Updated On: Jul 27, 2026 | 09:19 AM IST
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सार
Power Politics Humor: पद की चाह और संगठन की सेवा के बीच का व्यंग्यात्मक सच। कार्यकर्ता की पीड़ा, सत्ता की राजनीति और 'लाभ के पद' की लालसा पर तीखा कटाक्ष।

(सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
विस्तार
Political Posts Satire Column: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, हमें कोई अच्छा सा पद हासिल करने की इच्छा है। इसके लिए कोई फॉर्मूला बताइए।’ हमने कहा, ‘पार्टी की सेवा कीजिए, नींव के पत्थर बन जाइए लेकिन पद की लालसा मत कीजिए। देश में नेता बहुत हैं। अच्छे, निस्वार्थी और आत्मार्पित कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, हम पहले ही कई वर्षों से कार्यकर्ता बने हुए हैं। आज तक हमें कोई बढ़िया पद नहीं मिला। सेवा हम करते हैं, मेवा दूसरे लोग खाते हैं।’ हमने कहा, ‘आपको कैसा पद चाहिए। शिक्षामंत्री बनेंगे तो 5 साल भी पूरे नहीं कर पाएंगे। कोई आंदोलन आपकी बलि ले लेगा। कोई भी पद स्थायी नहीं है।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, हमें आप लाभ का पद दिलाइए जिसमें पांचों ऊंगलियां घी में रहें।’
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हमने कहा, ‘पुलिस, एक्साइज, आरटीओ, इनकम टैक्स जैसे विभाग में नौकरी पा लीजिए नहीं तो चुंगी के दरोगा बन जाइए। मालामाल हो जाएंगे।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, हमें नौकरी नहीं करनी है। नेतागिरी की लाइन सबसे अच्छी है। ठेके में मोटा कमीशन लेकर नेशन की सेवा करेंगे। जो लोग हमारे सामने समस्या लेकर आएंगे, उन्हें आश्वासन की पुड़िया बांटेंगे। उनके पैसों पर दिल्ली मुंबई घूम आएंगे।’
हमने कहा, ‘सभी जानते हैं कि आप निठल्ले लोगों को खादी का कुर्ता-पायजामा पहनाकर किसी बड़े नेता के पास अपना समर्थक बनाकर पेश करते हैं। काम दो कौड़ी का नहीं करते लेकिन अपने आडंबर की खबर पेपर में छपवा लेते हैं। पिछले दिनों आपने वृद्धाश्रम चलाने का ठेका लिया जिसकी ग्रैंट आने लगी। जब अधिकारी निरीक्षण करने आए तो दिखाने के लिए आपने झोपड़ा बस्ती के कुछ बूढ़ों को वहां लाकर बिठा दिया।’
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पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, यह छोटे-मोटे हथकंडे हैं। ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती। हमें कोई बड़ा पद चाहिए ताकि मजे से घोटाला कर सकें।’
हमने कहा, ‘यह सब भाग्य की बात है। समय से पहले और किस्मत से ज्यादा किसी को नहीं मिलता।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, यह तो लोगों को बहलाने की बात है। लोग पद पाने के लिए कितनी ही तिकड़म करते हैं। जमाना ऐसा है कि घोड़ों को नहीं मिलती घास और गधे खा रहे च्यवनप्राश! अब हमसे रहा नहीं जाता। हमें किसी सत्ता के दलाल से मिलवा दीजिए। एक बार कोई मामूली पद भी मिल जाए तो हम उसे ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बनाकर भरपूर कमाई कर लेंगे। नेता बनकर निश्चित रूप से करोड़पति बन जाएंगे।’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
