CGMSC में रिएजेंट घोटाला...मोक्षित-कार्पोरेशन के डायरेक्टर को राहत नहीं: 161 करोड़ के रिएजेंट बर्बाद, शशांक चोपड़ा ने FIR और चार्जशीट रद्द करने लगाई थी याचिका - Bilaspur (Chhattisgarh) News
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CGMSC Reagent Scam | High Court Rejects Shashank Chopra Plea In Raipur
बिलासपुर3 घंटे पहले
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हाईकोर्ट ने कहा- यह केवल अनुबंध या भुगतान विवाद नहीं, बल्कि साजिश, भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोपों से जुड़ा मामला है।
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल ने हमर लैब योजना में मेडिकल उपकरण और रिएजेंट खरीदी घोटाले के आरोपी मोक्षित कॉर्पोरेशन के डायरेक्टर शशांक चोपड़ा को राहत देने से इनकार कर दिया।
डिवीजन बेंच ने एफआईआर, चार्जशीट और आपराधिक कार्रवाई रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए कहा कि मामला केवल अनुबंध या भुगतान विवाद का नहीं, बल्कि सरकारी खरीद प्रक्रिया में साजिश, भ्रष्टाचार और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोपों से जुड़ा है। ऐसे मामलों में सबूतों का परीक्षण ट्रायल कोर्ट में ही होगा।
सीजीएमएससी ने वर्ष 2022 में हमर लैब योजना के लिए दवाओं की खरीदी के लिए टेंडर जारी किया था। इस मामले में करोड़ों की गड़बड़ी का आरोप लगा। मामले की जांच हुई। जांच एजेंसी का आरोप है कि टेंडर की शर्तें इस तरह बनाई गईं कि मोक्षित कॉर्पोरेशन को फायदा मिले।
इसके बाद जरूरत और उपलब्ध अधोसंरचना का आकलन किए बिना करीब 314 करोड़ रुपए के रिएजेंट खरीदे गए। अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में कोल्ड स्टोरेज, रेफ्रिजरेटर, यूपीएस और अन्य आवश्यक सुविधाएं नहीं होने से करीब 161 करोड़ रुपए के रिएजेंट इस्तेमाल से पहले ही एक्सपायर हो गए, जिससे शासन को भारी नुकसान हुआ।
याचिका में कहा- अनुबंध का मामला, 338 करोड़ बकाया
मोक्षित कार्पोरेशन के डायरेक्टर शशांक चोपड़ा ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। कहा कि पूरा विवाद अनुबंध और भुगतान से जुड़ा है। कंपनी ने तय सप्लाई कर दी है, लेकिन उसके लगभग 338 करोड़ रुपए अभी भी सीजीएमएससी पर बकाया हैं।
साथ ही कंपनी ने जीएसटी और आयकर के रूप में बड़ी राशि जमा की है, इसलिए उसे गलत आर्थिक लाभ पहुंचाने का आरोप निराधार है। यह भी कहा गया कि कंपनी ने समय-समय पर स्वास्थ्य विभाग और सीजीएमएससी को अधोसंरचना की कमी और रिएजेंट खराब होने की आशंका जताई थी।
सरकार ने कहा- टेंडर में गड़बड़ी, भ्रष्टाचार का केस
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि मामला केवल भुगतान या अनुबंध का नहीं, बल्कि सरकारी खरीद प्रक्रिया में मिलीभगत, टेंडर में हेरफेर, भ्रष्टाचार और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का है। ऐसे गंभीर आर्थिक अपराधों की सुनवाई ट्रायल में ही हो सकती है और इस स्तर पर कार्रवाई समाप्त नहीं की जा सकती।
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