Updated On: Aug 08, 2026 | 10:01 AM IST

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सार

Parliament Opposition Debate: संसद में नेताओं की गैरमौजूदगी और राजनीतिक दलबदल के मुद्दे पर ‘निशानेबाज’ ने व्यंग्य के जरिए सियासत में बढ़ते अवसरवाद पर तंज कसा है।

Navabharat Nishanebaaz: The net cast by a strengthening opposition is tightening; whether one turns one's face or one's back.

(सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)

विस्तार

Political Defection Satirical Commentary: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने ज्वलंत मुद्दा उठाया है कि 15 दिनों से प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह सदन से गायब हैं। ऐसे में छात्रों से की गई बर्बरता का हिसाब कौन देगा? आप भी सोचकर बताइए कि क्या आबादी के लिहाज से विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के इन शीर्ष नेताओं का संसद की ओर से पीठ फेर लेना उचित है?’

हमने कहा, ‘कोई मुंह फेरे या पीठ फेरे, आपको क्या लेना-देना! कभी कोई अपने मतलब के लिए मुखातिब होता है तो कभी देखते ही मुंह फेर लेता है। आपने राजकपूर व नरगिस की पुरानी फिल्म ‘आवारा’ का गीत सुना होगा- दम भर जो उधर मुंह फेरे ओ चंदा आ-आ-आ, मैं उनसे प्यार कर लूंगी, बातें हजार कर लूंगी !’

पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, हम मुंह की नहीं पीठ फेरने की बात कर रहे हैं। उसके संबंध में कुछ बताइए, राजनीति में हम देख रहे हैं कि नेता एक पार्टी की टिकट पर चुनकर आते हैं और मतदाताओं से पीठ फिराकर दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं। अवसरवादी लोगों की नीति होती है- जैसी बहे बयार, पीठ पुनि तैसी कीजे !’

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हमने कहा, ‘बड़ी अदालत में खंडपीठ, पूर्ण पीठ और संविधान पीठ होती है। किसी शातिर अपराधी की पीठ पर बड़े नेता का हाथ होता है। गरीब का पेट हमेशा उसकी पीठ से लगा होता है। इंसान के लिए सबसे कठिन काम नहाते समय अपनी पीठ पर साबुन लगाना होता है। फैशन शो में मॉडेल अपनी पीठ खुली रखती हैं। जब किसी पर अन्याय होता है तो वह कहता है-पीठ पर मारो, पेट पर मत मारो! किसी को शाबासी या प्रोत्साहन देने के लिए उसकी पीठ पर हाथ फेरा जाता है। जिगरी दोस्ती में यार-दोस्त एक-दूसरे की पीठ पर धौलधप्पा जमा कर कहते हैं।

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कहां चला गया था इतने दिन, अब मिलने आया है। बहादुर लोग दुश्मन को पीठ नहीं दिखाते जबकि विश्वासघाती हमेशा पीठ में छुरा घोंपता है। आम जनता अपनी पीठ पर बढ़े हुए टैक्स और महंगाई का बोझ ढोती है। जिन कर्मचारियों की पीठ मजबूत होती है उन पर मालिक गधे जैसा बोझ लाद देता है। बेईमान नेता व्यासपीठ पर खड़े होकर जनता को ईमानदारी बरतने का भाषण देते हैं।’

पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, आपने अपने मन की बात कह दी। अब हम भी यहां से पीठ फिराकर खिसकते हैं।’

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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