ग्वालियर, 24 अक्टूबर 2026: मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में केवल ₹70 की जमीन के लिए पिछले 90 साल से लड़ाई चल रही है। हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश की ग्वालियर बेंच ने इस मामले में फैसला सुना दिया है लेकिन इस बात की गारंटी नहीं है कि मामला खत्म हो गया है। चंबल का मामला है क्या पता सुप्रीम कोर्ट तक चल जाए।
क्या है पूरा मामला?
मामला मुरैना जिले की ग्राम पंचायत वीरपुर का है। वादीगण (हरिहरशंकर व अन्य) के अनुसार, उनके दादा रामरतन ने 14 दिसंबर 1937 (आज से लगभग 90 साल पहले) को ज़मींदार मुरली सिंह से कस्बा वीरपुर (तहसील सबलगढ़, जिला मुरैना) के सर्वे नंबर 686 स्थित 22x18 वर्ग फीट का भूखंड ₹70 में वास्तविक कब्जा प्राप्त कर खरीदा था। वादीगण और उनके दादा का इस भूमि पर वर्ष 1937 से निरंतर कब्जा रहा, जिस पर उन्होंने दो दुकानें और एक गुमटी बनाई थी।
ग्राम पंचायत वीरपुर ने दावा किया था कि इस भूमि पर वर्ष 1942 में एक क्लब-हाउस बनाया गया था, जिसे किराए पर दिया जाता था और वर्ष 1978 में वह भवन ढह गया। पंचायत ने 1937 के बिक्री सौदे को फर्जी बताते हुए भूमि पर अपने मालिकाना हक का दावा प्रस्तुत किया।
उच्च न्यायालय की मुख्य टिप्पणियां व कानूनी निष्कर्ष
न्यायालय ने संपत्ति अंतरण अधिनियम (Transfer of Property Act) की धारा 54 का विश्लेषण करते हुए कहा कि ₹100 से कम मूल्य की अचल संपत्ति की बिक्री 'भौतिक कब्जा सौंपकर' पूरी की जा सकती है। अदालत ने माना कि भले ही बिक्री पत्र अपंजीकृत हो, यदि पक्षकार स्वतंत्र रूप से कब्जा हस्तांतरित होना सिद्ध कर देता है, तो उसका मालिकाना हक वैध माना जाएगा।
अदालत ने यह भी पाया कि वादी के दादा वर्ष 1937 से निरंतर काबिज थे। इसके चलते मध्य भारत ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम, 1951 की धारा 5(a) व (b) के तहत ज़मींदारी प्रथा समाप्त होने के बाद भी वादीगण को भूमि का विधिक स्वामित्व प्राप्त हो गया था। उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि ग्राम पंचायत यह सिद्ध करने में विफल रही कि उक्त भूखंड पर उसका मालिकाना हक कब और किस प्रकार स्थापित हुआ था।
अदालत का अंतिम आदेश
उच्च न्यायालय ने निचली अदालतों (सिविल जज वर्ग-I सबलगढ़ एवं द्वितीय अपर जिला न्यायाधीश सबलगढ़) द्वारा वादीगण के पक्ष में सुनाए गए फैसलों को पूरी तरह न्यायसंगत ठहराया। अदालत ने ग्राम पंचायत वीरपुर की द्वितीय अपील (S.A. No. 848/2004) को खारिज करते हुए वादीगण के स्वामित्व और स्थायी निषेधाज्ञा (Injunction) के अधिकार की पुष्टि की।
न्यायमूर्ति आशीष श्रोती की एकल पीठ ने निचली अदालतों के निर्णयों को सही ठहराते हुए स्पष्ट किया कि ₹100 से कम कीमत वाली अचल संपत्ति का कब्जा हस्तांतरित (delivery of possession) किए जाने पर अपंजीकृत दस्तावेज के बावजूद मालिकाना हक वैध रहता है।
