निशांत कुमार को बिहार का अगला मुख्यमंत्री बनाना चाहिए। JDU के मंच से उठी यह मांग, क्या सच होने वाली है। JDU अंदरखाने क्या तैयारी कर रही है। क्या BJP ऐसा होने देगी?
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आज इन्हीं सवालों को समझेंगे बूझे की नाही में…।
सवाल-1ः निशांत कुमार को CM बनाने की चर्चा कैसे शुरू हुई?
जवाबः ताजा चर्चा 18 सितंबर को तब फिर शुरू हुई जब विधायकों और विधान पार्षदों के ओरिएंटेशन प्रोग्राम में JDU विधायक मंजीत सिंह ने निशांत को CM बनाने की मांग कर दी।
दरअसल, यह पार्टी का पहला बड़ा कार्यक्रम था, जिसमें पूर्व CM नीतीश कुमार और स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार एक साथ एक मंच पर थे। दोनों की उपस्थिति में विधायकों ने निशांत के समर्थन में जमकर नारेबाजी की।
राजनीतिक गलियारे में इस कार्यक्रम को निशांत कुमार की पार्टी में ताजपोशी के तौर पर देखा जा रहा है। इस दौरान निशांत कुमार ने कहा, ‘पार्टी नीतीश कुमार ने खड़ी की है। उनकी विचारधारा को ही हमलोगों को आगे बढ़ाना है।’
हालांकि, निशांत को मुख्यमंत्री बनाने की यह डिमांड अप्रैल में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद से ही रह-रहकर हो रही है। बीते 30 दिनों में पार्टी के बड़े नेताओं ने इस डिमांड को हवा दी है। पढ़िए, किसने क्या कहा…
- 8 सितंबर को बेगूसराय में JDU के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा, ‘पार्टी के आगे का भविष्य तय हो चुका है। निशांत कुमार अभी सरकार में मंत्री के तौर पर काम कर रहे हैं। आगे संगठन की जिम्मेदारी संभालेंगे। बिहार भर में घूमेंगे। आगे अभी बहुत कुछ होगा।’
- 24 अगस्त को बिहार सरकार के मंत्री श्रवण कुमार ने कहा, 'निशांत कुमार ही JDU का भविष्य हैं और पार्टी की विरासत संभालने के लिए अंदरूनी नेतृत्व ही सक्षम है।'
- 24 अगस्त को मंत्री और JDU नेता अशोक चौधरी ने कहा, 'अब नीतीश कुमार की विरासत को निशांत कुमार ही संभालेंगे।'
- 22 अगस्त को मंत्री मदन सहनी ने कहा था, 'नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को संभालने की क्षमता उनके पुत्र निशांत कुमार में है और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा, विजय चौधरी समेत सभी सीनियर नेता इस रुख पर स्पष्ट हैं।'
- 22 अगस्त को JDU ने स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार के मंत्री के तौर पर 100 दिन पूरा होने का जश्न मनाया। पटना स्थित पार्टी कार्यालय में केक काटा गया और JDU नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर निशांत के 100 दिन के कामकाज की रिपोर्ट दी।

18 सितंबर को JDU कार्यालय में विधायकों और विधान पार्षदों के ओरिएंटेशन प्रोग्राम में पिता-पुत्र पहली बार एक मंच पर एक साथ दिखे थे।
सवाल-2ः ये सिर्फ चर्चा है या JDU इसे लेकर गंभीर भी है?
