By Oneindia Staff
Published: Thursday, July 23, 2026, 15:24 [IST]
DRDO Adani Defence AEW&C MKII: भारतीय वायुसेना (IAF) की हवाई निगरानी क्षमता को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए DRDO और Adani Defence & Aerospace ने एक ऐतिहासिक साझेदारी का ऐलान किया है। इस रणनीतिक समझौते के तहत संशोधित Airbus A321 प्लेटफॉर्म्स पर भारत का अगली पीढ़ी का AEW&C-MKII (Airborne Early Warning & Control) सिस्टम तैयार किया जाएगा, जिसे वर्ष 2032-33 तक वायुसेना में शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। 'आत्मनिर्भर भारत' पहल के तहत यह कदम देश की रक्षा निर्माण क्षमता के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।
AEW&C-MKII प्रोजेक्ट के तहत DRDO और अडानी डिफेंस मिलकर 6 संशोधित Airbus A321 विमानों पर अत्याधुनिक स्वदेशी एयरबोर्न वार्निंग एंड मिशन सिस्टम का निर्माण और एकीकरण करेंगे। यह सिस्टम लंबी दूरी के दुश्मनों के विमानों, मिसाइलों और ड्रोन को ट्रैक कर वास्तविक समय (Real-Time) में कमांड एंड कंट्रोल प्रदान करेगा। वर्ष 2032-33 तक IAF में शामिल होने वाला यह प्रोजेक्ट 30 वर्षों के MRO और लाइफसाइकिल सपोर्ट से लैस होगा।
प्रोजेक्ट की मुख्य विशेषताएं और अडानी डिफेंस का ऐतिहासिक रोल
यह परियोजना भारत के निजी रक्षा विनिर्माण क्षेत्र के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ती है:
- विमान प्लेटफॉर्म: 6 संशोधित Airbus A321 कमर्शियल जेट्स का उपयोग किया जाएगा, जिन्हें सैन्य श्रेणी के रडार और सेंसर प्लेटफॉर्म में बदला जाएगा।
- 30 वर्षों का लाइफसाइकिल सपोर्ट: सौदे में सिस्टम इंटीग्रेशन, मेंटेनेंस, रिपेयर एंड ओवरहॉल (MRO), इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स और 30 साल की लंबी अवधि के लिए तकनीकी सहायता शामिल है।
- निजी क्षेत्र की बड़ी उपलब्धि: Adani Defence देश की पहली ऐसी निजी भारतीय कंपनी बन गई है जिसे इस स्तर और जटिलता वाले एयरोस्पेस मिशन प्लेटफॉर्म के विकास और जीवनभर के रखरखाव का जिम्मा मिला है।
आधुनिक युद्धक्षेत्र में क्यों जरूरी है AEW&C सिस्टम?
Airborne Early Warning & Control विमानों को आधुनिक हवाई युद्ध का 'फोर्स मल्टीप्लाई' (Force Multiplier) या आसमान में तैरता हुआ कमांड सेंटर कहा जाता है। ये विमान जमीनी रडार की सीमाओं (धरती की गोलाई के कारण उत्पन्न ब्लाइंड स्पॉट्स) से ऊपर उठकर लंबी दूरी तक दुश्मन के लड़ाकू विमानों, क्रूज मिसाइलों और ड्रोन का शुरुआती चरण में ही पता लगा लेते हैं।
नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर सिस्टम अपने लड़ाकू विमानों (जैसे राफेल, सुखोई-30एमकेआई और तेजस) को रीयल-टाइम डेटा ट्रांसफर कर उन्हें बिना अपना रडार ऑन किए दुश्मन पर हमला करने में सक्षम बनाता है।
IACCS नेटवर्क से एकीकरण: अचूक होगी भारत की वायु सुरक्षा
परिचालन शुरू होने के बाद AEW&C-MKII को भारतीय वायुसेना के IACCS (Integrated Air Command & Control System) से एकीकृत किया जाएगा।
यह सिस्टम भारत के सभी जमीनी रडार, नौसेना के जहाजों, नागरिक रडार और वायुसेना के विभिन्न लड़ाकू एस्कॉर्ट्स को एक साझा डिजिटल नेटवर्क से जोड़ता है। इस एकीकरण से युद्ध के दौरान निर्णय लेने की गति (Decision Making) कई गुना तेज हो जाएगी और त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया संभव होगी।
वैश्विक पटल पर भारत का दबदबा: चुनिंदा एलीट ग्रुप में शामिल
स्वदेशी AEW&C तकनीक विकसित करना अत्यंत जटिल माना जाता है। इस परियोजना की सफलता के साथ भारत दुनिया के उन गिने-चुने चुनिंदा देशों के समूह में मजबूती से अपनी जगह पक्की कर लेगा, जिनके पास खुद की एयरबोर्न अर्ली वार्निंग तकनीक मौजूद है।
वर्तमान में केवल अमेरिका, इज़राइल, फ्रांस, चीन और स्वीडन जैसे देशों के पास ही इस श्रेणी की उन्नत एयरबोर्न निगरानी क्षमताएं और बौद्धिक संपदा (IP) मौजूद हैं।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का नया दौर
DRDO की उन्नत अनुसंधान क्षमता और अडानी डिफेंस के मैन्युफैक्चरिंग व MRO इंफ्रास्ट्रक्चर का यह मेल भारत की रक्षा आयात पर निर्भरता को कम करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
2032-33 तक जब ये 6 AEW&C-MKII प्लेटफॉर्म भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल होंगे, तब भारत की सीमाओं की निगरानी न केवल अभेद्य बनेगी, बल्कि यह निजी रक्षा विनिर्माण के क्षेत्र में एक नया मील का पत्थर भी साबित होगा।