Hunkkaar Web Series Review: ओटीटी की दुनिया में ‘ढोंगी बाबा’ नाम का एक ऐसा फॉर्मूला ईजाद हो चुका है, जिसमें हर दूसरा मेकर बहती गंगा में हाथ धोने की फिराक में रहता है. 2020 में बॉबी देओल की ‘आश्रम’ आई, जिसने चिलम, जपनाम और पाखंड का वो चोला पहनाया कि जनता आंखें फाड़कर देखती रह गई. फिर 2023 में ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ में मनोज बाजपेयी ने आसाराम जैसे बाबा की लंका लगाई, और 2024 में जयदीप अहलावत ‘महाराज’ बनकर आ धमक. अब उसी बही-खाते का अगला पन्ना पलटने आई है छह कड़ियों की वेब सीरीज ‘हुंकार’.
इस बार तिलक, माला और प्रवचन का चोला पहनाया गया है हमेशा प्यारे और सीधे-सादे लगने वाले मंझे हुए कलाकार रघुबीर यादव को. किसी शरीफ से दिखने वाले चेहरे के पीछे खूंखार दरिंदे को छुपाना सुनने में तो बड़ा शानदार आइडिया लगता है, मगर क्या सिर्फ चेहरा बदल देने से बरसों पुरानी घिसी-पिटी कहानी में नया करंट आ जाता है? या फिर ये वही पुरानी बासी चाशनी है जिसे नए कुल्हड़ में डालकर परोस दिया गया है? चलिए इस पर विस्तार से बात करते हैं.
कहानी
कहानी का केंद्र है ‘बापजी’ (रघुवीर यादव) का आलीशान आश्रम, जहां प्रवचनों की मधुर तान के पीछे हवस और अंधविश्वास का गंदा खेल चलता है. बापजी का तकियाकलाम है,”हमारा कोई धर्म नहीं, हमारी कोई जाति नहीं.” मगर इस खोखले ज्ञान की आड़ में आश्रम के भीतर चलने वाले विद्यालय की मासूम बच्चियों को शिकार बनाया जाता है. इसी दलदल में फंसती है एक नाबालिग लड़की (अनीत पड्डा). जब वो इस पाखंडी दरिंदे की नीयत और गुनाह का शिकार होती है, तो कई पीड़ितों की तरह घुट-घुट कर जीने के बजाय अपनी रीढ़ सीधी करती है और बगावत का बिगुल फूंक देती है.
लड़की के बेबस और डरे-सहमे मां-बाप (राजेश शर्मा और चारू शंकर) चारों तरफ से सिस्टम और बाबा के गुर्गों के दबाव में पिस रहे हैं. तभी तस्वीर में एंट्री होती है एक सख्त, उसूलपसंद जांच अधिकारी (फातिमा सना शेख) की, जो खाकी वर्दी की लाज बचाने और उस रसूखदार दरिंदे को सलाखों के पीछे धकेलने के लिए अपनी नौकरी तक दांव पर लगा देती है. आगे की लड़ाई आश्रम की चारदीवारी से निकलकर अदालत की दहलीज तक पहुंचती है, जहां सच और सत्ता के बीच ‘हुंकार’ गूंजती है.

फातिमा और अनीत
कैसी है सीरीज?
छह एपिसोड की ये सीरीज उस सड़क पर चलती है जिसका हर गड्ढा और मोड़ दर्शक को पहले से जुबानी याद है. शुरुआत के दो एपिसोड माहौल बांधने की कोशिश करते हैं और एक हद तक आपको जोड़े रखते हैं, क्योंकि मामला एक मासूम बच्ची के दर्द और न्याय से जुड़ा है. लेकिन जैसे ही कहानी तीसरे एपिसोड की ओर बढ़ती है, इसका खिंचाव किसी चूइंग गम की तरह लंबा होने लगता है. मेकर्स ने छह कड़ियों की फुटेज भरने के लिए इतने सारे साइड-ट्रैक घुसेड़ दिए हैं कि मुख्य मुद्दे की तपिश ठंडी पड़ने लगती है. कहानी में एक अंतरात्मा के बोझ तले दबा टीवी एंकर (अर्जुन माथुर) आ जाता है, फिर अपने बीमार पिता की तीमारदारी में उलझा वकील (मोहम्मद जीशान अय्यूब) आ धमकता है, और सामने खड़ा कर दिया जाता है एक बेहद चालाक, मूंछों पर ताव देने वाला नामी वकील (राम कपूर). इसके अलावा बाबा का एक ऐसा चेला भी है जिसे उसने कभी गटर से उठाकर अपना गुलाम बना लिया था. इतने सारे किरदारों का मेला लगाने के चक्कर में सीरीज अपनी मूल स्पीड और धार दोनों गंवा बैठती है.
