Aug 21, 2026 04:19 pm ISTलाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली

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कोर्ट ने कहा कि ED का व्यवहार इस बात को पुख्ता करता है कि एजेंसी मौजूदा ECIR को बनाए रखना चाहती थी और PMLA के तहत मिलने वाली सख़्त कार्रवाई की शक्तियों (जैसे तलाशी, ज़ब्ती, फ़्रीज़िंग और अटैचमेंट) को अपने पास रखना चाहती थी।

Enforcement Directorates

प्रवर्तन निदेशालय का दफ्तर

दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को एक मनी लॉन्ड्रिंग मामले को जबरन खींचने और उसे जीवित रखने की कोशिशों के लिए कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने ईडी की कार्रवाई को "गैर-कानूनी, तर्कहीन और पावर का गलत इस्तेमाल" करार देते हुए संबंधित कार्यवाही को पूरी तरह रद्द कर दिया है। यह मामला दिवंगत राज्यसभा सांसद और अरिस्टो फार्मास्युटिकल्स के संस्थापक डॉ. महेंद्र प्रसाद के परिवार के बीच 4,000 करोड़ रुपये से अधिक के संपत्ति विवाद से जुड़ा हुआ है।

दरअसल, ED ने इस मामले को मनी लॉन्ड्रिंग का केस बनाने के लिए जबरन 6 साल पुरानी FIR को ECIR में जोड़ दिया था ताकि किसी तरह से उस केस को PMLA के तहत लाया जा सके, उसकी प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ECIR) का आधार बनी पहली सूचना रिपोर्ट (FIR) को अदालत ने पहले ही बंद कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि ED का व्यवहार इस बात को पुख्ता करता है कि एजेंसी मौजूदा ECIR को बनाए रखना चाहती थी और PMLA के तहत मिलने वाली सख़्त कार्रवाई की शक्तियों (जैसे तलाशी, ज़ब्ती, फ़्रीज़िंग और अटैचमेंट) को अपने पास रखना चाहती थी।

क्या है पूरा मामला?

अरिस्टो फार्मास्युटिकल्स के संस्थापक डॉ. महेंद्र प्रसाद के निधन के बाद उनके परिवार में संपत्ति के नियंत्रण को लेकर विवाद शुरू हुआ था। इस विवाद के बीच, साल 2021 में एक एफआईआर (FIR) दर्ज की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि प्रसाद की दिवंगत पत्नी सतुला देवी के जाली हस्ताक्षर कर शेयर ट्रांसफर और बैंक दस्तावेज तैयार किए गए हैं। इसी एफआईआर को आधार बनाकर ईडी ने अपना मनी लॉन्ड्रिंग मामला (ECIR) दर्ज किया था। हालांकि, आर्थिक अपराध शाखा (EOW) की जांच और फोरेंसिक रिपोर्ट में पाया गया था कि वे हस्ताक्षर पूरी तरह असली थे और कोई अपराध नहीं हुआ था। जून 2025 में दिल्ली की एक मजिस्ट्रेट अदालत ने EOW की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए केस को बंद कर दिया था।

"मृत पड़े केस" में जान फूंकने की कोशिश

बार एंड बेंच के मुताबिक, 18 अगस्त को दिए गए एक फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस अनीश दयाल ने कहा कि ED ने अगस्त 2025 में एक ऐडेंडम (पूरक दस्तावेज़) के ज़रिए ECIR में 2019 की FIR जोड़ी, जबकि उसे कम से कम 2023 से ही इसके बारे में पता था। कोर्ट ने पाया कि जैसे ही 2021 वाली मूल एफआईआर बंद हुई, उसके ठीक दो महीने बाद अगस्त 2025 में ईडी ने एक नया पैंतरा चला। एजेंसी ने 6 साल पुरानी (2019 की) एक अन्य एफआईआर को इस मामले से जोड़ते हुए एक 'एडेंडम' (परिशिष्ट) जारी कर दिया ताकि उसका केस और उसकी दंडात्मक शक्तियां किसी तरह बनी रहें। यह 2019 की एफआईआर सतुला देवी को बंधक बनाने और जेवर हटाने के आरोपों से संबंधित थी।

जस्टिस अनीश दयाल ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि ईडी का यह आचरण गंभीर चिंताएं पैदा करता है। उन्होंने कहा कि एजेंसी "एक ऐसी कार्यवाही में जान फूंकने की कोशिश कर रही थी जिसका बुनियादी कानूनी आधार ही खत्म हो चुका था।" कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ईडी को इस 2019 की एफआईआर की जानकारी कम से कम 2023 से थी, लेकिन उसने तब तक कोई कार्रवाई नहीं की जब तक कि मुख्य एफआईआर पूरी तरह खारिज नहीं हो गई।

कोर्ट का बड़ा फैसला

अदालत ने ईडी द्वारा जारी किए गए इस एडेंडम को अधिकार क्षेत्र से बाहर और अवैध घोषित कर दिया और इस आधार पर दर्ज पूरी ECIR कार्यवाही को रद्द कर दिया। इसके साथ ही, जस्टिस दयाल ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया कि हाई कोर्ट्स के पास धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत ईडी द्वारा की जाने वाली सिविल कार्यवाहियों (जैसे संपत्ति फ्रीज करना, तलाशी और जब्ती) को चुनौती देने वाली सिविल रिट याचिकाओं पर सुनवाई करने का पूरा अधिकार है।