नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी एनएसई से जुड़े चर्चित को-लोकेशन मामले में एनएसई की पूर्व प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी चित्रा रामकृष्ण को सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल राहत नहीं मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत चल रही कार्यवाही में दखल देने से इनकार कर दिया है. यानी उनके खिलाफ मुकदमे की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि चित्रा रामकृष्ण का यह सवाल कि एनएसई जैसे निजी संस्थान के अधिकारी को भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत लोक सेवक माना जा सकता है या नहीं, निचली अदालत के सामने उठाया जा सकता है. अदालत ने इस मुद्दे पर फिलहाल कोई अंतिम राय नहीं दी है.

क्या है एनएसई का को-लोकेशन मामला? 

यह मामला शेयर बाजार में इस्तेमाल होने वाली को-लोकेशन व्यवस्था से जुड़ा है. केंद्रीय जांच ब्यूरो के मुताबिक, साल 2010 से 2014 के बीच कुछ चुनिंदा शेयर दलालों को एनएसई के कारोबार वाले सर्वरों तक कथित तौर पर दूसरों की तुलना में बेहतर और तेज पहुंच हासिल थी.

को-लोकेशन व्यवस्था में शेयर दलालों के सर्वर एनएसई के कारोबार वाले सर्वर के नजदीक लगाए जाते हैं. इसका मकसद कारोबार के आदेशों को तेजी से भेजना होता है. शेयर बाजार में कुछ सेकेंड या उससे भी कम समय का अंतर कारोबार पर असर डाल सकता है. इसलिए इस व्यवस्था में सभी कारोबारियों को बराबर मौका मिलना बेहद जरूरी माना जाता है.

जांच एजेंसी का आरोप है कि इस व्यवस्था का फायदा कुछ चुनिंदा दलालों को मिला. आरोप यह भी है कि उन्हें बाजार से जुड़ी जानकारी तक दूसरे कारोबारियों की तुलना में पहले पहुंच मिल सकती थी. मामले की जांच आगे बढ़ने पर एनएसई के कई पूर्व अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आई.

 चित्रा रामकृष्ण पर क्या सवाल उठे? 

चित्रा रामकृष्ण उस समय एनएसई की शीर्ष अधिकारी थीं. जांच के दौरान उनकी भूमिका को लेकर भी सवाल उठे और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत कार्रवाई की गई.

रामकृष्ण की ओर से अदालत में मुख्य दलील यह रही कि एनएसई एक निजी कंपनी है. ऐसे में उसके अधिकारी भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत लोक सेवक की श्रेणी में कैसे आ सकते हैं. उनका कहना था कि इस कानून के तहत कार्रवाई के लिए यह जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति सार्वजनिक कर्तव्य निभा रहा हो.

उनकी ओर से यह भी कहा गया कि एनएसई कोई सरकारी विभाग नहीं है और उसके अधिकारी सरकारी कर्मचारी नहीं हैं. ऐसे में भ्रष्टाचार निवारण कानून को उनके मामले में लागू नहीं किया जाना चाहिए.

 दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या कहा था? 

यही सवाल पहले दिल्ली हाईकोर्ट के सामने भी उठा था. हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया.अदालत ने माना कि केवल एनएसई के निजी संस्था होने के आधार पर उसके अधिकारियों को भ्रष्टाचार निवारण कानून के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता.

अदालत ने एनएसई की शेयर बाजार में भूमिका और उसके काम से जुड़े व्यापक सार्वजनिक हित को भी ध्यान में रखा. हालांकि हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा था कि चित्रा रामकृष्ण के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित हो गए हैं.अदालत का फैसला केवल इस बात तक सीमित था कि उनके खिलाफ अभियोजन को शुरुआती स्तर पर नहीं रोका जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ? 

दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चित्रा रामकृष्ण ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. वहां भी उनकी ओर से यही सवाल उठाया गया कि एनएसई के अधिकारी भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत लोक सेवक नहीं माने जा सकते. सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि चित्रा रामकृष्ण अपने पद पर रहते हुए सार्वजनिक कर्तव्य निभा रही थीं या नहीं, यह सवाल मुकदमे की सुनवाई के दौरान निचली अदालत के सामने उठाया जा सकता है. इसका मतलब यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने चित्रा रामकृष्ण को दोषी नहीं ठहराया है. अदालत ने सिर्फ उनके खिलाफ चल रही कानूनी प्रक्रिया को रोकने से इनकार किया है.

आरोपों पर अंतिम फैसला अभी बाकी 

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का मतलब यह नहीं है कि चित्रा रामकृष्ण के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित हो गए हैं. आरोपों की सच्चाई का फैसला मुकदमे के दौरान पेश किए जाने वाले दस्तावेजों, गवाहों और दूसरे सबूतों के आधार पर होगा. बचाव पक्ष को भी अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिलेगा. इसके बाद ही अदालत यह तय करेगी कि आरोप साबित होते हैं या नहीं.

क्यों अहम है यह मामला? 

एनएसई देश के प्रमुख शेयर बाजारों में शामिल है. ऐसे में उसके कामकाज में पारदर्शिता और वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही का मुद्दा काफी अहम है. इस मामले में बड़ा सवाल यही है कि निजी संस्था में काम करने वाला अधिकारी किन परिस्थितियों में सार्वजनिक कर्तव्य निभाने वाला व्यक्ति माना जा सकता है. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने चित्रा रामकृष्ण के खिलाफ कार्रवाई रोकने से इनकार किया है. अब मामले में को-लोकेशन व्यवस्था, अधिकारियों की भूमिका और जांच एजेंसी के सबूतों पर आगे सुनवाई होगी. आरोप सही हैं या नहीं, इसका अंतिम फैसला अभी होना बाकी है.