Aug 01, 2026 11:33 am ISTलाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली

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दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एपी शाह ने कहा कि कार्यकर्ताओं को चुप कराने के लिए कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है। उन्होंने बुलडोजर एक्शन, NEET विवाद और मीडिया पर कार्रवाई को लेकर चिंता जताई।

विरोध को कुचलने के लिए हो रहा कानूनों का दुरुपयोग: दिल्ली HC के पूर्व चीफ जस्टिस

विरोध को कुचलने के लिए हो रहा कानूनों का दुरुपयोग: दिल्ली HC के पूर्व चीफ जस्टिस एपी शाह

दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एपी शाह ने मौजूदा समय में अभिव्यक्ति की आजादी, विरोध के अधिकार और 'बुलडोजर एक्शन' को लेकर गंभीर चिंताएं जाहिर की हैं। उन्होंने कहा है कि आज के दौर में कार्यकर्ताओं और असहमति जताने वालों को चुप कराने के लिए हर तरह के कानूनों और हथकंडों का इस्तेमाल किया जा रहा है। अगर युवा जवाबदेही मांगते हुए किसी राजनेता के इस्तीफे की मांग करते हैं, तो उन्हें लाठियों और एफआईआर का सामना करना पड़ता है। जस्टिस एपी शाह गोवा हाई कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा दिवंगत जस्टिस एचआर खन्ना की याद में आयोजित दूसरे वार्षिक व्याख्यान में बोल रहे थे।

'आलोचना करने वाले मीडिया और कॉमेडियन पर शिकंजा'

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व चीफ जस्टिस ने कहा कि आलोचनाओं से निपटने का सबसे अच्छा तरीका उसे दबाना नहीं, बल्कि उस पर संवाद करना है। लेकिन आज सत्ता में बैठे लोग इसे भूल गए हैं। उन्होंने कई गंभीर उदाहरण दिए। जस्टिस शाह ने कहा कि अगर मीडिया संस्थान मौजूदा सरकार की आलोचना करते हैं, तो उन पर टैक्स के मामले थोप दिए जाते हैं और उनकी वित्तीय जांच शुरू कर दी जाती है।

उन्होंने स्टैंड-अप कॉमेडियन का जिक्र करते हुए कहा कि अगर कोई किसी कॉमेडियन की बात का गलत मतलब निकाल ले और बुरा मान जाए, तो उसे जेल हो जाती है। यहां तक कि कार्यक्रम के आयोजक को भी हफ्तों या महीनों तक जेल में डाल दिया जाता है।

नीट विवाद और युवाओं का प्रदर्शन

हाल ही में नीट पेपर लीक के खिलाफ देश भर में हुए छात्रों के आंदोलन पर जस्टिस शाह ने कहा कि यह सिर्फ एक परीक्षा का विरोध नहीं, बल्कि 'लोकतांत्रिक ऊर्जा के पुनरुत्थान' का प्रतीक है। बहुत से लोगों को लगने लगा था कि विरोध की आवाज खत्म हो गई है, लेकिन इन युवा नागरिकों ने साबित कर दिया कि भारत में लोकतांत्रिक भावना आज भी जिंदा है। उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से पारदर्शिता और जवाबदेही की जायज मांगें रखीं।

'बुलडोजर न्याय' और एनकाउंटर पर कड़े सवाल

जस्टिस शाह ने बुलडोजर पॉलिटिक्स और एनकाउंटर जैसे तौर-तरीकों को कानून के शासन के लिए सीधा खतरा बताया। उन्होंने कहा कि बुलडोजर आज बिना किसी कानूनी मंजूरी और अधिकार के इस्तेमाल की जा रही सत्ता का प्रतीक बन गया है। ऐसे मामलों में राज्य (सरकार) खुद ही जांचकर्ता, अभियोजक, जज और जल्लाद की भूमिका निभा रहा है।

बिना ट्रायल के आरोपियों के घर गिराए जा रहे हैं, जिससे पूरा परिवार और समुदाय बर्बाद हो जाता है। उन्होंने सवाल किया कि अगर कानून की जगह बुलडोजर और एनकाउंटर ले लेंगे, तो फिर अदालतों और जजों की क्या भूमिका रह जाएगी?

'इंटरनेट शटडाउन में भारत सबसे आगे'

भाषण के दौरान उन्होंने इंटरनेट पाबंदियों का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि जब भी सरकार को अपने लिए खतरा महसूस होता है, नागरिकों को बुनियादी संचार से वंचित कर दिया जाता है। भारत में इंटरनेट शटडाउन के मामले सबसे ज्यादा हैं। हाल ही में दिल्ली में भी कुछ समय के लिए मोबाइल नेटवर्क बंद किए गए थे। यह एक ऐसी रणनीति की तरफ इशारा करता है, जहां विमर्श पर पूरी तरह से सरकार का एकाधिकार हो। उन्होंने अफसोस जताया कि फ्री स्पीच पर इसका बुरा असर पड़ रहा है और अदालतें भी इन मामलों की जल्द सुनवाई करने से कतराती दिखती हैं।

जजों के लिए जस्टिस शाह की सलाह

सड़क, कोर्ट रूम और संसद को समाज के पूरक स्तंभ बताते हुए जस्टिस शाह ने जजों की भूमिका पर भी बात की। उन्होंने कहा कि जजों को 'हीरोइक एक्टिविस्ट' यानी नायकों जैसा कार्यकर्ता बनने की जरूरत नहीं है। उन्हें बस कानून के शासन, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और संवैधानिक नैतिकता के प्रति निष्ठा रखते हुए स्वतंत्र और निडर होकर अपना काम करना चाहिए।