Time Updated: Tuesday, October 27, 2026, 23:15 [IST]

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 27 अक्टूबर को मीडिया समूहों की उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें देश के निजता कानून को चुनौती दी गई है। मीडिया समूहों ने इस कानून को प्रेस की स्वतंत्रता के लिए खतरा बताया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले में अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।

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21 समाचार प्रकाशकों के समूह 'डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए)' ने इस कानून को कोर्ट में चुनौती दिया है। इस समूह में नेटवर्क18, एनडीटीवी, इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स इंटरनेट जैसे कई बड़े नाम शामिल हैं। अगले साल लागू होने वाले नए निजता कानून में ऐसे कौन-से प्रावधान हैं, जिनकी वजह से बड़े-बड़े मीडिया समूह खतरा महसूस कर रहे हैं?

मीडिया को नहीं दी गई है छूट

डीएनपीए ने अपनी याचिका में कहा है कि निजता कानून के नए नियमों में पत्रकारीय गतिविधियों जैसे खोजी पत्रकारिता, ग्राउंड रिपोर्टिंग आदि के लिए कोई छूट नहीं दी गई है। डीएनपीए की सुजाता गुप्ता ने न्यूज एजेंसी एएफपी से कहा, "हमारा मानना है कि इसका खोजी पत्रकारिता पर असर हो सकता है और स्रोतों की विश्वसनीयता खतरे में पड़ सकती है।"

न्यूज एजेंसी एएफपी के मुताबिक, यूरोपीय संघ समेत दुनिया के कई हिस्सों में लागू किए गए डेटा प्राइवेसी कानूनों में पत्रकारिता के लिए विशेष छूट दी गई हैं। इन छूटों की वजह से पत्रकारों को अपना काम करने की आजादी मिलती है। भारत में ऐसी किसी छूट का प्रावधान न होने की वजह से मीडिया समूह परेशान महसूस कर रहे हैं।

जिसकी जांच, उसी से अनुमति

नए निजता कानून में प्रावधान है कि किसी व्यक्ति के डिजिटल पर्सनल डेटा का इस्तेमाल करने से पहले उसे इसकी जानकारी देनी होगी और अनुमति लेनी होगी। गूगल और मेटा जैसी तकनीकी कंपनियों पर भी यह लागू होगा. कानून में रिसर्च, आर्काइव और सांख्यिकी से संबंधित कामों को इससे छूट दी गई है लेकिन पत्रकारिता को यह छूट नहीं मिली है।

डीएनपीए का कहना है कि इस कानून की वजह से एक पत्रकार को उसी व्यक्ति से पूर्व सहमति लेनी पड़ सकती है, जिसकी वह जांच करना चाहता है। डीएनपीए के मुताबिक, पत्रकार अगर एक व्यक्ति से उसकी जांच करने की अनुमति लेगा तो "इससे उस व्यक्ति को सबूत नष्ट करने और गवाहों को डराने-धमकाने का मौका मिल जाएगा।"

हटानी पड़ेंगी छपी हुईं रिपोर्टें

यह कानून कहता है कि लोग उनके द्वारा दी गई अनुमति को किसी भी वक्त वापस ले सकते हैं। अगर वे ऐसा करते हैं तो उनके व्यक्तिगत डेटा को एक तय वक्त के भीतर हटाना जरूरी होगा। मीडिया समूहों का कहना है कि खोजी रिपोर्टों का हिस्सा रहे लोग इसका इस्तेमाल, मीडिया आउटलेटों को हतोत्साहित करने के लिए कर सकते हैं।

डीएनपीए को यह भी डर है कि इससे मीडिया आउटलेटों को छपी हुई रिपोर्टें हटानी पड़ सकती हैं। डीएनपीए ने कहा है कि तथ्यात्मक और सार्वजनिक हित से जुड़ी न्यूज रिपोर्टों को हटाने या उनमें भारी बदलाव करने से ऐतिहासिक सार्वजनिक रिकॉर्ड भी बदल जाएगा।

बताने पड़ सकते हैं अपने स्रोत

न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, सरकार व्यक्तिगत डेटा का प्रबंधन करने वाले किसी भी संगठन से उसके पास मौजूद जानकारी देने के लिए कह सकती है। अगर सरकार को लगता है कि उसके अनुरोध का खुलासा होने से राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंच सकता है तो वह संगठन को उस व्यक्ति को जानकारी देने से रोक सकती है, जिसका डेटा साझा किया जा रहा है।

डीएनपीए ने अपनी याचिका में इस प्रावधान को "स्पष्ट रूप से अनियंत्रित" शक्ति बताया है, जिसके इस्तेमाल के लिए किसी अदालती मंजूरी की भी जरूरत नहीं है। डीएनपीए के मुताबिक, इसका उपयोग पत्रकारिता स्रोतों की पहचान करने और उन्हें निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है। मीडिया आउटलेटों को आशंका है कि इस प्रावधान की वजह से पत्रकारों को अपने स्रोत व सूत्र बताने पड़ सकते हैं।

मोटा जुर्माना लगने का भी खतरा

केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक संघीय डेटा संरक्षण बोर्ड, कानून का पालन न करने पर संगठनों पर 2.5 अरब रुपये तक का जुर्माना लगा सकता है। अगर बोर्ड ने किसी संगठन पर कम से कम दो बार जुर्माना लगाया है और उसे ब्लॉक करने की सिफारिश की है, तो सरकार "जनहित में" उसके कंटेंट को ब्लॉक करने का आदेश दे सकती है।

डीएनपीए का कहना है कि ज्यादातर मीडिया संस्थानों, खासतौर पर कम मुनाफा कमा रहे क्षेत्रीय, स्वतंत्र और डिजिटल आउटलेटों के लिए इस तरह का जुर्माना, अस्तित्व का खतरा बन सकता है. समूह ने अपनी याचिका में कहा है कि अभिव्यक्ति की आजादी को "आम जनता के हित में प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है"।

नए निजता कानून पर यह बहस ऐसे समय में हो रही है जब भारत में पहले से ही प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं. रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 157वें स्थान पर है। साल 2014 में भारत 140वें स्थान पर था. हालांकि, बीजेपी शासित केंद्र सरकार इस रैंकिंग को खारिज करती है।

Source: DW