Published: Thursday, August 6, 2026, 9:30 [IST]
Delimitation vs FCRA Bill: संसद का मानसून सत्र लगातार ठप पड़ा है लेकिन असली सियासी लड़ाई सिर्फ हंगामे तक सीमित नहीं है। पर्दे के पीछे दो बड़े मुद्दे सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। पहला विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act (FCRA) Amendment Bill) 2026 और दूसरा परिसीमन (Delimitation) से जुड़ा प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयक। दोनों बिलों की राजनीति अब एक-दूसरे से जुड़ती दिख रही है। यही वजह है कि सरकार के सामने ऐसी स्थिति बन गई है, जहां एक कदम आगे बढ़ाने पर दूसरा कदम मुश्किल हो सकता है।
संसद के भीतर विपक्ष लगातार प्रदर्शन कर रहा है। दूसरी तरफ सरकार अहम विधेयकों को आगे बढ़ाने की कोशिश में है। लेकिन FCRA बिल पर जिन क्षेत्रीय दलों की नाराजगी सामने आ रही है, उन्हीं दलों के समर्थन की जरूरत भविष्य में परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन के लिए भी पड़ सकती है। यहीं से बीजेपी के लिए असली राजनीतिक गणित शुरू होता है।
FCRA संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए सरकार को साधारण बहुमत चाहिए। लेकिन परिसीमन से जुड़ा प्रस्तावित संविधान संशोधन बिल अलग मामला है। संविधान संशोधन के लिए दोनों सदनों में ज्यादा समर्थन जुटाना पड़ता है। ऐसे में सरकार सिर्फ NDA के भरोसे नहीं रह सकती। उसे दूसरे दलों का भी सहयोग चाहिए होगा।
यही वजह है कि कई राजनीतिक दलों का रुख अब बेहद अहम हो गया है। जिन पार्टियों से परिसीमन पर बातचीत चल रही है, वही FCRA बिल के मौजूदा मसौदे पर सवाल उठा रही हैं। इससे सरकार के सामने राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है।
क्या है बीजेपी का असली सियासी धर्मसंकट?
सरकार को डर है कि FCRA कानून को सख्त बनाने के चक्कर में कहीं परिसीमन बिल का समर्थन करने वाले दल छिटक न जाएं। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी बताती है कि DMK, NCP-SP और कुछ दूसरे विपक्षी दल FCRA संशोधन विधेयक के मौजूदा स्वरूप से संतुष्ट नहीं हैं।
उनका कहना है कि बिल को जल्दबाजी में पास करने के बजाय Joint Parliamentary Committee (JPC) के पास भेजा जाना चाहिए, ताकि हर प्रावधान पर विस्तार से चर्चा हो सके। YSRCP जैसी क्षेत्रीय पार्टियां संसद में सीटों की संख्या 50% बढ़ाने वाले परिसीमन बिल पर सरकार का साथ देने को तैयार दिखती हैं। हालांकि FCRA के मौजूदा मसौदे को लेकर उनकी नींद उड़ी हुई है।
एक दक्षिण भारतीय क्षेत्रीय पार्टी ने भी साफ संकेत दिया कि उसके लिए वोटिंग से दूर रहना विकल्प नहीं है। पार्टी का कहना है कि अगर सरकार उनकी आपत्तियों पर बदलाव करती है, तभी समर्थन पर विचार होगा। नहीं तो बिल के खिलाफ वोट दिया जाएगा। पार्टी की चिंता यह भी है कि बिल के कुछ प्रावधान उसके अल्पसंख्यक वोटर बेस से जुड़े संस्थानों को प्रभावित कर सकते हैं।
दक्षिण की इन पार्टियों का मुख्य वोटर बेस अल्पसंख्यक और ईसाई समुदाय है। FCRA के सख्त नियमों से इस वोट बैंक के नाराज होने का खतरा है। YSRCP से जुड़े सूत्रों का कहना है कि वे संसद में FCRA बिल पर वोटिंग से वॉकआउट करने का जोखिम नहीं ले सकते। या तो वे समर्थन करेंगे या विरोध, और मौजूदा स्वरूप में समर्थन करना उनके लिए अपने राजनीतिक आधार को चोट पहुंचाने जैसा होगा।
FCRA बिल पर आखिर विवाद किस बात का है?
