Kalawa Rules: कलावा कितने दिन तक बांधना चाहिए? जानें उतारने का सही नियम

कलावा उतारने का नियमImage Credit source: pexels

Kalawa Religious Significance: हिंदू धर्म में पूजा-पाठ, हवन और शुभ कार्यों के दौरान कलाई पर कलावा बांधने की परंपरा है. इसे मौली या रक्षासूत्र भी कहा जाता है. लाल और पीले रंग का यह धागा धार्मिक आस्था, शुभता और रक्षा का प्रतीक माना जाता है. मंदिर में पूजा करने, घर में अनुष्ठान कराने या किसी मांगलिक कार्य के दौरान पंडित अक्सर भक्तों की कलाई पर कलावा बांधते हैं. लेकिन कई लोग कलावा बांधने के बाद उसे लंबे समय तक हाथ में पहने रहते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि इसे कितने दिन तक बांधकर रखना चाहिए? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कलावा को लगभग 21 दिनों तक धारण करने की परंपरा बताई जाती है. इसके अलावा, अगर धागा बहुत गंदा हो जाए, उसका रंग उतरने लगे या वह टूटने लगे, तो उसे बदलने पर भी विचार किया जाता है. आइए जानते हैं कलावा उतारने से लेकर पहनने तक क्या जरूरी नियम होते हैं.

कलावा कितने दिन तक बांधकर रखना चाहिए?

धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित ज्योतिषीय सलाह के अनुसार, हाथ में बंधे कलावे को लगभग 21 दिनों के बाद बदलने या उतारने की बात कही जाती है. कुछ परंपराओं में इसे इससे अलग अवधि तक भी धारण किया जाता है. इसलिए 21 दिन को सभी के लिए जरूरी नियम नहीं माना गया.

कलावा उतारने के लिए कौन-सा दिन माना जाता है शुभ?

कुछ धार्मिक मान्यताओं में मंगलवार और शनिवार को कलावा बदलने या उतारने के लिए शुभ माना जाता है. कलावा उतारते समय मन में श्रद्धा रखें और इसे सम्मान के साथ हटाएं. अगर आप नया कलावा बांधना चाहते हैं, तो पूजा के समय या अपने परिवार में प्रचलित शुभ अवसर पर भी नया कलावा बांध सकते हैं.

कलावा उतारने के बाद उसका क्या करना चाहिए?

धार्मिक मान्यताओं में कलावा को सामान्य कचरे में फेंकने के बजाय सम्मानपूर्वक रखने या मिट्टी में दबाने की परंपरा बताई जाती है. कुछ लोग इसे गमले की मिट्टी में दबा देते हैं, जबकि कुछ परंपराओं में इसे किसी पवित्र स्थान पर रखने की सलाह दी जाती है.

कलावा किस हाथ में बांधना चाहिए?

प्रचलित हिंदू धार्मिक परंपरा के अनुसार, पुरुषों और अविवाहित लड़कियों की दाहिनी कलाई पर कलावा बांधा जाता है, जबकि विवाहित महिलाओं के लिए बाईं कलाई पर बांधने की परंपरा बताई जाती है.

हिंदू धर्म में कलावा का महत्व

हिंदू धर्म में कलावा (मौली) को केवल एक धागा नहीं, बल्कि भगवान का सुरक्षा कवच माना जाता है. किसी भी पूजा, हवन या शुभ काम के समय इसे कलाई पर इसलिए बांधा जाता है ताकि व्यक्ति नकारात्मक ऊर्जा और बुरी नजर से बचा रहे. मान्यता है कि इसमें त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और त्रिदेवियों (लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा) का वास होता है, जो हमें सुख, शांति और सुरक्षा देते हैं. पुरुषों और अविवाहित कन्याओं के दाएं हाथ में तथा विवाहित महिलाओं के बाएं हाथ में इसे बांधा जाता है.

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.

वरुण चौहान

वरुण चौहान

इलेक्‍ट्रानिक और डिजिटल मीडिया में करीब एक दशक से ज्यादा का अनुभव. 2008 में एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन (AAFT) नोएडा से पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद कुछ अलग और नया करने की सोच के साथ मीडिया में अपने सफर की शुरुआत की. शुरुआत से ही मेरी रुचि उन विषयों को आम लोगों तक पहुंचाने में रही है, जो भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं से जुड़े हैं. अपने करियर के दौरान Channel One News, Sahara Samay, A2Z News, News Express, National Voice और पंजाब केसरी डिजिटल जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला. इन संस्थानों में काम करते हुए समाचार लेखन, फील्ड रिपोर्टिंग,और डिजिटल कंटेंट को सीखने का अनुभव मिला. फिलहाल देश के सबसे बड़े न्यूज नेटवर्क TV9 भारतवर्ष में धर्म और आस्था से जुड़ी खबरों, धार्मिक आयोजनों, ज्योतिष, वास्तु, पौराणिक कथाओं, मंदिरों की परंपराओं और व्रत-त्योहारों से जुड़े विषयों को सरल, सहज और तथ्यपूर्ण भाषा में पाठकों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभा रहा हूं. महाकुंभ 2025 की कवरेज मेरे करियर के महत्वपूर्ण अनुभवों में शामिल है, जहां करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, अखाड़ों की परंपराओं, संत समाज की गतिविधियों और कुंभ से जुड़े धार्मिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर विस्तार से लिखने का अवसर मिला. इसके अलावा चारधाम यात्रा, सावन, नवरात्रि, दीपावली, होली, छठ पूजा, अमरनाथ यात्रा, रमज़ान और अन्य प्रमुख धार्मिक आयोजनों पर भी लगातार लेखन किया है. भारतीय संस्कृति, धर्म-दर्शन, ज्योतिष, अंक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र, पुराणों और लोक आस्थाओं के अध्ययन में विशेष रुचि रखता हूं. मेरा प्रयास हमेशा यही रहता है कि धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों को सरल भाषा के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया जाए, ताकि वे अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को बेहतर ढंग से समझ सकें.

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