भारत में जलवायु परिवर्तन के कारण भीषण गर्मी और 'हीटवेव' का प्रभाव क्षेत्र लगातार खतरनाक रूप से बढ़ रहा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और विभिन्न शोध अध्ययनों के आंकड़ों से खुलासा हुआ है कि पिछले 52 वर्षों में देश में भीषण गर्मी वाले हॉटस्पॉट के दायरे में 40 प्रतिशत तक का बड़ा विस्तार दर्ज किया गया है, जिसमें उत्तर-पश्चिम भारत सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र बनकर उभरा है।
हीटवेव के लगातार बढ़ते दायरे का सीधा नकारात्मक असर देश की अर्थव्यवस्था और मानव जीवन पर पड़ रहा है।
- Published: 19 Sep 2026, 07:08 AM IST
- Last Updated: 19 Sep 2026, 07:10 AM IST
वैश्विक तापमान में हो रही लगातार वृद्धि और बदलते मौसमी पैटर्न के बीच भारत में भीषण गर्मी का संकट हर साल अधिक भयावह रूप लेता जा रहा है। अध्ययनों और मौसम विज्ञानियों के आंकड़ों से स्पष्ट हुआ है कि 1970 के दशक से लेकर अब तक भारत में हीटवेव के भौगोलिक दायरे में करीब 40 फीसदी की बढ़ोतरी हो चुकी है।
इसका सबसे बुरा असर देश के उत्तर-पश्चिम और मध्य भागों पर पड़ रहा है, जहां न केवल भीषण गर्मी वाले दिनों की संख्या बढ़ी है, बल्कि रात के समय भी तापमान में गिरावट न आने से आम जनजीवन पूरी तरह प्रभावित हो रहा है।
उत्तर-पश्चिम भारत बना देश का मुख्य 'हॉटस्पॉट'
अध्ययन के अनुसार, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का बड़ा मैदानी क्षेत्र लू का मुख्य गढ़ बन चुका है। पहले जहां गर्मी के दौर कुछ ही दिनों तक सीमित रहते थे, वहीं अब मार्च और अप्रैल के महीने से ही भीषण लू के लंबे स्पेल शुरू हो जाते हैं।
इसके साथ ही, हिमालयी राज्यों जैसे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भी सामान्य से बहुत अधिक तापमान और असमय गर्मी के मामले दर्ज किए जा रहे हैं, जो वहां के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बड़ा खतरा पैदा कर रहे हैं।
52 वर्षों का आंकड़ा: क्यों फैल रहा है लू का दायरा?
पिछले पांच दशकों से अधिक समय के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि लू के इस विस्तार के पीछे मुख्य रूप से वैश्विक तापमान वृद्धि और अनियंत्रित शहरीकरण जिम्मेदार हैं। प्रशांत महासागर में अल-नीनो के प्रभाव और वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के जमाव के कारण भारत के मौसम में नमी का संतुलन बिगड़ रहा है।
इसके अतिरिक्त, शहरों में कंक्रीट के निर्माण, वनों की कटाई और प्राकृतिक जल निकायों के घटने से 'अर्बन हीट आइलैंड' का प्रभाव बन रहा है, जिससे मैदानी इलाकों में गर्मी कई दिनों तक एक ही स्थान पर टिकी रहती है।
स्वास्थ्य, कृषि और अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रहार
हीटवेव के लगातार बढ़ते दायरे का सीधा नकारात्मक असर देश की अर्थव्यवस्था और मानव जीवन पर पड़ रहा है। भीषण गर्मी के कारण हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों के मामलों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हो रही है।
इसके साथ ही, समय से पहले अत्यधिक गर्मी पड़ने से गेहूं और अन्य रबी फसलों के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। भीषण गर्मी के दौरान एयर कंडीशनर और कूलिंग उपकरणों के अत्यधिक उपयोग से देश भर के पावर ग्रिड पर भी बिजली की मांग का रिकॉर्ड दबाव बन जाता है।
प्रशासनिक कदम और भविष्य की रणनीति
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है जब पारंपरिक आपातकालीन राहत से इतर एक ठोस और दीर्घकालिक रणनीति अपनाई जाए। राज्यों को अपने 'हीट एक्शन प्लान' (HAP) को केवल कागजों तक सीमित न रखकर जिला और स्थानीय निकाय स्तर पर कड़ाई से लागू करना होगा।
शहरों में ग्रीन कवर बढ़ाने, भवनों के कूलिंग डिजाइन में सुधार करने और सार्वजनिक स्थानों पर आपातकालीन पेयजल व शेल्टर की व्यवस्था करने जैसी पहलों के माध्यम से ही इस बढ़ते पर्यावरणीय खतरे का मुकाबला किया जा सकता है।