निर्देशन और राइटिंग
डायरेक्टर नित्या मेहरा और करण डी. कपाड़िया के हाथ में एक ऐसा संवेदनशील और ज्वलंत मुद्दा था जिस पर छाती चीर देने वाला ड्रामा रचा जा सकता था. मगर उनकी कलम और विजन में वो पैनापन नहीं दिखा. राइटिंग डिपार्टमेंट ने बहुत ही सेफ रास्ता चुना है. कई दृश्य तो इतने बचकाने और फिल्मी लगते हैं कि हकीकत से उनका कोई लेना-देना नहीं दिखता. मिसाल के तौर पर, फातिमा का किरदार अपने सीनियर अफसर को मनाने के लिए चलती ट्रेन में जाकर उसे परेशान करने लगता है. पर्दे पर भले इसे ‘दबंगई’ का जामा पहनाया जाए, लेकिन असल जिंदगी में ऐसा करने पर अफसर की टेबल पर सस्पेंशन का नोटिस सबसे पहले गिरता.
बाबा के आस-पास का जो गुट दिखाया गया है, उनकी राइटिंग भी बहुत लचर है. जोया हुसैन मुख्य शिष्या के रूप में सिर्फ खाली घूरती रह जाती हैं, और आश्रम की बच्चियों की इंचार्ज (नीलम गुप्ता) का किरदार भी कोई नया असर नहीं छोड़ पाता. सबसे बुरा हाल तो बापजी के उस वारिस का है, जो विलेन बनने की ऐसी कोशिश करता है कि डर लगने के बजाय दर्शक को दया आने लगती है.
एक्टिंग
इस पूरी सीरीज की नैया अगर डूबते-डूबते बचती है, तो उसका श्रेय सिर्फ और सिर्फ इसकी महिला किरदारों को जाता है. ‘सैयारा’ के बाद अनीत पड्डा ने साबित कर दिया है कि वे सिर्फ चेहरे की मासूमियत के दम पर नहीं, बल्कि अपनी आंखों के एक्सप्रेशन से भी पूरी महफिल लूट सकती हैं. एक डरी-सहमी बच्ची से लड़ती हुई दबंग गर्ल बनने का उनका ट्रांसफॉर्मेशन शानदार है. फातिमा सना शेख ने अपनी जांच अधिकारी की भूमिका को बिना किसी बनावटी तड़क-भड़क के बहुत सादगी और गरिमा के साथ निभाया है.

हुंकार सीरीज
रघुबीर यादव के अभिनय पर उंगली उठाना सूरज को दीया दिखाने जैसा है. उन्होंने उस ढोंगी और भेड़िया बने ‘बापजी’ की धूर्तता को अपने लहजे में बहुत सलीके से घोला है. उनकी जुबान से निकलने वाले खोखले उपदेश सुनकर घिन आती है, जो उनके एक्टिंग की जीत है. लेकिन अफसोस कि कमजोर पटकथा उनके इस दानवी रूप को वो विस्तार नहीं दे पाती जो जयदीप अहलावत या बॉबी देओल को मिला था. जीशान अय्यूब हमेशा की तरह अपने रोल में खरे उतरे हैं और सीमा बिस्वास ने अदालत की जज बनकर अपने संक्षिप्त रोल में भी वजन बनाए रखा है.
