Time Published: Friday, August 14, 2026, 17:38 [IST]

IRCTC Tatkal Ticket Scam: तत्काल टिकट खुलते ही कुछ सेकंड में सीटें खत्म हो जाना रेलवे यात्रियों के लिए लंबे समय से परेशानी का कारण रहा है। आम यात्री वेबसाइट पर लॉगिन करके नाम, उम्र और यात्रा की जानकारी भरता रह जाता था, जबकि कुछ दलाल उससे पहले ही बड़ी संख्या में टिकट हासिल कर लेते थे। इस पूरे खेल में एक ऐसा नाम सामने आया, जिसने रेलवे की टिकट व्यवस्था को करीब से समझने का फायदा उठाकर उसे ही निशाना बनाया।

यह नाम है अजय गर्ग, जो कभी रेलवे के टिकटिंग तंत्र से जुड़ा था और बाद में केंद्रीय जांच ब्यूरो में सहायक प्रोग्रामर के तौर पर काम करने लगा। आरोप है कि उसने तकनीकी जानकारी का इस्तेमाल कर ऐसा अवैध तंत्र तैयार किया, जिसने तत्काल टिकटों की बिक्री को प्रभावित किया और देशभर में दलालों का नेटवर्क खड़ा कर दिया।

IRCTC Tatkal Ticket Scam

रेलवे के सिस्टम की अंदरूनी जानकारी बनी हथियार

अजय गर्ग ने साल 2012 में केंद्रीय जांच ब्यूरो में सहायक प्रोग्रामर के तौर पर काम शुरू किया था। इससे पहले 2007 से 2011 के बीच वह भारतीय रेलवे खानपान एवं पर्यटन निगम यानी आईआरसीटीसी के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग में तैनात था। इस दौरान उसे रेलवे की ऑनलाइन टिकट व्यवस्था, उसकी तकनीकी प्रक्रिया और सुरक्षा व्यवस्था की अच्छी जानकारी हो गई थी। जांच के मुताबिक, बाद में इसी जानकारी का इस्तेमाल तत्काल टिकटों की बुकिंग में गड़बड़ी करने के लिए किया गया। आरोप है कि अजय ने 'एनईओ' और 'विनजिप' नाम के दो अवैध सॉफ्टवेयर तैयार किए थे। इनकी मदद से टिकट बुकिंग की प्रक्रिया को आम यात्रियों के मुकाबले काफी तेज कर दिया जाता था।

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जहां एक सामान्य यात्री को यात्रा करने वाले व्यक्ति का नाम, उम्र और ट्रेन की जानकारी भरने में समय लगता था, वहीं इन सॉफ्टवेयर में स्वत: जानकारी भरने की सुविधा थी। दावा है कि पूरा विवरण करीब दो सेकंड में तैयार हो जाता था। इन सॉफ्टवेयर पर आरोप था कि वे सुरक्षा जांच की कुछ अहम परतों, जैसे कैप्चा और बैंक के एक बार इस्तेमाल होने वाले पासवर्ड की प्रक्रिया को भी पार कर जाते थे।

विदेशी सर्वर से छिपाया जाता था नेटवर्क

जांच के अनुसार, इस पूरे तंत्र को पकड़ से दूर रखने के लिए विदेशों में मौजूद सर्वरों और अलग-अलग प्रॉक्सी इंटरनेट पते का इस्तेमाल किया जाता था। इनकी मदद से एक साथ बड़ी संख्या में फर्जी उपयोगकर्ता पहचान के जरिए IRCTC के सर्वर पर अनुरोध भेजे जाते थे। इसका सीधा असर तत्काल टिकट खुलने के समय आम यात्रियों की बुकिंग पर पड़ता था।

यह काम सिर्फ एक सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं था। आरोप है कि अजय गर्ग ने देश के अलग-अलग हिस्सों में टिकट दलालों और एजेंटों का नेटवर्क तैयार किया था। एजेंटों को उपयोगकर्ता पहचान और पासवर्ड के आधार पर मासिक सदस्यता दी जाती थी। इसके बदले वे इस अवैध व्यवस्था का इस्तेमाल कर तत्काल टिकट हासिल करते थे। करोड़ों रुपये के इस कथित कारोबार में लेन-देन छिपाने के लिए नकद के बजाय बिटकॉइन और हवाला जैसे माध्यमों का इस्तेमाल किए जाने का भी आरोप सामने आया।

शिकायतों के बाद शुरू हुई जांच

दिसंबर 2017 में तत्काल टिकटों के तेजी से खत्म होने और टिकट नहीं मिलने की शिकायतें बढ़ने लगीं। इसके बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो की साइबर टीम ने आईआरसीटीसी के सर्वर से जुड़े रिकॉर्ड की जांच शुरू की। जांच आगे बढ़ी तो सॉफ्टवेयर के पीछे मौजूद नेटवर्क और उसके संपर्कों को खंगाला गया। आरोप है कि सॉफ्टवेयर के अपडेट से जुड़े कुछ कनेक्शन आखिरकार केंद्रीय जांच ब्यूरो के ही एक कंप्यूटर तक पहुंचे। जौनपुर के कथित मुख्य बिचौलिए अनिल गुप्ता की गिरफ्तारी के बाद जांच एजेंसियों को इस नेटवर्क की दूसरी कड़ियों की जानकारी मिली। इसके बाद जांच अजय गर्ग तक पहुंची।

केंद्रीय जांच ब्यूरो ने कथित नेटवर्क से जुड़े 14 ठिकानों पर छापेमारी की। कार्रवाई के दौरान सॉफ्टवेयर का मूल कोड, कई लैपटॉप और एजेंटों से जुड़ी सूची समेत कई सामान जब्त किए गए।

आम यात्रियों पर पड़ा असर

तत्काल टिकट व्यवस्था का मकसद आखिरी समय में यात्रा करने वाले लोगों को सीट उपलब्ध कराना है। लेकिन अगर कोई तकनीकी व्यवस्था का गलत फायदा उठाकर कुछ ही सेकंड में बड़ी संख्या में टिकट हासिल कर ले, तो आम यात्री के लिए टिकट मिलना मुश्किल हो जाता है।

इस मामले ने यह सवाल भी खड़ा किया कि जिस व्यक्ति को रेलवे की तकनीकी व्यवस्था की जानकारी थी, उसने उसी जानकारी का इस्तेमाल कथित तौर पर सिस्टम को नुकसान पहुंचाने के लिए कैसे किया। टिकट की तलाश में घंटों कोशिश करने वाले यात्रियों के लिए यह सिर्फ सीट नहीं मिलने का मामला नहीं था, बल्कि ऑनलाइन टिकट व्यवस्था पर भरोसे से जुड़ा सवाल भी था।

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