संसद में जारी मॉनसून सेशन के बीच एक बड़ा अपडेट आया है. जानकारी के मुताबिक इस सेशन में 'एक देश, एक चुनाव' से जुड़ा बिल पेश नहीं किया जाएगा. इसलिए इस पर चर्चा नहीं होगी. वहीं ये भी सामने आया है कि जेपीसी को इस बिल पर अपनी रिपोर्ट संसद के शीतकालीन सत्र के लास्ट वीक के पहले दिन तक सौंपनी होगी.
बढ़ाया गया जेपीसी का कार्यकाल
संसद का मॉनसून सेशन जारी है और इस सत्र को लेकर चर्चा थी कि सरकार 'वन नेशन वन इलेक्शन' बिल को इसमें पेश कर सकती है. लेकिन सामने आया है कि 'एक देश एक चुनाव' से जुड़ा, संविधान संशोधन विधेयक मौजूदा संसद सत्र में पेश नहीं किया जाएगा. इस विधेयक की जांच के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का कार्यकाल बढ़ा दिया गया है. अब समिति को अपनी रिपोर्ट संसद के शीतकालीन सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक सौंपनी होगी.
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जेपीसी का कार्यकाल बढ़ाए जाने के बाद साफ हो गया है कि समिति अपनी रिपोर्ट मौजूदा सत्र के दौरान पेश नहीं करेगी. ऐसे में 'एक देश, एक चुनाव' विधेयक पर आगे की प्रक्रिया अब शीतकालीन सत्र में रिपोर्ट आने के बाद ही आगे बढ़ने की संभावना है.
मार्च में सामने आई थी EAC-PM की रिपोर्ट
बता दें कि इसी साल मार्च-2026 में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने एक रिपोर्ट जारी की थी. इसमें बताया गया था कि अगर देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते हैं, तो इससे न सिर्फ सरकारी खजाने की बचत होगी, बल्कि प्रशासनिक सुविधा भी बढ़ेगी. इस रिपोर्ट के बाद ये अनुमान लगाया जा रहा था कि सरकार अगले किसी सेशन में इस बिल को सदन में पेश कर सकती है.
वन नेशन वन इलेक्शन के क्या हैं फायदे?
रिपोर्ट के मुताबिक, एक साथ चुनाव होने से 5 साल के चक्र में चुनाव ड्यूटी में लगने वाले कर्मचारियों की संख्या में 26 लाख (लगभग 28%) की कमी आएगी. रिपोर्ट में ये भी दावा किया गया है कि चुनाव प्रक्रिया में लगने वाले कुल वर्किंग डेज में करीब 1.04 करोड़ दिनों की भारी बचत हो सकती है.
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि चुनाव ड्यूटी में तैनात होने वाले ज्यादातर स्टाफ टीचर होते हैं. ज्यादातर मतदान केंद्र स्कूलों में बनाए जाते हैं. जब बार-बार चुनाव नहीं होंगे, तो शिक्षकों को ड्यूटी पर कम जाना पड़ेगा. इससे स्कूलों में पढ़ाई का नुकसान कम होगा और बच्चों के सीखने के नतीजों में सुधार होगा.
निर्वाचन आयोग का मानना है कि एक साथ चुनाव कराने के लिए सुरक्षा के इंतजाम बहुत बड़े स्तर पर करने होंगे. हालांकि, अलग-अलग राज्यों के चुनावों के लिए बार-बार सुरक्षा बलों को भेजने की जरूरत खत्म हो जाएगी. सुरक्षा कर्मियों पर पड़ने वाले असर का पता भविष्य में ही चल पाएगा, लेकिन प्रशासनिक बोझ कम होना तय है.
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