Guru Purnima 2026: आज आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि है. हर साल इस दिन पर गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है. गुरु पूर्णिमा 2026 29 जुलाई को मनाई जा रही है. ऐसे में आज के दिन कई लोग अपने घर में भगवान सत्यनारायण की पूजा करवाते हैं और व्रत कथा का पाठ करवाते हैं. इस दिन योग्य पंडित को घर बुलाकर पूजा-पाठ करवाने से अत्यंत शुभता आती है. इस दिन पर लोग घर में पहले भगवान गणेश की पूजा करवाते हैं और नवग्रह पूजन करवाते हैं और फिर भगवान विष्णु की पूजा करते हैं. इस दौरान सत्यनारायण कथा करवाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है. घर और घर के सभी सदस्यों पर श्रीहरि की कृपा बनी रहती है. आइए पढ़ते हैं श्री सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा...
श्री सत्यनारायण भगवान की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, मुनिश्रेष्ठ नारद दूसरों के कल्याण हेतु सभी लोकों में घूमते हुए एक समय मृत्युलोक में आ पहुंचे. यहां बहुत सी योनियों में जन्मे मनुष्यों को अपने कर्मानुसार अनेक कष्टों से पीड़ित देखकर उन्होंने विचार किया कि ऐसा क्या करने से इन प्राणियों के कष्टों का निवारण हो सकेगा. मन में ऐसा विचार कर श्री नारद जी विष्णुलोक गए. वहां श्वेतवर्ण तथा चार भुजाओं वाले देवों के ईश नारायण को, जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा पद्म थे तथा वरमाला धारण किए हुए थे, को देखकर उनकी स्तुति करने लगे. नारदजी ने कहा, "हे भगवन्! आप अत्यंत शक्तिवान हैं, मन तथा वाणी भी आपको नहीं पा सकती, आपका आदि-मध्य-अन्त भी नहीं है. आप निर्गुण स्वरूप सृष्टि के कारण भक्तों के कष्टों को नष्ट करने वाले हो. आपको मेरा शत-शत नमन है. नारदजी से इस प्रकार की प्रार्थना सुनकर विष्णु भगवान बोले, हे योगिराज! आपके मन में क्या है? आपका किस कार्य हेतु यहाँ आगमन हुआ है? निःसंकोच कहें.
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तब मुनिश्रेष्ठ नारद मुनि ने कहा, मृत्युलोक में सब मनुष्य, जो अनेक योनियों में पैदा हुए हैं, अपने-अपने कर्मों द्वारा अनेक प्रकार के कष्टों के कारण दुःखी हैं. हे स्वामी! यदि आप मुझ पर दया रखते हैं तो बताइये, कि उन मनुष्यों के सब कष्ट थोड़े से ही प्रयत्न से किस प्रकार दूर हो सकते हैं. श्री विष्णु भगवान ने कहा, मनुष्यों के कल्याण हेतु तुमने यह बहुत उत्तम प्रश्न किया है. जिस व्रत के करने से मनुष्य मोह से छूट जाता है, वह व्रत मैं तुमसे कहता हूं, सुनो, अति पुण्य दान करने वाला, स्वर्ग तथा मृत्युलोक दोनो में दुर्लभ, एक अति उत्तम व्रत है जो आज मैं तुमसे कहता हूं. श्री सत्यनारायण भगवान का यह व्रत विधि-विधानपूर्वक सम्पन्न करने पर मनुष्य इस धरती पर सभी प्रकार के सुख भोगकर, मरणोपरान्त मोक्ष को प्राप्त होता है. श्री विष्णु भगवान के ऐसे वचन सुनकर नारद मुनि बोले, "हे भगवन्! उस व्रत का विधान क्या है? फल क्या है? इससे पूर्व किसने यह व्रत किया है तथा किस दिन यह व्रत करना चाहिये? कृपया मुझे विस्तार से समझाए."
श्री विष्णु भगवान ने कहा, "हे नारद! दुःख-शोक एवम् सभी प्रकार की व्याधियों को दूर करने वाला यह व्रत सब स्थानों पर विजय दिलाने वाला है. श्रद्धा और भक्ति के साथ किसी भी दिन, मनुष्य सन्ध्या के समय श्री सत्यनारायण भगवान की ब्राह्मणों एवं बन्धुओं के साथ पूजा करे. भक्तिभाव से नैवेद्य, केले का फल, घी, शहद, शक्कर अथवा गुड़, दूध तथा गेहूं का आटा सवाया लेवे (गेहूं के अभाव में साठी का चूर्ण भी ले सकते हैं). इन सभी को भक्तिभाव से भगवान श्री सत्यनारायण को अर्पण करे. बन्धु-बान्धवों सहित ब्राह्मणों को भोजन कराएं. इसके पश्चात् ही स्वयम् भोजन करे. रात्रि में श्री सत्यनारायण भगवान के गीत आदि का आयोजन कर श्री सत्यनारायण भगवान का स्मरण करते हुये समय व्यतीत करे. इस तरह जो मनुष्य व्रत करेंगे, उनकी मनोकामनाएं अवश्य ही पूर्ण होंगी. विशेषरूप से कलियुग में, मृत्युलोक में यही एक ऐसा उपाय है, जिससे अल्प समय तथा अल्प धन में महान पुण्य की प्राप्ति हो सकती है.
