Maa Chinnamasta: हिंदू धर्म और तंत्र शास्त्र में 'दस महाविद्याओं' को सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है। 'मां छिन्नमस्ता' इनमें से छठी महाविद्या हैं, जिन्हें साहस, त्याग और शक्ति के सबसे उग्र व हैरान कर देने वाले रूप में पूजा जाता है।

कौन है माँ छिन्नमस्ता?

सनातन परंपरा में 'माँ छिन्नमस्ता' दस महाविद्याओं में एक अत्यंत शक्तिशाली तांत्रिक देवी हैं, जिन्हें छठी महाविद्या के रूप में पूजा जाता है। माता के नाम का शाब्दिक अर्थ है 'छिन्न' अर्थात 'कटा हुआ' और 'मस्ता' अर्थात 'सिर', वे देवी जिनका मस्तक स्वयं उनके ही हाथों द्वारा कटा हुआ है।

कैसा है छिन्नमस्ता माता का स्वरूप?

'मां छिन्नमस्ता का दिव्य स्वरूप' अन्य सभी देवी-देवताओं से बिल्कुल अलग और अद्वितीय है, जिसे देख कर ही मन श्रद्धा और आश्चर्य से भर जाता है। माता अपने एक हाथ में तेज कटार और दूसरे हाथ में अपना ही 'कटा हुआ मस्तक' लिए हुए हैं। सबसे ज्यादा चौंका देने वाला दृश्य, उनके कटे हुए गले से रक्त की तीन तीव्र धाराएं निकल रही हैं। इन तीन धाराओं में से बीच की धारा से स्वयं माता अपने ही रक्त का पान कर रही हैं बाकी बची हुई दो रक्त धाराएं उनके दाएं और बाएं खड़ी उनकी दो परम प्रिय सहेलियों के मुख में जा रही हैं, जिससे वे दोनों तृप्त हो रही हैं।

मानव शरीर के भीतर तीन मुख्य नाड़ियाँ होती हैं 'इड़ा', 'पिंगला', 'सुषुम्ना' और माता के कंठ से निकलने वाली इन तीन धाराओं को 'इड़ा', 'पिंगला' और 'सुषुम्ना' से जोड़कर देखा जाता है। कुछ जगहों पर 'माँ छिन्नमस्ता' को 'माँ चिंतपूर्णी' के नाम से भी जाना जाता है। माता के बिखरे हुए केश, मस्तक पर चमकते तीन नेत्र और कंठ में सजी मुंडों की माला व हड्डियों के आभूषण उनकी असीम तांत्रिक शक्ति को दर्शाते हैं।

'माँ छिन्नमस्ता' का कल्याणकारी और सिद्ध मंत्र!

ॐ ह्रीं छिन्नमस्तायै नमः॥
रोज़ाना शांत मन से इस दिव्य मंत्र का जाप करने से घर के समस्त क्लेशों का नाश होता है और मन को बहुत सुकून मिलता है।

पूजा में ध्यान रखने योग्य बातें!

'माँ छिन्नमस्ता' उग्र देवियों में सबसे प्रमुख हैं, इसलिए उनकी पूजा में किसी भी तरह की लापरवाही या गलती के लिए कोई जगह नहीं होती। उनकी पूजा करते समय इस विशेष बात का ध्यान अवश्य रखें:

माँ छिन्नमस्ता की कठिन तांत्रिक साधना, किसी भी किताब या इंटरनेट से पढ़कर अकेले में शुरू करने की भूल न करें। इन साधनाओं के लिए एक सिद्ध गुरु का मार्गदर्शन और रक्षा कवच मिलना बहुत ज़रूरी है।

कब करें माँ छिन्नमस्ता की पूजा?

हर महीने की अमावस्या, पूर्णिमा, दीपावली की महारात्रि और कालरात्रि के पावन समय पर माता की पूजा तुरंत फल देने वाली मानी जाती है। सामान्य भक्तों के लिए नियम है कि वे इनकी पूजा हमेशा सूर्यास्त के बाद यानी रात्रिकाल में ही करें।

माँ छिन्नमस्ता की दिव्य पौराणिक कथा!

एक बार माता पार्वती अपनी दो परम प्रिय सखियों के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गईं। शांत वातावरण और ठंडे जल का आनंद लेते हुए तीनों ने वहां काफी समय बिताया। नदी से बाहर आते ही, सखियों को अचानक बहुत तेज भूख लगी। अत्यधिक भूख लगने के कारण उनका शरीर काला पड़ने लगा और वे कमजोरी से तड़पने लगीं। उन्होंने अत्यंत करुण स्वर में माता से विनती की, "हे मां! हमें बहुत तेज भूख लगी है, कृपया हमारे भोजन की व्यवस्था करें।

अपनी सखियों की तड़प देख, करुणामयी माता पार्वती ने उन्हें धीरज धराते हुए कहा कि बस कुछ क्षण प्रतीक्षा करो, आश्रम पहुँचते ही मैं तुम्हारे भोजन का प्रबंध कर दूंगी। किन्तु, भूख से व्याकुल सखियों ने अत्यंत व्याकुल होकर कहा, हे जगत जननी! माँ तो अपने बच्चों की भूख तुरंत शांत करती है, फिर आप क्यों हमें प्रतीक्षा करने को कह रही हैं? हम भूख से अपने प्राण त्याग देंगे।

अपनी सखियों की करुण पुकार सुन, माता पार्वती का हृदय ममता से भर उठा। बिना एक पल गवाएं, उन्होंने तुरंत अपने दाहिने हाथ में खड्ग उठाया और एक ही झटके में अपना सिर धड़ से अलग कर दिया। सिर कटते ही उसमें से तीन धाराएं निकलीं, जिसमें से दो धाराएं उनकी सखियों के मुख में गईं और तीसरी धारा से माता ने स्वयं अपनी दिव्य ऊर्जा का पान किया। ममता और इस महात्याग के कारण ही पूरी सृष्टि में वे 'माँ छिन्नमस्ता' के नाम से विख्यात हुईं।

Disclaimer:- उपरोक्त लेख में उल्लेखित सभी जानकारियाँ प्रचलित मान्यताओं और धर्म ग्रंथों पर आधारित है। IBC24.in लेख में उल्लेखित किसी भी जानकारी की प्रामाणिकता का दावा नहीं करता है। हमारा उद्देश्य केवल सूचना पँहुचाना है।

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