विपक्षी दलों और कई सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं की सबसे बड़ी चिंता उन प्रावधानों को लेकर है, जिनमें FCRA के तहत फंड पाने वाले संस्थानों की संपत्तियों और सरकारी अधिकारों का दायरा बढ़ाने की बात कही गई है। आलोचकों का कहना है कि अगर कानून का दायरा बहुत व्यापक हुआ, तो शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक काम करने वाले कई संस्थानों पर दबाव बढ़ सकता है।
NCP-SP के एक वरिष्ठ नेता ने अपनी आपत्ति रखते हुए कहा कि "हर दानदाता और हर संस्था को शक की नजर से देखना सही तरीका नहीं है। कई संस्थाएं शिक्षा, अस्पताल और समाज सेवा में अच्छा काम कर रही हैं। इसलिए इस बिल पर और गहराई से चर्चा होनी चाहिए।"
उधर DMK के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि "अगर बिल मौजूदा रूप में आया, तो इसका असर अल्पसंख्यक संस्थानों, शैक्षणिक निकायों और NGO पर पड़ सकता है। ऐसे कानून में संतुलन जरूरी है, ताकि गलत इस्तेमाल की गुंजाइश न रहे।"
सरकार बैकफुट पर आई?
संसद में जारी गतिरोध के बीच सरकार की तरफ से नरम रुख के भी संकेत मिले हैं। सूत्रों के मुताबिक, सरकार विपक्ष से बातचीत के जरिए रास्ता निकालने की कोशिश कर रही है। इसी कड़ी में संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से करीब 50 मिनट तक मुलाकात की। इस दौरान प्रियंका गांधी वाड्रा भी मौजूद रहीं। बाद में रिजिजू ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी बातचीत की।
बताया जा रहा है कि बातचीत में FCRA संशोधन विधेयक, परिसीमन और संसद में जारी गतिरोध जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। यह पिछले दस दिनों में रिजिजू और राहुल गांधी की दूसरी अहम मुलाकात थी।
इसी बीच इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा गया कि प्रस्तावित FCRA संशोधन में ऐसा कोई प्रावधान नहीं होगा, जिससे कानून को पिछली तारीख से लागू कर संस्थानों पर कार्रवाई की जा सके। नागरिक समाज और धार्मिक संगठनों ने इसी आशंका को लेकर चिंता जताई थी।
संसद में हंगामा क्यों नहीं थम रहा?
मानसून सत्र लगातार बाधित रहा। विपक्ष ने छात्र आंदोलन पर कथित पुलिस कार्रवाई, राम मंदिर दान विवाद और दूसरे मुद्दों को लेकर सरकार को घेरा। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की अगुवाई में विपक्षी सांसदों ने संसद तक मार्च भी निकाला।
प्रियंका गांधी ने कहा कि "छात्रों पर हुई कार्रवाई के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। लोकतंत्र में विरोध की आवाज को दबाया नहीं जा सकता।" उधर किरेन रिजिजू ने साफ किया कि फिलहाल मानसून सत्र बढ़ाने या अगस्त में अलग से विशेष सत्र बुलाने का सरकार के पास कोई प्रस्ताव नहीं है। उन्होंने विपक्ष पर सदन की कार्यवाही जानबूझकर बाधित करने का आरोप भी लगाया।
अमित शाह की भूमिका पर सबकी नजर
सरकारी सूत्रों का कहना है कि विपक्ष से सहमति बनाने की कोशिश जारी है और गृह मंत्री अमित शाह संसद में FCRA विधेयक पर सरकार का पक्ष रख सकते हैं। इसके साथ ही दूसरे विपक्षी दलों से भी बातचीत की तैयारी चल रही है, ताकि संसद की कार्यवाही सामान्य हो सके।
इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आवास पर बीजेपी और NDA सांसदों के साथ नाश्ते पर बैठक की। बैठक में संसदीय रणनीति, संगठन और सांसदों से फीडबैक पर चर्चा हुई। यह संसद सत्र के दौरान प्रधानमंत्री की नियमित बैठकों का हिस्सा माना जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक मतलब क्या है?
इस समय सरकार के सामने सिर्फ एक बिल पास कराने की चुनौती नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या वह FCRA पर सख्त रुख रखते हुए उन दलों का भरोसा बनाए रख पाएगी, जिनकी जरूरत आगे परिसीमन जैसे बड़े संविधान संशोधन के लिए पड़ सकती है।
अगर सरकार FCRA पर समझौता करती है, तो अपने समर्थकों को संदेश देना होगा कि बदलाव क्यों किए गए। वहीं अगर वह सख्त रुख पर कायम रहती है, तो उन क्षेत्रीय दलों को साथ रखना मुश्किल हो सकता है, जिनका समर्थन आगे जरूरी हो सकता है। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में इस पूरे घटनाक्रम को बीजेपी के लिए एक बड़े रणनीतिक इम्तिहान के तौर पर देखा जा रहा है।
फिलहाल इतना साफ है कि संसद का गतिरोध सिर्फ हंगामे का मामला नहीं रह गया है। अब यह आने वाले महीनों की राजनीतिक दिशा तय करने वाली बड़ी लड़ाई बन चुका है, जिसमें FCRA और परिसीमन दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई दे रहे हैं।