क्यों देखें और क्यों न देखें?
अनीत पड्डा और फातिमा सना शेख की ईमानदार एक्टिंग के लिए इसे देखा जा सकता है. अदालत के आखिरी हिस्से में अनीत का वो भाषण रोंगटे खड़े करता है, जहां वो ये तीखा सवाल दागती हैं कि हर बार बलात्कार की शिकार लड़की को ही कठघरे में खड़ा करके वही घिनौनी दास्तान दोहराने पर मजबूर क्यों किया जाता है? ये शर्म पीड़िता की नहीं, उस दरिंदे की है! ये सीन सीधे दिल पर चोट करता है.
अगर आप ‘आश्रम’ या ‘बंदा’ के बाद इस जॉनर में कुछ नया, चौंकाने वाला या तेज-तर्रार देखने की उम्मीद कर रहे हैं, तो ‘हुंकार’ आपको भारी निराशा देगी. घिसा-पिटा ट्रीटमेंट, गैर-जरूरी किरदारों की भीड़ और सुस्त रफ्तार कई जगहों पर उबाऊ साबित होती है. जो बात तीन घंटे की कसी हुई फिल्म में कही जा सकती थी, उसे बेवजह छह लंबे एपिसोड तक खींच दिया गया है.

‘हुंकार’ कैसी है?
‘हुंकार’ उस नगाड़े की तरह है जिसकी गूंज दूर तक जा सकती थी, लेकिन यहां उसकी आवाज बिखर कर रह गई. एक नाबालिग लड़की के इंसाफ की पुकार और ढोंगी साधुओं के काले साम्राज्य का पर्दाफाश करना बेशक एक जरूरी विषय था, मगर कहानी कहने का तरीका इतना पुराना और बासी है कि दर्शक पहले से ही जानता है कि अगले मोड़ पर क्या होने वाला है. उम्दा अदाकारों की फौज और अनीत पड्डा की चीख इस शो को पूरी तरह गर्त में जाने से तो बचा लेती है, मगर ये उन दोनों जांबाज महिलाओं के संघर्ष के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाती.

सोनाली नाईक
सोनाली करीब 15 सालों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रहार न्यूज पेपर से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी. इस न्यूज पेपर में बतौर रिपोर्टर काम करते हुए सोनाली ने एंटरटेनमेंट बीट के साथ-साथ सीसीडी (कॉलेज कैंपस और ड्रीम्स) जैसे नए पेज पर काम किया. उन्होंने वहां 'फैशनेरिया' नाम का कॉलम भी लिखा. इस दौरान एलएलबी की पढ़ाई भी पूरी की, लेकिन पत्रकारिता के जुनून की वजह से इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने के इरादे से 2017 में टीवी9 से सीनियर कोरेस्पोंडेंट के तौर पर अपनी नई पारी शुरू की. टीवी9 गुजराती चैनल में 3 साल तक एंटरटेनमेंट शो की जिम्मेदारी संभालने के बाद सोनाली 2020 में टीवी9 हिंदी डिजिटल की एंटरटेनमेंट टीम में शामिल हुईं. सोनाली ने टीवी9 के इस सफर में कई ब्रेकिंग, एक्सक्लूसिव न्यूज और ऑन ग्राउंड कवरेज पर काम किया है. हिंदी के साथ-साथ गुजराती, मराठी, इंग्लिश भाषा की जानकारी होने के कारण डिजिटल के साथ-साथ तीनों चैनल के लिए भी उनका योगदान रहा है. रियलिटी शोज और ग्लोबल कंटेंट देखना सोनाली को पसंद है. नई भाषाएं सीखना पसंद है. संस्कृत भाषा के प्रति खास प्यार है. नुक्कड़ नाटक के लिए स्क्रिप्ट लिखना पसंद है. सोनाली के लिखे हुए स्ट्रीट प्लेज 'पानी', 'मेड इन चाइना' की रीडिंग 'आल इंडिया रेडियो' पर सोशल अवेयरनेस के तौर पर की जा चुकी है.
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