कर्मचारी अपनी सैलरी से करीब 3,130 डॉलर यानी लगभग 2.99 लाख रुपये पेरोल कॉन्ट्रिब्यूशन के तौर पर देगा. इसके अलावा 2,167 डॉलर यानी करीब 2.07 लाख रुपये आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च होंगे. दोनों को मिलाकर कुल खर्च 5,297 डॉलर यानी करीब 5.07 लाख रुपये बैठता है, जो पिछले साल के मुकाबले 7.9% ज्यादा है. यानी हर साल अमेरिकी कर्मचारी के लिए अपनी और परिवार की हेल्थ का खर्च उठाना और मुश्किल होता जा रहा है.

आखिर क्यों इतनी तेजी से बढ़ रही हेल्थकेयर कॉस्ट?

रिपोर्ट में इस बढ़ोतरी के पीछे कई बड़ी वजहें बताई गई हैं. सबसे पहली वजह है मेडिकल सर्विसेज के इस्तेमाल में लगातार बढ़ोतरी. मरीज पहले के मुकाबले ज्यादा हेल्थकेयर सर्विसेज ले रहे हैं. इसके साथ ही डायबिटीज, हार्ट डिजीज और मोटापे जैसी क्रॉनिक यानी लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों के मामले भी बढ़ रहे हैं. इससे हाई-कॉस्ट क्लेम्स यानी महंगे इलाज वाले इंश्योरेंस क्लेम्स की संख्या बढ़ रही है. इसका सीधा असर बीमा कंपनियों और एम्प्लॉयर्स की कॉस्ट पर पड़ रहा है.

Cost Of Us Healthcare

  1. महंगी दवाओं का असर- दूसरी बड़ी वजह महंगी और स्पेशलिटी दवाओं पर बढ़ता खर्च है. पिछले कुछ सालों में GLP-1 ट्रीटमेंट्स की डिमांड तेजी से बढ़ी है. इनका इस्तेमाल मुख्य रूप से डायबिटीज और मोटापे जैसी स्थितियों के इलाज में किया जाता है. ये दवाएं काफी महंगी हैं और इनकी डिमांड बढ़ने के साथ प्रिस्क्रिप्शन ड्रग कॉस्ट यानी दवाओं पर होने वाला कुल खर्च भी बढ़ रहा है. जानकारों का मानना है कि जब तक इन दवाओं की कीमत कम करने या इनकी उपलब्धता बढ़ाने के ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक यह खर्च बढ़ता रह सकता है.
  2. AI तकनीक भी बन रही वजह- रिपोर्ट में एक नई वजह AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बढ़ता इस्तेमाल भी सामने आया है. हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स अब क्लिनिकल डॉक्यूमेंटेशन और मेडिकल कोडिंग के लिए AI बेस्ड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं. इससे मरीजों के इलाज का रिकॉर्ड ज्यादा डिटेल और सटीक हो रहा है, लेकिन इसका एक साइड इफेक्ट भी है. बेहतर डॉक्यूमेंटेशन के कारण कई बार बिलिंग कोड ज्यादा डिटेल में और ऊंची दरों पर तैयार हो रहे हैं. इससे अस्पतालों और क्लीनिकों के बिल्ड चार्जेज यानी कुल बिल की रकम बढ़ सकती है. यानी टेक्नोलॉजी जहां एक तरफ इलाज की क्वालिटी सुधार रही है, वहीं दूसरी तरफ कुछ मामलों में हेल्थकेयर कॉस्ट बढ़ाने का कारण भी बन रही है.

कुल मिलाकर अमेरिका में हेल्थकेयर खर्च की बढ़ोतरी कर्मचारियों और कंपनियों दोनों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है. लगातार चौथे साल करीब डबल डिजिट ग्रोथ यह दिखाती है कि यह सिर्फ थोड़े समय की समस्या नहीं है. मेडिकल सर्विसेज का बढ़ता इस्तेमाल, महंगी दवाएं और हेल्थकेयर बिलिंग की बढ़ती कॉस्ट इस दबाव को और बढ़ा रही हैं. अगर इन मुद्दों पर ठोस कदम नहीं उठाए गए तो अमेरिकी कर्मचारियों और कंपनियों पर हेल्थकेयर का आर्थिक बोझ आने वाले वर्षों में और बढ़ सकता है.

देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय TV9 Hindi में बतौर सब-एडिटर काम कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के अमेठी के रहने वाले देवेश को राजनीति के अलावा इतिहास, साहित्य में दिलचस्पी है.  साल 2024 में भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) के अमरावती कैंपस से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. देवेश को घूमना, लिखना, पढ़ना और पॉडकास्ट सुनना पसंद है.

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