रामलीला मैदान, बुराड़ी और CBD ग्राउंड में अब तक कितने प्रदर्शन, क्या हुआ अंजाम? जंतर-मंतर की जगह अब यहां गूंजेंगे नारे

जंतर-मंतर पर रोक के बाद सरकार ने रामलीला मैदान, बुराड़ी और सीबीडी मैदान को विकल्प के रूप में पेश किया है.

सरकार ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन पर रोक लगाने का फैसला करते हुए रामलीला मैदान, बुराड़ी और सीबीडी मैदान को विकल्प के रूप में पेश किया है. मतलब अब से किसी भी संगठन को धरना-प्रदर्शन या इस तरह के किसी भी विरोध प्रदर्शन के लिए इन्हीं तीनों स्थलों में से किसी का चयन करना होगा. अधिकृत तरीके से अनुमति लेनी होगी. तभी नए प्रस्तावित मैदानों पर धरना-प्रदर्शन संभव हो सकेगा. आइए, जानते हैं कि बुराड़ी, रामलीला मैदान और सीबीडी ग्राउंड में कौन-कौन से आंदोलन हुए और उनके परिणाम क्या रहे?

दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन के लिए जगहें बदलती रही हैं. कभी संसद के आसपास, कभी बोट क्लब और कभी जंतर-मंतर पर लोगों ने अपनी मांगें उठाईं. अब जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने के बाद रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड को नए निर्धारित स्थल बताया जा रहा है. इन मैदानों पर आंदोलनों का सटीक नंबर उपलब्ध नहीं है लेकिन महत्वपूर्ण आंदोलनों की जानकारी जरूर उपलब्ध है. इन स्थलों की भूमिका भी अलग-अलग रही है. रामलीला मैदान बड़े राजनीतिक जमावड़ों के लिए जाना जाता है. बुराड़ी किसान आंदोलन के शुरुआती दौर से जुड़ा है. सीबीडी ग्राउंड को अब नए प्रदर्शन स्थल के रूप में शामिल किया गया है.

रामलीला मैदान: बड़े आंदोलनों का पुराना मंच

रामलीला मैदान दिल्ली के सबसे पुराने और चर्चित जनसभा स्थलों में से एक है. यहां कई राजनीतिक रैलियां, सामाजिक आंदोलन और सार्वजनिक कार्यक्रम हुए हैं. मैदान का इतिहास केवल हाल के प्रदर्शनों तक सीमित नहीं है.

आजादी के बाद से यह कई बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों का साक्षी रहा है. साल 1952 में जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर के भारत में एकीकरण की मांग को लेकर यहां सत्याग्रह किया था. बाद के वर्षों में जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और कई अन्य नेताओं ने यहां बड़ी सभाओं को संबोधित किया. 1971 के युद्ध में भारत की जीत के बाद भी मैदान में रैली हुई. आपातकाल की घोषणा से पहले जयप्रकाश नारायण और अटल बिहारी वाजपेयी ने 1975 में यहां सभा की थी.

Ramlila Maidan

रामलीला मैदान. फोटो: PTI

रामलीला मैदान का एक बड़ा आधुनिक आंदोलन 2011 में अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन था. लोकपाल कानून की मांग को लेकर उनका अनशन राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना. इस आंदोलन ने भ्रष्टाचार और लोकपाल को देश की राजनीति के केंद्र में ला दिया. इसके बाद लोकपाल कानून पर संसद और सरकार पर दबाव बढ़ा. हालांकि, आंदोलन की प्रमुख मांगों और सरकार के कानून के बीच मतभेद बने रहे. इसलिए इसे पूरी जीत या पूरी हार कहना ठीक नहीं होगा.

साल 2011 में बाबा रामदेव का काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन भी दिल्ली की राजनीति में चर्चा में रहा. उस घटनाक्रम में पुलिस कार्रवाई हुई और आंदोलन समाप्त हुआ. रामलीला मैदान में 2013 में अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ली. इससे साफ है कि यह स्थल केवल धरने का मैदान नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश और सार्वजनिक शक्ति प्रदर्शन का बड़ा मंच भी रहा है.

उपलब्ध जानकारी के अनुसार रामलीला मैदान में करीब 50 हजार लोगों के जुटने की व्यवस्था है. लेकिन यहां प्रदर्शन करने के लिए अनुमति, पुलिस की अनापत्ति और मैदान की उपलब्धता जैसे नियम लागू हो सकते हैं.

Burari Ground

बुराड़ी मैदान किसानों के आंदोलन से जुड़ा है.

बुराड़ी मैदान: किसान आंदोलन से जुड़ी पहचान

बुराड़ी मैदान का नाम 2020 के किसान आंदोलन के शुरुआती दिनों से जुड़ा है. केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के विरोध में किसान दिल्ली पहुंचे थे. उस समय बुराड़ी स्थित निरंकारी समागम मैदान में प्रदर्शन करने का विकल्प दिया गया था. कुछ किसान संगठन वहां पहुंचे, जबकि कई संगठन दिल्ली की सीमाओं पर ही डटे रहे. नतीजा यह हुआ कि बुराड़ी किसान आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना, लेकिन आंदोलन का मुख्य केंद्र लंबे समय तक दिल्ली की सीमाएं रहीं.

सिंघु, टिकरी और गाजीपुर जैसे बॉर्डर इलाकों पर किसानों का बड़ा जमावड़ा जारी रहा. बुराड़ी में सभी किसान संगठनों की मौजूदगी नहीं थी. किसान आंदोलन का प्रभाव देश-भर में दिखाई दिया. किसानों की मांगों और कृषि कानूनों पर सरकार और संगठनों के बीच बातचीत हुई. लंबे विरोध के बाद केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की. यह आंदोलन का सबसे बड़ा परिणाम था. हालांकि, किसान संगठनों की अन्य मांगों पर अलग-अलग दौर में बातचीत जारी रही. बुराड़ी को बड़े जमावड़ों के लिए एक संभावित स्थल माना गया है. इसकी क्षमता एक लाख तक बताई गई है. फिर भी वास्तविक संख्या आयोजन, सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासन की अनुमति पर निर्भर करेगी.

