How Fake Currency and Weapons Made for Movies: जब भी आप किसी बॉलीवुड, साउथ या हॉलीवुड फिल्म में बैंक लूट, गैंगस्टर, पुलिस रेड या वॉर का सीन देखते हैं, तो अक्सर स्क्रीन पर करोड़ों रुपये के नोटों की गड्डियां, पिस्तौल, राइफल, मशीन गन, ग्रेनेड और दूसरे हथियार नजर आते हैं. कई बार ये सीन इतने रियल लगते हैं कि दर्शकों के मन में सवाल उठता है क्या फिल्मों में सचमुच असली नोट और असली हथियार इस्तेमाल किए जाते हैं?
तो इसका जवाब है नहीं, ज्यादातर मामलों में ऐसा नहीं होता. फिल्मों में दिखाई देने वाली नकली करेंसी और हथियारों के पीछे एक पूरी इंडस्ट्री काम करती है. इन चीजों को बनाने से लेकर सेट पर इस्तेमाल करने तक हर कदम पर सख्त नियमों का पालन किया जाता है. आइए जानते हैं कि फिल्मों में इस्तेमाल होने वाली नकली करेंसी और हथियार आखिर कैसे तैयार किए जाते हैं.
फिल्मों के लिए अलग से बनाई जाती है नकली करेंसी
फिल्मों में दिखाई देने वाले नोट देखने में बिल्कुल असली लग सकते हैं, लेकिन उन्हें इस तरह डिजाइन किया जाता है कि उनका रियल करेंसी के रूप में इस्तेमाल न किया जा सके. भारत में असली नोटों की हूबहू कॉपी बनाना कानूनन अपराध है. इसलिए फिल्म निर्माताओं को ऐसे नोट तैयार कराने पड़ते हैं जो कैमरे पर असली जैसे दिखें, लेकिन करीब से देखने पर उनमें कई अंतर नजर आएं.
अक्सर इन नोटों पर "For Motion Picture Use Only", "Specimen", "Dummy", "Movie Prop" या इसी तरह के शब्द लिखे होते हैं. कई बार महात्मा गांधी की तस्वीर की जगह किसी काल्पनिक चेहरे का इस्तेमाल किया जाता है या नोट का रंग, नंबर, आकार या अन्य डिजाइन एलिमेंट थोड़े बदले जाते हैं, ताकि उन्हें असली नोट समझकर कोई इस्तेमाल न कर सके.
कैमरे का कमाल भी करता है मदद
फिल्मों की शूटिंग में कैमरा एंगल, लाइटिंग और एडिटिंग का भी बड़ा रोल होता है. कई बार जो नोट दर्शकों को बिल्कुल असली लगते हैं, वो रियल में सिर्फ ऊपर और नीचे असली जैसी प्रिंटिंग वाले कागज होते हैं, जबकि बीच में साधारण सफेद कागज भरा होता है. दूर से शूट किए गए सीन्स में ये अंतर दिखाई नहीं देता और स्क्रीन पर नोटों की गड्डियां बिल्कुल असली लगती हैं.
नकली नोट बनाने वाली अलग कंपनियां होती हैं
फिल्म इंडस्ट्री में प्रॉप्स बनाने वाली कई खास कंपनियां होती हैं, जो सिर्फ फिल्मों, वेब सीरीज, विज्ञापनों और टीवी शोज के लिए नकली करेंसी, पेपर्स, पासपोर्ट, आईडी कार्ड और बाकी चीजें तैयार करती हैं. ये कंपनियां फिल्म की कहानी के अनुसार अलग-अलग समय की करेंसी भी बनाती हैं. अगर फिल्म 1980 के दशक की है, तो उसी दौर के नोट तैयार किए जाते हैं, जबकि मोर्डर्न फिल्मों के लिए नए डिजाइन के डमी नोट बनाए जाते हैं.
