2026 के ईरान युद्ध में एक नया और खतरनाक मोड़ आया है. ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी CIA की सीक्रेट फैसिलिटी पर ड्रोन हमले किए हैं. इन हमलों की सटीकता और प्रभावशीलता को देखते हुए अमेरिकी खुफिया एजेंसियां जांच कर रही हैं कि क्या रूस ने ईरान को टारगेटिंग जानकारी या एडवांस्ड ड्रोन टेक्नोलॉजी दी है. चार अमेरिकी खुफिया अधिकारियों ने नाम न बताने की शर्त पर इस बात की पुष्टि की है. 

हालांकि अभी कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला है, लेकिन हमलों की सटीकता और रूस-ईरान के लंबे तकनीकी सहयोग को संदिग्ध माना जा रहा है. यह घटना सामान्य नहीं है क्योंकि सीआईए की विदेशी सुविधाएं बेहद सीक्रेट होती हैं. रूस अगर इन हमलों में शामिल है तो इसका मतलब है कि मॉस्को अमेरिका के खिलाफ ईरान को और ज्यादा सपोर्ट दे रहा है. 

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इससे ईरान युद्ध को खत्म करने की अमेरिकी कोशिशें और मुश्किल हो गई हैं. रॉयटर्स और अन्य मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मार्च में कम से कम दो सीआईए साइट्स पर हमले हुए – एक सऊदी अरब के रियाद में अमेरिकी दूतावास के अंदर सीआईए स्टेशन और दूसरा पूर्वी इराक में. कुछ सूत्रों का कहना है कि कुल हमले ज्यादा जगहों पर हुए लेकिन डिटेल्स सीक्रेट रखे गए हैं.

रूस ने दी टारगेटिंग मदद? इंटेलिजेंस मेमो में क्या है

एक पश्चिमी खुफिया एजेंसी के आंतरिक मेमो में साफ लिखा है कि रूस ने क्षेत्रीय सीआईए फैसिलिटी को टारगेट करने में भूमिका निभाई है. गल्फ क्षेत्र के एक अधिकारी ने इस दस्तावेज का जिक्र करते हुए कहा कि रूस ने संभवतः ईरान को महत्वपूर्ण जानकारी दी. दो पश्चिमी अधिकारियों ने बताया कि सऊदी हमले में रूसी-एन्हांस्ड शाहेद ड्रोन्स का इस्तेमाल हुआ. 

एक ड्रोन ने दूतावास की बाहरी दीवार में छेद किया. दूसरे ने उस छेद से अंदर घुसकर विस्फोट किया. किस्मत से कोई हताहत नहीं हुआ. रूस और ईरान के बीच संबंध लंबे समय से मजबूत हैं. दोनों देश अमेरिकी प्रभाव को कम करने में रुचि रखते हैं. लेकिन सीआईए जैसी संवेदनशील जगहों को निशाना बनाना नया और गंभीर कदम है. 

अमेरिकी विश्लेषकों का मानना है कि रूस के पास ही ऐसी क्षमता और इच्छाशक्ति है कि वह ईरान को इतनी गोपनीय जानकारी दे सके. पूर्व सीआईए स्टेशन चीफ डेनियल हॉफमैन ने कहा कि मॉस्को और तेहरान का सामरिक साझेदारी अमेरिका को उनके प्रभाव क्षेत्र से बाहर करने का लक्ष्य रखता है.

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शाहेद ड्रोन्स की सटीकता में रूस का योगदान

ईरान के शाहेद-136 ड्रोन्स पहले से ही चर्चित हैं लेकिन रूस की मदद से इनकी क्षमता बढ़ गई है. रूस ने ईरान को कोमेता-एम (Kometa-M) सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम दिया है. यह सिस्टम ईरान के अपने सिस्टम से कहीं ज्यादा सटीक है. जैमिंग करना मुश्किल है. 

दो पश्चिमी अधिकारियों ने कहा कि रूस ने शाहेद ड्रोन्स की रेंज और एक्यूरेसी सुधारने में मदद की. रियाद हमले में इन्हीं एडवांस्ड वर्जन का इस्तेमाल हुआ माना जा रहा है. इससे साफ है कि तकनीकी ट्रांसफर सिर्फ कागजों तक नहीं बल्कि फील्ड में भी हो रहा है. इससे ईरान की हमले की क्षमता बढ़ी है.  

Iran drone attacks CIA facilities

जॉर्डन एयर बेस पर हमला और बढ़ती चिंता

इस सप्ताहांत जॉर्डन में अमेरिकी एयर बेस पर ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल हमले ने स्थिति और गंभीर कर दी. इसमें दो अमेरिकी सैनिक मारे गए. इस हमले के बाद रूस द्वारा टारगेटिंग डेटा देने की आशंका और बढ़ गई है. अमेरिकी खुफिया एजेंसियां जांच कर रही हैं कि क्या ईरान ने रूसी डेटा का इस्तेमाल किया. 

कुछ विश्लेषक मानते हैं कि ईरान ने सामान्य रूप से दूतावास को निशाना बनाया होगा. सीआईए स्टेशन संयोग से प्रभावित हुआ. लेकिन ज्यादातर का मानना है कि इतनी सटीकता बिना बाहरी मदद के मुश्किल है. सीआईए की विदेशी सुविधाएं मुख्य रूप से दूतावासों में होती हैं जिन्हें स्टेशन कहा जाता है. 

इसके अलावा सेफ हाउस, लॉजिस्टिक्स हब और सर्विलांस साइट्स भी हैं. इनकी लोकेशन अत्यंत गोपनीय होती है. हमलों की संख्या एक से ज्यादा लेकिन दर्जन से कम थी. इससे अमेरिकी खुफिया नेटवर्क को नुकसान पहुंचा है और ऑपरेशंस प्रभावित हुए हैं. 

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ईरान-रूस साझेदारी की गहराई और अमेरिका के लिए चुनौती

रूस और ईरान का गठबंधन सिर्फ आर्थिक या राजनयतिक नहीं है बल्कि सैन्य और तकनीकी स्तर पर गहरा है. यूक्रेन युद्ध में ईरान ने रूस को ड्रोन्स दिए थे. अब रूस ईरान को सपोर्ट दे रहा है. इससे मध्य पूर्व में अमेरिकी प्रभाव कम करने की कोशिश साफ दिख रही है. 

ईरान, रूस और सऊदी सरकार ने भी कमेंट से इनकार कर दिया. यह स्थिति अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती है क्योंकि ईरान युद्ध को खत्म करने के प्रयास चल रहे हैं लेकिन रूस की मदद से ईरान मजबूत हो रहा है. 

अगर रूस टारगेटिंग डेटा दे रहा है तो इसका मतलब है कि मॉस्को प्रत्यक्ष रूप से अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाने को तैयार है. इससे गल्फ क्षेत्र में तनाव बढ़ेगा और तेल की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है.

यह घटनाक्रम दिखाता है कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन और सैटेलाइट टेक्नोलॉजी कितनी अहम हो गई है. ईरान के पास पहले से ड्रोन्स थे लेकिन रूस की मदद से उनकी सटीकता बढ़ गई. इससे अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को अपनी सुरक्षा बढ़ानी होगी. सीआईए स्टेशन्स की लोकेशन पहले से गोपनीय थी लेकिन अब और सतर्कता बरती जाएगी. 

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