जवाबः JDU की हाल की रणनीतियों और फैसलों को देखें तो इसे सिर्फ चर्चा तक सीमित नहीं रखा जा सकता है। पार्टी की हाल की 3 गतिविधियां साफ संकेत दे रही है कि वो निशांत कुमार को CM बनाने को लेकर गंभीर है।
1. बिहार के मुद्दों पर पार्टी का आक्रामक रुख
जनता दल यूनाइटेड (JDU) बिहार और बिहारियों के मुद्दे पर आक्रामक है। इसी रणनीति के तहत पार्टी बांग्लादेश के साथ हुई गंगा जल संधि को बिहार के अहित में बता रही है। वह इसे घर-घर तक आम बिहारियों के हितों से जोड़ने का प्रयास कर रही है।
इस संधि के विरोध में संजय झा ने 5 सितंबर से 12 जिलों में नीतीश संवाद कार्यक्रम किया। उन्होंने लोगों को बताया कि गंगा जल संधि बिहार के हित में नहीं है। हमारी पार्टी किसी भी हालत में बिहार के हितों से समझौता नहीं करेगी।
8 सितंबर को संजय झा ने यहां तक कहा- ‘सत्ता रहे या ना रहे, बिहार के हित की बात हम नहीं छोड़ेंगे। नीतीश कुमार ने हमेशा बिहारियों की हित की लड़ाई लड़ी है।’
2. पार्टी की सेक्युलर इमेज बचाने के लिए BJP से अलग राय
- 13 सितंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, ‘UCC यानी समान नागरिक संहिता 2029 के पहले सभी भाजपा और NDA शासित 21 राज्यों में लागू करने का प्रयास किया जाएगा।’
- शाह के इस बयान पर JDU ने अलग लाइन ली। करीबी और सीनियर विधायक ने विरोध किया तो बड़े नेताओं ने ड्राफ्ट पढ़ने के बाद राय देने की बातें कही। मतलब ना खुलकर विरोध और ना ही खुलकर समर्थन।
- 8 मार्च को पार्टी जॉइन करने के बाद की निशांत कुमार की गतिविधियों को देखें तो साफ संकेत है कि पार्टी नीतीश कुमार की सेक्युलर इमेज को बनाए रखना चाहती है।
- निशांत कुमार मंदिर जाते हैं तो मस्जिद भी आते-जाते दिखते हैं। उन्होंने ना जालीदार टोपी पहनने से इनकार किया और ना ही दावत-ए-इफ्तार देने से पीछे रहे।
- पार्टी के रणनीतिकार इसे नीतीश कुमार की सेक्युलर इमेज को बचाने की कवायद बताते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करके पार्टी दोनों यानी NDA व महागठबंधन के दरवाजे को खोले रखना चाहती है।

निशांत कुमार समय-समय पर दरगाह जाते रहते हैं। वह धार्मिक मामलों में अपनी इमेज अपने पिता की तरह बनाए रखना चाहते हैं।
3. विधायकों को जमीन पर उतरने का आदेश
18 सितंबर को पटना स्थित JDU कार्यालय में विधायकों और विधान पर्षदों को बूथ स्तर तक पहुंचने का आदेश दिया गया। निशांत कुमार ने कहा, ‘ट्रिपल सी (क्राइम, करप्शन और कम्युनलिज्म) से समझौता नहीं होगा। विधायक अपने क्षेत्र में बूथ स्तर तक जाएं। सरकारी योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंचाएं।’
पार्टी ने विधायकों-विधान पार्षदों के लिए पहली बार ऐसा कार्यक्रम किया है। इस कार्यक्रम में ‘पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च’ की टीम ने विधायकों को सदन की कार्यप्रणाली, कानून बनाने, बजट और विधायी समितियों के कामकाज को बताया।
पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि JDU अब सत्ता में सहयोगी पार्टी है। ऐसे में उसे सरकार में रहते हुए अपने-अपने क्षेत्र के विकास के लिए अधिक से अधिक काम करना होगा। इससे पार्टी का जनाधार बचा रहेगा। अगर यह ताकत बची रही तो भविष्य की चुनावी राजनीति में कुछ भी संभव है।
सवाल-3ः ...तो क्या BJP निशांत को CM बनाएगी?