श्री सत्यनारायण व्रत कथा का द्वितीय अध्याय
अति सुंदर काशीपुर नगरी में एक अति निर्धन ब्राह्मण वास करता था. वह भूख और प्यास से व्याकुल होकर हर समय दुखी रहता था. ब्राह्मणों से प्रेम करने वाले श्री विष्णु भगवान ने उसको दुखी देखकर एक दिन बूढ़े ब्राह्मण का वेश धारण कर निर्धन ब्राह्मण के पास जाकर बड़े आदर से पूछा, "हे ब्राह्मण! तुम प्रत्येक क्षण ही दुखी होकर पृथ्वी पर क्यों घूमते हो? हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! अपनी व्यथा मुझसे कहो, मैं सुनना चाहता हूं." कष्टों से घिरे उस ब्राह्मण ने कहा- मैं निर्धन ब्राह्मण हूं, भिक्षा के लिए पृथ्वी पर मारा-मारा फिरता हूं. हे भगवन! यदि आप इससे मुक्ति पाने का कोई उपाय जानते हों तो कृपा कर मुझे बताए.
वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किए हुए भगान श्रीहरि विष्णु तब बोले-हे ब्राह्मण! श्री सत्यनारायण भगवान मनोवांछित फल देने वाले हैं, इसीलिये तुम उनका विधिपूर्वक पूजन करो, जिसके करने से मनुष्य सब दुखों से मुक्त हो जाता है." दरिद्र ब्राह्मण को व्रत का सम्पूर्ण विधान बतलाकर बूढ़े ब्राह्मण का रूप धरे श्री सत्यनारायण भगवान अन्तर्धान हो गए. वृद्ध ब्राह्मण ने जिस व्रत को बतलाया है, मैं उसको अवश्य विधि-विधान सहित करूंगा, ऐसा निश्चय कर वह दरिद्र ब्राह्मण घर चला गया. परन्तु उस रात ब्राह्मण को नींद नहीं आई.
अगले दिन वह जल्दी उठा तथा श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करने का निश्चय कर भिक्षा मांगने के लिए चल दिया. उस दिन उसको भिक्षा में अधिक धन मिला, जिससे उसने पूजा का सभी सामान खरीदा तथा घर आकर अपने बन्धु-बान्धवों के साथ विधिपूर्वक भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत किया. इसके करने से वह निर्धन ब्राह्मण सब कष्टों से छूटकर अति धनवान हो गया. उस समय से वह ब्राह्मण प्रत्येक माह व्रत करने लगा. सत्यनारायण भगवान के व्रत को जो शास्त्रविधि के अनुसार श्रद्धापूर्वक करेगा, वह सब कष्टों से छूटकर मोक्ष प्राप्त करेगा. जो भी मनुष्य श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करेगा, वह सब कष्टों से छूट जायेगा. इस प्रकार नारद जी से सत्यनारायण भगवान का कहा हुआ यह व्रत मैंने तुमसे कहा. हे श्रेष्ठ ब्राहमणों! अब आप और क्या सुनना चाहते हैं, मुझसे कहें?"
तब ऋषियों ने कहा- हे मुनीश्वर! संसार में इस विप्र से सुनकर किस-किस ने इस व्रत को किया, हम सब सुनना चाहते हैं. मुनियों से ऐसा सुनकर श्री सूतजी ने कहा, "हे मुनिगण! जिस-जिस प्राणी ने इस व्रत को किया है, उन सबकी कथा सुनो. एक समय वह धनी ब्राह्मण बन्धु-बान्धवों के साथ शास्त्र विधि के अनुसार अपने घर पर श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत कर रहा था. उसी समय एक लकड़ी बेचने वाला बूढ़ा व्यक्ति वहाँ आया. उसने सिर पर रखा लकड़ियों का गट्ठर बाहर रख दिया और ब्राह्मण के मकान में चला गया. प्यास से व्याकुल लकड़हारे ने विप्र को व्रत करते देखा. वह प्यास को भूल गया. उसने विप्र का अभिनन्दन किया और पूछा, "हे ब्राह्मण! आप यह किसका पूजन कर रहे हैं? इस व्रत को करने से क्या फल मिलता है? कृपा कर मुझे बताएं.
तब उस ब्राह्मण ने कहा- सब इच्छाओं को पूर्ण करने वाला यह श्री सत्यनारायण भगवन का व्रत है. इनकी ही कृपा से मेरे यहां धन एवं ऐश्वर्य का आगमन हुआ है. ब्राह्मण से इस व्रत के विषय में ज्ञात कर वह लकड़हारा अत्यन्त प्रसन्न हुआ. भगवान का चरणामृत लेकर, भोजन करने के पश्चात् वह अपने घर को चला गया. तथा अगले दिन लकड़हारे ने अपने मन में संकल्पल किया कि, "आज गांव में लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा, उसी से भगवान सत्यनारायण का श्रेष्ठ व्रत करूंगा." मन में ऐसा विचार कर वह लकड़हारा लकड़ियों का गट्ठर अपने सिर पर रखकर जिस नगर में धनवान लोग रहते थे, ऐसे सुन्दर नगर में गया. उस दिन उसे उन लकड़ियों का दाम पहले दिनों से चौगुना मिला. तब वह बूढ़ा लकड़हारा बहुत प्रसन्न होकर पके केले, शक्कर, शहद घी, दूध, दही और गेहूं का चूर्ण इत्यादि, श्री सत्यनारायण भगवान के व्रत की सभी सामग्री लेकर अपने घर आया. फिर उसने अपने बन्धु-बान्धवों को बुलाकर विधि-विधान के साथ भगवान का पूजन एवम् व्रत किया. उस व्रत के प्रभाव से वह बूढ़ा लकड़हारा धन-धान्य से युक्त हुआ तथा संसार के समस्त सुख भोगकर बैकुण्ठ को चला गया.
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