फिल्मों में असली हथियार इस्तेमाल नहीं किए जाते
जिस तरह नकली नोट बनाए जाते हैं, उसी तरह फिल्मों में दिखाई देने वाले ज्यादातर हथियार भी असली नहीं होते. शूटिंग में कई तरह के हथियार इस्तेमाल किए जाते हैं, जिनमें रबर से बने हथियार, फाइबर या प्लास्टिक के मॉडल, धातु से बने डमी हथियार, एयरसॉफ्ट या प्रतिकृति (Replica) हथियार, ब्लैंक फायर (Blank Fire) करने वाले विशेष हथियार, कंप्यूटर ग्राफिक्स (VFX) से तैयार डिजिटल हथियार शामिल हैं. कौन-सा हथियार इस्तेमाल होगा, ये पूरी तरह सीन की जरूरत और सुरक्षा मानकों पर निर्भर करता है.
क्लोज-अप सीन में अलग, एक्शन सीन में अलग
अगर किसी एक्टर को सिर्फ हाथ में पिस्तौल पकड़नी है या टेबल पर बंदूक रखनी है, तो हल्के वजन वाला डमी हथियार इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन अगर सीन में फायरिंग दिखानी हो, तो कई बार खास प्रकार के ब्लैंक फायर हथियार इस्तेमाल किए जाते हैं. इनमें असली गोली नहीं होती, बल्कि सिर्फ आवाज और फ्लैश पैदा करने वाला विशेष कारतूस होता है. इसके बावजूद ये पूरी तरह खिलौना नहीं होते. अगर सुरक्षा नियमों का पालन न किया जाए, तो ब्लैंक फायर भी चोट पहुंचा सकता है. इसलिए सेट पर हथियार विशेषज्ञ की मौजूदगी बेहद जरूरी होती है.
VFX ने बदल दिया पूरा खेल
पिछले कुछ सालों में फिल्मों में कंप्यूटर ग्राफिक्स यानी VFX का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. आज कई फिल्मों में एक्टर के हाथ में सिर्फ डमी गन होती है. गोली चलने की चमक, धुआं, कारतूस का निकलना, दीवार टूटना और विस्फोट जैसी चीजें बाद में कंप्यूटर के जरिए जोड़ी जाती हैं. इस तकनीक से न सिर्फ सुरक्षा बढ़ी है, बल्कि फिल्मिंग भी पहले की तुलना में आसान हो गया है.
बता दें कि फिल्मों में हथियारों के इस्तेमाल के दौरान एक स्पेशल ट्रैनेड एक्सपर्ट्स मौजूद रहता है, जिसे आर्मरर (Armorer) या Weapons Master कहा जाता है. उसकी जिम्मेदारी होती है कि हर हथियार की जांच करे, कलाकारों को सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल करना सिखाए, शूटिंग से पहले और बाद में हथियारों की गिनती करे, किसी भी तरह की दुर्घटना से बचाव सुनिश्चित करे, किसी भी एक्टर को बिना अनुमति हथियार छूने या इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं होती.
नकली हथियार भी क्यों दिखते हैं असली?
आजकल 3D प्रिंटिंग, हाई-रिजॉल्यूशन मोल्डिंग और एडवांस पेंटिंग तकनीकों की मदद से ऐसे हथियार बनाए जाते हैं, जिन्हें देखकर असली और नकली में फर्क करना बेहद मुश्किल हो जाता है. फिल्मों के लिए बने प्रॉप्स में वजन, रंग, धातु जैसी फिनिश और छोटी-छोटी डिटेल्स पर खास ध्यान दिया जाता है, ताकि कैमरे पर वो बिल्कुल वास्तविक दिखाई दें.
फिल्मों में सोना और हीरे भी होते हैं नकली
सिर्फ नोट और हथियार ही नहीं, फिल्मों में दिखाई देने वाले सोने की ईंटें, हीरे, महंगे गहने, ताज और खजाने भी ज्यादातर नकली होते हैं. इनके लिए फाइबर, रेजिन, प्लास्टिक, ऐक्रेलिक और हल्की धातुओं का इस्तेमाल किया जाता है. बाद में सही लाइटिंग और कैमरा एंगल की मदद से इन्हें बेहद कीमती दिखाया जाता है.
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