जवाबः BJP के ट्रैक रिकार्ड को देखें तो इसकी संभावना बेहद कम है। महाराष्ट्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है…
- 2014 से पहले तक भाजपा महाराष्ट्र में शिवसेना की सहयोगी पार्टी के तौर पर काम कर रही थी। 2014 विधानसभा चुनाव के समय BJP-शिवसेना में सीटों का तालमेल नहीं बैठा और दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ीं।
- भाजपा 260 सीटों पर चुनाव लड़कर 122 सीटें जीती। वहीं, शिवसेना 282 सीटों पर चुनाव लड़कर 63 सीटें जीत पाई। भाजपा बहुमत 145 से 23 विधायक दूर थी, फिर भी सरकार भाजपा की बनी और देवेंद्र देवेंद्र फडणवीस भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बने। बाद में शिवसेना भी सरकार में शामिल हो गई।
- फिर आया 2019 विधानसभा चुनाव। भाजपा-शिवसेना इस बार गठबंधन में चुनाव लड़ी। भाजपा कुल 164 सीटों (जिसमें छोटी सहयोगी पार्टियों की 14 सीटें भी शामिल हैं) पर लड़ी। इसमें से वह 105 सीटों पर जीत सकी।
- 124 सीटों पर चुनाव लड़कर शिवसेना 56 सीटें जीती। मतलब दोनों पार्टियों भाजपा और शिवसेना को मिलाकर 105+56= 161 सीटें। बहुमत 145 से 16 ज्यादा।
- जबकि, शरद पवार की NCP 54 और कांग्रेस 45 सीटों पर जीती थी। कांग्रेस और पावर की सीटें मिलकर 99 हो रही थी। इस परिस्थिति को देखते हुए ही शिवसेना ने मुख्यमंत्री पर 50-50 फॉर्मूला यानी ढाई-ढाई साल की डिमांड कर दी।
- चूंकि भाजपा अपना मुख्यमंत्री बना चुकी थी, इसलिए उसने शिवसेना की मांगों को ठुकरा दिया। इससे गठबंधन टूट गया। शिवसेना के उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस और पवार के साथ मिलकर सरकार बनाई।
- विपक्ष में बैठी भाजपा ने इसे जनता के जनादेश के साथ धोखा बताया। फिर शिवसेना में फूट डाली। एकनाथ शिंदे ठाकरे से नाराज हो गए और उन्होंने शिवसेना को तोड़ दिया। ठाकरे परिवार को सबक सीखाने के लिए भाजपा ने एकनाथ शिंदे को समर्थन देकर मुख्यमंत्री बना दिया।
- फिर 2024 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एकनाथ शिंदे को हटाकर अपना मुख्यमंत्री बना दिया।
पॉलिटिकल एनालिस्ट संजय सिंह कहते हैं, ‘एक बार सत्ता में आने के बाद भाजपा दोबारा अपनी सहयोगी पार्टियों को मजबूत नहीं होने देती है। असम-महाराष्ट्र इसका उदाहरण है। इसलिए बिहार में ऐसा करेगी, इसकी संभावना बेहद कम है।’
संजय सिंह कहते हैं, ‘अगर नीतीश कुमार इधर-उधर करेंगे तो ज्यादा संभव है कि उनकी पार्टी टूट जाए। बिहार में काफी लंबी यात्रा के बाद भाजपा को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली है। उसे ऐसे ही अब नहीं जाने देगी।’

निशांत कुमार मंत्री बनने के बाद स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्था को दुरुस्त करने में जुट गए हैं। वह लगातार हॉस्पिटलों का दौरा कर रहे हैं।
सवाल-4ः …तो क्या अभी निशांत CM नहीं बन सकते?
