सऊदी में दफ्तर, पाकिस्तान के पास कमान...ग्राउंड पर कैसे काम करेगा इस्लामिक NATO? आ गई पूरी डिटेल

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच इस्लामिक NATO जैसा सैन्य गठजोड़

पश्चिम एशिया में एक नॉटो जैसे सैन्य गठजोड़ की नींव जमीन पर उतरते हुए दिख रही है. सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए एक मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट को लागू करने की तैयारी में है. इसका स्थाई सचिवालय सऊदी अरब में बनाया जा सकता है. इस डिफेंस एग्रीमेंट की सबसे खास बात यह होगी की सचिवालय की शुरुआती तीन साल की कमान पाकिस्तान के पास होगी. यानी दफ्तर सऊदी में होगा, लेकिन शुरुआत के 3 साल इसका नेतृत्व पाकिस्तान करेगा.

‘ इस गठजोड़ को इस्लामिक NATO’ क्यों कहा जा रहा है?

7 अगस्त को मक्का में हुए समझौते में तीनों देशों ने सामूहिक रक्षा का सिद्धांत पर सहमति दी थी. इसका इसका मतलब है कि अगर किसी एक देश पर सैन्य हमला होता है, तो वह तीनों के खिलाफ हमला माना जाएगा. यह व्यवस्था NATO के आर्टिकल 5 के सिद्धांत से मिलती-जुलती है. तुर्किये के रक्षा मंत्री ने भी इसे तकनीकी तौर पर NATO आर्टिकल 5 के समान बताया था.

हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि अभी से ही इसे नॉटो जैसा बताना बेहद जल्दबाजी है. नॉटो के पास दशकों पुरानी साझा सैन्य कमांड , संयुक्त कमांड स्ट्रक्चर, स्थायी सैन्य योजनाएं और बड़े पैमाने पर साझा ऑपरेशनल सिस्टम हैं. मक्का समझौता अभी उस स्तर पर नहीं पहुंचा है.लेकिन सचिवालय बनने के बाद से यह केवल कागजी समझौता नहीं रह जाएगा.

सऊदी अरब में स्थाई सचिवालय का क्या होगा काम?

एक्सपर्ट्स का यह भी कहना था कि तीनों देशों के बीच के सैन्य सहयोग का चलाने के लिए एक स्थाई संस्थागत केंद्र की जरूरत थी. अब यह काम सऊदी अरब में बनने वाला सचिवालय करेगा.इसे तीन देशों के बीच कोऑर्डिनेशन हब की तरह समझ सकते हैं. यहां तीनों देश के रक्षा मंत्रालयों के बीच कोऑर्डिनेशन को लेकर प्लान तैयार होंगे. संयुक्त सैन्य गतिविधियों की योजना बनेगी. तीनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच संपर्क व्यवस्था मजबूत होगी. हथियार, रक्षा तकनीक और उत्पादन में सहयोग आगे बढ़ाया जा सकेगा.

क्या इस सैन्य गठजोड़ में अन्य देश भी शामिल हो सकते हैं?

तीनों देश जरूरत पड़ने पर यहां से सामूहिक प्रतिक्रिया के लिए राजनीतिक और सैन्य विकल्पों पर काम कर सकेंगे. 31 अगस्त की पहली रणनीतिक बैठक में रक्षा सहयोग, सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने, इंटरऑपरेबिलिटी और रक्षा तकनीक व उत्पादन में सहयोग जैसे मुद्दे पर तीनों देशों के बीच चर्चा हुई. इस बीच तुर्किए ने यह भी संकेत दिया है यह ढांचा आगे दूसरे मुस्लिम देशों के लिए भी खुल सकता है.

क्या पाकिस्तान के इशारे पर चलेंगे तुर्किए और सऊदी?

यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा.पाकिस्तान को पूरे गठबंधन की स्थायी सैन्य कमान नहीं मिली है. अभी जो तय हुआ है, वह सचिवालय के नेतृत्व से जुड़ा है. संयुक्त बयान के मुताबिक शुरुआती तीन साल सचिवालय का महासचिव पाकिस्तान से होगा. इसका मतलब यह भी नहीं है कि सऊदी या तुर्किए की सेना सीधे पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख के आदेश पर चलेगी.किसी वास्तविक सैन्य ऑपरेशन के लिए तीनों देशों की अपनी-अपनी कमांड संरचना और राजनीतिक मंजूरी सबसे अहम होगी.इस गठजोड़ की असली परीक्षा किसी बयान या बैठक में नहीं, बल्कि पहले बड़े सुरक्षा संकट में होगी.

क्या ईरान-अमेरिका के बीच सैन्य तनाव के वजह से बना गठजोड़?

क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव और खाड़ी देशों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी हुई है. ऐसे माहौल में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये का सामूहिक सैन्य गठजोड़ बनाना क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है.हालांकि समझौते में किसी एक देश को आधिकारिक तौर पर दुश्मन घोषित नहीं किया गया है. लेकिन सवाल यह भी है कि ईरान से जुड़े किसी बड़े सैन्य संकट की स्थिति में यह गठबंधन किस तरह प्रतिक्रिया देता है.

भारत के लिए इसका क्या मतलब?

भारत के लिए सबसे अहम बात पाकिस्तान की भूमिका है. पाकिस्तान इस सैन्य गठजोड़ का तीन साल नेतृत्व करेगा. ऐसे में भारत की इसपर नजर रहेगी कि यह गठजोड़ केवल पश्चिम एशिया की सुरक्षा तक सीमित रहता है या आगे चलकर दक्षिण एशिया के सुरक्षा मुद्दों को भी प्रभावित करता है. ऐसे में पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब की बढ़ती रणनीतिक नजदीकी को भारत निश्चित तौर पर करीब से देखेगा.

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