पंजाब में खेतों में पराली जलाने के मामलों में भी तेजी आने लगी है। कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट और इसरो प्रोटोकॉल के तहत जारी आंकड़ों ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। लाख दावों और सख्त हिदायतों के बावजूद सूबे में पराली जलाने के कुल 184 मामले सामने

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वहीं, पड़ोसी जिले तरनतारन में 68 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें से 20 खेतों में आग लगने की भौतिक पुष्टि हुई है। इसके अलावा फिरोजपुर में 9, गुरदासपुर और मुक्तसर में 5-5, पटियाला, मोगा और संगरूर में 3-3 मामले सामने आए हैं। लगातार बढ़ रहे प्रदूषण को देखते हुए प्रशासन ने सख्ती दिखाना शुरू कर दिया है। पूरे पंजाब में अब तक 51 मामलों में 2.65 लाख जुर्माना लगाया गया है, जिसमें से 1.30 लाख रुपए वसूले भी जा चुके हैं। तरनतारन में सबसे ज्यादा 1.10 लाख और अमृतसर में 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया है। अब तक राज्य भर में 17 किसानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है, इनमें से 12 तरनतारन और 3 अमृतसर की हैं। वहीं, कड़ा संदेश देने के लिए 35 किसानों के फार्म रिकॉर्ड में रेड एंट्री भी की गई है, जिससे भविष्य में उन्हें सरकारी योजनाओं और लोन लेने में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

इस बार प्रशासन केवल किसानों पर ही नहीं बल्कि ड्यूटी में कोताही बरतने वाले अधिकारियों पर भी सख्त एक्शन ले रहा है। पराली की आग रोकने में नाकाम रहे राज्य के 60 नोडल और सुपरवाइजरी अधिकारियों को वार्निंग/कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। अमृतसर में प्रशासन ने सबसे बड़ी कार्रवाई करते हुए अकेले 56 नोडल अफसरों को नोटिस थमाए हैं, जबकि फिरोजपुर में 4 अफसरों को नोटिस जारी हुआ है। आंकड़ों की तुलना करें तो 13 अक्टूबर तक राज्य में पराली जलाने के 174 मामले थे, जो अब तक बढ़कर 184 हो गए।

अमृतसर के नोडल अफसरों को दिए गए नोटिस की संख्या 38 से बढ़कर 56 हो गई, जो दर्शाता है कि आने वाले दिनों में प्रशासन सख्ती और बढ़ाने के मूड में है। डिप्टी कमिश्नर दलविंदरजीत सिंह ने किसानों से पराली न जलाने की अपील करते हुए कहा कि इससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम होती है, मित्र कीट नष्ट होते हैं और जहरीले धुएं से बच्चों व बुजुर्गों की सेहत प्रभावित होती है। उन्होंने बताया कि एक टन पराली जलाने से 400 किलो जैविक कार्बन, 5.5 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फास्फोरस, 25 किलो पोटाश और 1.2 किलो सल्फर का नुकसान होता है। किसानों को पराली खेतों में मिलाने, बेलर से गांठें बनाकर बेचने या पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल करने की सलाह दी। इससे मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहेगी और किसान अतिरिक्त आय भी कमा सकेंगे।