जवाबः संभावना कम है। सूत्रों के मुताबिक, अगर भाजपा को निशांत कुमार को मुख्यमंत्री बनाना होता तो वह नीतीश कुमार के पद छोड़ने के समय ही बना देती। उस वक्त नहीं बने तो अब साफ है कि भाजपा अपनी मर्जी से तो निशांत कुमार को मुख्यमंत्री नहीं बनाने जा रही है।
अगर उनको मुख्यमंत्री बनना है तो NDA से बाहर जाना पड़ सकता है। बिना भाजपा के बिहार में 3 समीकरण…
समीकरण-1ः महागठबंधन के साथ सरकार नहीं बना सकते
बिहार में सरकार बनाने के लिए 243 में से 122 विधायकों की जरूरत है। फिलहाल JDU के पास 85 और RJD के पास 25 विधायक हैं। दोनों को मिलाकर 110 होते हैं। मतलब, महागठबंधन की दूसरी पार्टियों के समर्थन की भी जरूरत होगी।
कांग्रेस के पास 6, वामपंथी पार्टियों के पास 4 और IP गुप्ता की पार्टी IIP के एक विधायक हैं। नीतीश कुमार की JDU और महागठबंधन की सभी पार्टियों के विधायकों को मिलाने के बाद कुल 121 विधायक (85+25+6+4+1) होते हैं। यानी बहुमत से 1 विधायक कम। मतलब सरकार नहीं बन पाएगी।
समीकरण-2ः महागठबंधन और ओवैसी साथ दे तो बनेगी सरकार
निशांत कुमार के साथ अगर महागठबंधन के अलावा असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के 5 विधायक साथ आए तब सरकार बन सकती है। 121+5 यानी 126। मतलब बहुमत से 4 ज्यादा।
बताया जाता है कि अगर नीतीश कुमार भाजपा का साथ छोड़े तो ओवैसी की पार्टी सपोर्ट कर सकती है। RJD ने तो खुला ऑफर तक दे दिया है।
समीकरण-3ः मांझी-कुशवाहा साथ दे तो बना सकते मजबूत सरकार
अंदरखाने चर्चा है कि अगर नीतीश कुमार पाला बदलते हैं तो जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी उनके साथ जा सकती है। हालांकि, दोनों पार्टियों के उनके साथ जाने के अभी कोई संकेत नहीं मिले हैं। दोनों भाजपा से पूरी तरह जुड़ी हुई है।
लेकिन अगर गए तो बिना भाजपा के मजबूत सरकार बन सकती है। इसे ऐसे समझिए…
- मांझी की पार्टी HAM के अभी 5 विधायक हैं। कुशवाहा की पार्टी RLM के 4 विधायक हैं। अगर दोनों साथ आते हैं तो नीतीश कुमार के पास बिना महागठबंधन के (85+5+4) 94 विधायक होंगे। बहुमत से 28 कम।
- RJD के 25, कांग्रेस के 6, लेफ्ट के 4, ओवैसी के 5 विधायक भी साथ आ जाएंगे। इसके अलावा IP गुप्ता भी साथ हो सकते हैं। इस तरह नीतीश कुमार के पास (85+25+6+5+5+4+4+1) कुल 135 विधायक होंगे। यानी बहुमत से 13 ज्यादा। मतलब मजबूत सरकार। हालांकि, तब यह सरकार 8 पार्टियों की होगी।
हालांकि, एक सच यह भी है कि सरकार आंकड़ों के आधार पर बनती तो है, लेकिन ज्यादा दिन तक टिकती मैनेजमेंट और कमेस्ट्री से है। आंकड़ों में बिना भाजपा की बनती यह सरकार कितने दिन चलेगी, इस पर संशय है। क्योंकि…
- RJD के पास 25 और कांग्रेस के पास 6 विधायक हैं। कांग्रेस के 6 में से 3 विधायक मार्च 2025 के राज्यसभा चुनाव में भाजपा के साथ दिखे थे। ऐसे में पहला वार भाजपा कांग्रेस पर कर सकती है।
- सूत्रों के मुताबिक, BJP जरूरत पड़ने पर कभी भी RJD के कुछ विधायक को तोड़ सकती है। RJD के कई विधायक जांच एजेंसियों की रडार पर है। एक ऐसे ही विधायक ने मार्च 2025 में राज्यसभा चुनाव के समय वोट नहीं दिया था।
- RJD और कांग्रेस के विधायक के बाद BJP नीतीश कुमार की पार्टी पर अटैक करेगी। नीतीश स्वस्थ्य संबंधी कारणों से पूरी तरह एक्टिव नहीं हैं। उनकी पार्टी में 10 से ज्यादा विधायक ऐसे हैं, जो RJD से ज्यादा कंफर्टेबल BJP के साथ हैं। वह आगे की राजनीति को देखते हुए पाला बदल सकते हैं।
- सरकार में आते ही सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार के करीबी अधिकारियों को हटाना शुरू कर दिया है। चौधरी प्रशासनिक पकड़ के मामले में मजबूत हो गए हैं, जो सत्ता को बचाए रखने के लिए महत्वपूर्ण कड़ी है।
सवाल-5ः फिर निशांत CM बनेंगे कैसे, उन्हें क्या करना होगा?