Cbd Ground

सीबीडी ग्राउंड कड़कड़डूमा और शाहदरा क्षेत्र के पास स्थित है.

सीबीडी ग्राउंड: नया विकल्प, पुराना रिकॉर्ड सीमित

पूर्वी दिल्ली का सीबीडी ग्राउंड अब प्रदर्शन के लिए तय किए गए तीन स्थलों में शामिल है. यह कड़कड़डूमा और शाहदरा क्षेत्र के पास स्थित है. जंतर-मंतर से इसकी दूरी करीब 12 किलोमीटर बताई गई है. यहां तक मेट्रो और बस से पहुंचने के विकल्प हैं. रामलीला मैदान और बुराड़ी की तरह सीबीडी ग्राउंड का कोई व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन-इतिहास उपलब्ध नहीं दिखता. इसकी नई भूमिका अब तय होगी.

प्रदर्शनकारियों के लिए यह जानना जरूरी होगा कि यहां कितनी भीड़ की अनुमति मिलेगी, मैदान किस विभाग के अधीन है और अनुमति की प्रक्रिया क्या होगी. सीबीडी ग्राउंड को शामिल करने से पूर्वी दिल्ली में प्रदर्शन का एक विकल्प मिलता है. लेकिन प्रदर्शन स्थल का शहर के केंद्र से दूर होना अपनी चुनौती भी रखता है. किसी आंदोलन का असर इस बात पर भी निर्भर करता है कि लोग वहां आसानी से पहुंच पाते हैं या नहीं?

Jantar Mantar

जंतर-मंतर अब नहीं रहा धरना स्थल.

आखिर तीनों मैदानों पर कितने प्रदर्शन हुए?

इन तीनों जगहों पर हुए प्रदर्शनों की कुल संख्या बताने वाला कोई एक प्रमाणित सार्वजनिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है. रामलीला मैदान में दशकों के दौरान अनेक सभाएं और आंदोलन हुए हैं. बुराड़ी मैदान किसान आंदोलन के एक चरण के कारण खास तौर पर चर्चा में आया. सीबीडी ग्राउंड के मामले में प्रदर्शन स्थल के रूप में इसकी भूमिका नई है और पुराने आंदोलनों का सार्वजनिक रिकॉर्ड न के बराबर उपलब्ध है.

रामलीला मैदान ने लोकपाल आंदोलन और कई राजनीतिक रैलियों को मंच दिया. बुराड़ी किसान आंदोलन के शुरुआती पड़ाव के रूप में सामने आया, जबकि कृषि कानूनों की वापसी आंदोलन का बड़ा परिणाम बनी. सीबीडी ग्राउंड अब एक वैकल्पिक स्थल है, जिसका असर भविष्य में होने वाले प्रदर्शनों से तय होगा.

प्रदर्शन स्थल बदलने का क्या असर होगा?

जंतर-मंतर लंबे समय तक छोटे और मध्यम आकार के प्रदर्शनों का जाना-पहचाना केंद्र रहा. वहां से संसद और सरकारी दफ्तरों तक पहुंच अपेक्षाकृत आसान थी. अब प्रदर्शन को अलग-अलग मैदानों में भेजने से भीड़ और यातायात को नियंत्रित करना प्रशासन के लिए आसान हो सकता है. लेकिन प्रदर्शनकारियों को अधिक दूरी तय करनी पड़ सकती है. किसी भी लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों की मांग रखने का एक तरीका है. स्थल बदलने से यह अधिकार समाप्त नहीं होता. लेकिन प्रदर्शन की अनुमति, जगह की उपलब्धता, खर्च और आवाजाही की सुविधा उसके असर को बदल सकती है. रामलीला मैदान, बुराड़ी और सीबीडी ग्राउंड का आगे का महत्व इसी बात से तय होगा कि वहां प्रदर्शन करना कितना सरल, सुरक्षित और प्रभावी रहता है.

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दिनेश पाठक

दिनेश पाठक

मूलतः पाठक. पेशे से लेखक. कबीर की धरती पर जन्म. मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की धरती अयोध्या में लालन-पालन, पढ़ाई-लिखाई. करियर की शुरुआत आदि गंगा के तट लखनऊ से. संगम तीरे प्रयागराज, मोहब्बत की निशानी ताजमहल के साये से लेकर देवभूमि उत्तराखंड, उद्योगनगरी के रूप में मशहूर रहे कानपुर और बाबा गोरखनाथ की धरती पर काम करते हुए विद्वतजन से कुछ न कुछ सीखा, करंट अफ़ेयर्स, यूथ, पैरेंटिंग, राजनीति, प्रशासन, गाँव, खेत-किसान पसंदीदा टॉपिक. स्कूल, कॉलेज युनिवर्सिटी में यूथ से गपशप करना एनर्जी का अतिरिक्त स्रोत. साल 1992 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुई इस पाठक की लेखन यात्रा कलम, डेस्कटॉप, लैपटॉप के की-बोर्ड से होते हुए स्मार्ट फोन तक पहुंच गयी. ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ रही है, सीखने, पढ़ने, लिखने की भूख भी बढ़ रही है. हिंदुस्तान अखबार में पांच केंद्रों पर एडिटर रहे. यूथ, पैरेंटिंग पर पाँच किताबें. एक किताब 'बस थोड़ा सा' पर दूरदर्शन ने धारावाहिक बनाया.

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