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- In Reality, Somewhere There Is A Single Teacher For 51 Children, And Somewhere There Are 25 Teachers For 212.
भोपाल /इंदौर/ग्वालियर20 मिनट पहले
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शिक्षक दिवस केवल गुरुओं के सम्मान का पर्व नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की आत्मा का आकलन करने का दिन भी है। 'दैनिक भास्कर' की 840 स्कूलों से ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि राजधानी भोपाल समेत प्रदेश भर के सरकारी स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात की व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है।
युक्तियुक्तकरण के तमाम दावों और एजुकेशन पोर्टल 3.0 के ऑनलाइन आंकड़ों के बावजूद जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। कहीं एक ही शिक्षक पर पढ़ाई के साथ-साथ मध्याह्न भोजन, यू-डाइस, समग्र आईडी और बच्चों को घर से बुलाने तक की जिम्मेदारी है, तो कहीं बच्चों की संख्या दर्जनों में सिमट जाने के बावजूद शिक्षकों की फौज तैनात है।
प्रशासनिक अनदेखी और असंतुलित पदस्थापना के कारण एक तरफ जहां कई स्कूल बंद होने के कगार पर हैं या अतिथि शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जर्जर इमारतों के चलते नौनिहाल मंदिर के दलान और पेड़ की छांव में पढ़ने को मजबूर हैं।
इंदौर : बांस और ग्रीन नेट के नीचे 'सपनों की पाठशाला'
बदहाली के बीच इंदौर के महू-मानपुर रोड पर 'कवच संस्था' की पहल उम्मीद जगाती है। झोपड़ीपट्टी के 40 से ज्यादा बच्चों के लिए बांस-बल्लियों और ग्रीन नेट के सहारे अस्थाई स्कूल शुरू किया गया। यह पहल इतनी सफल रही कि कई बच्चे अब नियमित रूप से सरकारी स्कूलों में दाखिला ले चुके हैं।
भोपाल की दो तस्वीरें : व्यवस्था का असंतुलन
इनायतपुर: प्राइमरी स्कूल इनायतपुर में 51 बच्चों पर केवल एक महिला शिक्षक (ज्योति रावत) हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी नया शिक्षक नहीं मिला, जिससे पहली से 5वीं तक के सभी बच्चे सीलन भरे एक ही कमरे में टाट-पट्टी पर साथ बैठते हैं।
नूतन सुभाष : भवन टूटने के बाद शिफ्ट हुए इस स्कूल में नामांकन 1200 से घटकर 212 रह गया। यहां 25 शिक्षक पदस्थ हैं (औसतन 8 बच्चों पर एक शिक्षक)। इसके बावजूद 5वीं से 8वीं के छात्र एक ही कमरे में पढ़ने को मजबूर हैं।
मुरैना: चक्कपुरा में 50 बच्चों के लिए 1 शिक्षक है। जर्जर भवन के कारण बच्चे पेड़ के नीचे बैठते हैं और बारिश में छुट्टी करनी पड़ती है।
राजगढ़ : बड़ल्या का प्राथमिक स्कूल 5 साल से जर्जर है। छत में छेद हैं और टॉयलेट न होने से 9 बच्चे खेड़ापति हनुमान मंदिर के दलान में बैठते हैं।
शिक्षकों की तैनाती में विसंगति
भोपाल, इंदौर, ग्वालियर जैसे शहरों में 19 से 20 बच्चों पर एक शिक्षक, सिंगरौली-झाबुआ में अनुपात 42 तक पहुंचा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत पिछड़े व आदिवासी अंचलों में 25 छात्रों पर 1 शिक्षक होना चाहिए, लेकिन सिंगरौली में 42, झाबुआ में 38 और छतरपुर-टीकमगढ़ में 35 बच्चों पर 1 शिक्षक पदस्थ है।
असंतुलन और बदहाली के आंकड़े
- 5 जिलों में 10.55% अमला: प्रदेश के कुल 3.08 लाख शिक्षकों में से 32,612 शिक्षक केवल 5 जिलों (ग्वालियर, उज्जैन, सतना, मंडला, रायसेन) में केंद्रित हैं।
- राष्ट्रीय औसत से पीछे: देश में प्रति स्कूल औसतन 7 शिक्षक हैं, जबकि मप्र में यह आंकड़ा मात्र 6 है।
- एकल-शिक्षकीय स्कूल: प्रदेश के 2,269 सरकारी स्कूल केवल 1 शिक्षक के भरोसे हैं, जहां 62,151 बच्चे पढ़ रहे हैं।
- 20% अप्रशिक्षित शिक्षक: सेकेंडरी स्तर (9वीं-10वीं) पर 20.3% शिक्षक बिना पेशेवर प्रशिक्षण के पढ़ा रहे हैं।
- 72 हजार पद खाली: विभाग में 72,901 पद रिक्त हैं। इसी कमी के चलते सत्र 2025-26 में 2,426 स्कूल बंद या मर्ज कर दिए गए।
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