जवाबः पहले तो उन्हें थोड़ा इंतजार करना होगा। फिर अगर 2030 विधानसभा चुनाव में जीतकर मजबूती से निशांत को मुख्यमंत्री बनना है तो उन्हें 2 बड़े काम करने होंगे।
1. ललन सिंह-संजय झा दोनों को साथ रखना होगा
निशांत कुमार को अगर आगे चलकर मजबूती से सरकार बनानी है तो उन्हें पार्टी के सीनियर नेताओं खासकर ललन सिंह और संजय झा को साथ रखना होगा। पार्टी के अंदर गुटबाजी को हावी नहीं होने देना होगा।
ललन सिंह पार्टी के पुराने और भरोसेमंद नेता हैं। उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं में भी ठीक-ठाक पैठ है। वह जोड़तोड़ और क्राइसिस संभालने में माहिर माने जाते हैं। हार्ड बार्गेनर हैं।
वहीं, संजय झा संगठन को एक्टिव करके बिना टकराव के अपनी बात मनवाने के लिए जाने जाते हैं। वह सरकार में सहयोगी रहकर भी जमीन पर काम करवाने की क्षमता रखते हैं। वह हर काम बहुत स्मूथली और बिना विवाद के निपटा देते हैं।
नीतीश कुमार के बाद इन दोनों नेताओं के अलावा JDU में कोई नहीं है, जो पार्टी को संभाल सके। इसलिए अंदरखाने चर्चा है कि अगर निशांत को आगे मजबूती से अपनी दावेदारी बनाए रखनी है तो दोनों को एक साथ रखना होगा।

2. नीतीश के सामाजिक आधार में पैठ बनाए रखना होगा
नीतीश कुमार के पास 20 साल से करीब 16% वोट बैंक हैं। कुर्मी-कोयरी और EBC में उनकी पैठ बनी हुई है। नीतीश कुमार के इस सामाजिक ताने-बाने को अपने पक्ष में बनाए रखने के लिए निशांत कुमार को आगे भी काम करना होगा।
हालांकि, निशांत कुमार ने इस पर काम भी शुरू कर दिया है। इसके 2 बड़े उदाहरण…
- नवादा के हिसुआ हत्याकांड में JDU ने तनिक भी देर नहीं की। तुरंत पार्टी ने अपनी फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाई। इसमें उसने EBC समाज से आने वाले नेताओं को ही मेंबर बनाया। निशांत ने इस कदम से साफ मैसेज दिया कि हमारी प्रायरिटी पर भी EBC समाज ही है।
- पार्टी के सीनियर कुशवाहा नेता जिलों में लव-कुश सम्मान समारोह कर रहे हैं। इसके जरिए पार्टी अपने कोर वोटर कोयरी-कुर्मी को अपने साथ जोड़े रखना चाहती है। 19 सितंबर को सासाराम में भगवान सिंह कुशवाहा ने लव-कुश सम्मान समारोह किया।
…और सबसे ज्यादा जरूरी ताकत
दरअसल, बिहार में अकेले दम पर JDU कभी भी अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सकती। लेकिन उनके बिना किसी की बनेगी भी नहीं, यह भी सत्य थी।
नीतीश कुमार इस हकीकत को बखूबी समझते थे। तभी वह हमेशा दूसरी खिड़की खोलकर रखते थे। निशांत कुमार का मुख्यमंत्री बनना इस बात पर भी निर्भर करेगा कि तेजस्वी यादव की ताकत कैसी रहती है।
अगर तेजस्वी यादव की पार्टी 50 से ज्यादा सीटें जीत जाती है और निशांत की पार्टी का प्रदर्शन भी अच्छा रहता है तो उनके मुख्यमंत्री बनने के चांसेज ज्यादा हैं।