
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर अब भारत के पेट्रोल पंपों पर भी दिखाई देने लगा है। कुछ निजी ईंधन कंपनियों ने चुनिंदा पेट्रोल पंपों पर डीजल की बिक्री सीमित कर दी है। जियो-बीपी के कुछ पंपों पर एक ग्राहक को अधिकतम 50 लीटर डीजल देने की सीमा तय किए जाने की खबर है। कुछ जगहों पर एक दिन में कुल बिक्री की सीमा भी करीब 6,000 लीटर रखी गई है।
पंपों पर नई सीमा
रिपोर्ट के मुताबिक जियो-बीपी के कुछ आउटलेट्स पर ग्राहकों को एक बार में 50 लीटर से ज्यादा डीजल नहीं दिया जा रहा है। नायरा एनर्जी के कुछ पंपों पर भी बिक्री की सीमा तय की गई है, हालांकि वहां यह सीमा 70 से 200 लीटर के बीच बताई गई है। ये नियम सभी पंपों पर लागू नहीं हैं।
लंबी दूरी के ट्रक और दूसरे कमर्शियल वाहन इससे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि उन्हें एक बार में बड़ी मात्रा में डीजल की जरूरत पड़ती है। खासकर दूरदराज के इलाकों में कम पंप होने के कारण वाहन चालकों को बार-बार ईंधन भरवाने के लिए रुकना पड़ सकता है।
सरकारी पंपों पर राहत
फिलहाल यह देशभर में डीजल की कमी या सरकारी पंपों पर लागू कोई नई राष्ट्रव्यापी सीमा नहीं है। इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने अपने पंपों पर सामान्य तरीके से ईंधन बिक्री जारी रखने की बात कही है।
इन तीनों सरकारी कंपनियों के पास देश के एक लाख से ज्यादा पेट्रोल पंपों में करीब 90% हिस्सेदारी है। इसलिए निजी कंपनियों के चुनिंदा पंपों पर लगी सीमा का असर अभी पूरे देश में डीजल संकट के रूप में नहीं देखा जा रहा है।
कंपनियों का घाटा बढ़ा
बिक्री सीमित करने की वजह बढ़ती कच्चे तेल की कीमत और पेट्रोल-डीजल की घरेलू कीमतों पर उसका असर है। रेटिंग एजेंसी इक्रा के मुताबिक सितंबर में तेल कंपनियों को पेट्रोल की बिक्री पर करीब 8 रुपये और डीजल पर करीब 9 रुपये प्रति लीटर की अंडर-रिकवरी हो रही है।
इक्रा के अनुमान के अनुसार पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की बिक्री से तेल कंपनियों को रोज करीब 530 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत 21 सितंबर को करीब 117.4 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई थी, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 में इसका औसत करीब 66 डॉलर रहा था।
आम लोगों पर असर
अभी सरकारी पंपों पर सामान्य बिक्री जारी रहने से आम ग्राहकों के लिए देशव्यापी डीजल संकट जैसी स्थिति नहीं है। लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है, तो तेल कंपनियों की लागत और बिक्री के बीच अंतर बढ़ सकता है।
इसका असर आगे चलकर ईंधन की कीमतों, ट्रांसपोर्ट लागत और सामान की ढुलाई पर पड़ सकता है। फिलहाल सबसे ज्यादा ध्यान निजी पंपों पर लागू स्थानीय बिक्री सीमाओं और कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर है।
Kirtika Tyagi
Kirtika Tyagi is a journalist. she is working on sub-editor post and she is expert in International, National, Health, Crime, Lifestyle, Astro beat.