अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी वर्चस्व की जंग में नया और हैरान करने वाला खुलासा हुआ है. वाशिंगटन स्थित जेम्सटाउन फाउंडेशन और न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की स्पेशल रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी मिलिट्री के रिसर्चर्स अपने डिफेंस सिस्टम को हाईटेक बनाने के लिए टॉप अमेरिकी AI मॉडल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं.

चीनी की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) और उससे जुड़े सैन्य संस्थान मॉडल डिस्टिलेशन नाम की तकनीक के जरिए अमेरिकी AI के दिमाग (रीजनिंग) को चुराकर अपने छोटे, स्थानीय और सुरक्षित सैन्य सिस्टम में ट्रांसफर कर रहे हैं. चीनी रक्षा संस्थान अमेरिकी AI मॉडल्स को अपनी तकनीकी कमियों को दूर करने और अमेरिकी प्रतिद्वंद्वियों की बराबरी करने के एक अहम सोर्स के तौर पर देख रहे हैं. आइए चीन की इस तरकीब को विस्तार से समझते हैं…

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क्या है मॉडल डिस्टिलेशन तकनीक?

AI की दुनिया में मॉडल डिस्टिलेशन व्यापक तौर पर इस्तेमाल होने वाली तकनीक है. इसमेंबहुत ही शक्तिशाली और बड़े AI सिस्टम (जैसे ChatGPT) के आउटपुट का इस्तेमाल करके एक छोटे और स्पेशल मॉडल को ट्रेन किया जाता है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इस छोटे मॉडल को चलाने के लिए भारी-भरकम कंप्यूटर या विशाल प्रोसेसिंग पावर की जरूरत नहीं पड़ती. इसे लोकल नेटवर्क पर भी तैनात किया जा सकता है.

PLA के सीक्रेट प्रोजेक्ट्स और खुलासे

जेम्सटाउन फाउंडेशन के फेलो सनी चेउंग ने 60 से ज्यादा चीनी रिसर्च पेपर्स का एनालिसिस किया है. उनका कहना है, किसी मॉडल को सही उत्तर सिखाना एक बात है, लेकिन उस उत्तर के पीछे का तर्क सिखाना बहुत मुश्किल है. चीनी मिलिट्री रिसर्चर्स पश्चिमी AI मॉडल्स की उस महंगी और मालिकाना तर्क क्षमता को अपने छोटे सिस्टम में ट्रांसफर कर रहे हैं. इसका इस्तेमाल साइबर वॉर, निगरानी और युद्ध के मैदान में रणनीतिक फैसले लेने के लिए किया जा रहा है. रॉयटर्स ने ऐसे दो दर्जन से अधिक सैन्य मामलों की पुष्टि की है.

  • यूनिट 96941 (साइबर-वॉरफेयर): बीजिंग स्थित PLA की इस यूनिट ने पिछले साल पब्लिश एक पेपर में बताया कि उन्होंने संवेदनशील सैन्य कोड को प्रोसेस करने के लिए OpenAI के GPT-3.5 का इस्तेमाल किया. सुरक्षा कारणों से वे सीक्रेट डेटा थर्ड-पार्टी को नहीं दे सकते थे. इसलिए, उन्होंने सॉफ्टवेयर कोड की समरी (सारांश) बनाने के लिए GPT-3.5 का उपयोग किया और फिर उन समरी के आधार पर अपना एक घरेलू AI मॉडल तैयार किया, जो पूरी तरह से चीन के बंद सैन्य नेटवर्क के भीतर काम करता है.
  • नॉर्थ यूनिवर्सिटी ऑफ चाइना: देश की हथियार इंडस्ट्री से जुड़ी इस यूनिवर्सिटी ने सोशल मीडिया की निगरानी और कंटेंट मॉडरेशन’ के लिए डेटा तैयार करने में एंथ्रोपिक के ‘क्लॉड 3 हाइकू’ का इस्तेमाल किया. एंथ्रोपिक का कहना है वह चीन में कमर्शियल एक्सेस नहीं देता और डिस्टिल्ड मॉडल्स में कंपनी के सेफ्टी गार्ड्स काम नहीं करते हैं.
  • नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेक्नोलॉजी: PLA की इस यूनिवर्सिटी ने 2024 के एक शोध में बताया कि उन्होंने मॉडल डिस्टिलेशन के जरिए एक इमेज-प्रोसेसिंग मॉडल को इतना छोटा कर दिया कि उसे ड्रोन्स (UAVs) में लगाया जा सके. इससे ड्रोन कम्युनिकेशन टूटने पर भी लाइव वीडियो का एनालिसिस कर सकते हैं, साथ ही रियल-टाइम नेविगेशन औऱ टारगेट तय कर सकते हैं.
  • एकेडमी ऑफ मिलिट्री साइंसेज: इस संस्था ने समुद्री ऑपरेशन्स (ड्रोन, जहाज और मानव रहित पनडुब्बियों) के दौरान टारगेट को पहचानने वाले मॉडल के लिए इस तकनीक का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया.

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अमेरिका और चीन के बीच नया विवाद

अमेरिका और चीन के बीच AI को लेकर नया विवाद शुरू हो गया है. मामला मॉडल डिस्टिलेशन तकनीक का नहीं, बल्कि इस बात का है कि क्या चीन बिना अनुमति अमेरिकी AI मॉडल्स की क्षमताओं का इस्तेमाल कर रहा है. अमेरिका का आरोप है कि चीन अमेरिकी AI मॉडल्स से जानकारी लेकर अपने सिस्टम तैयार कर रहा है, जिससे निर्यात नियमों और इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स का उल्लंघन हो रहा है.

वहीं, चीन ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है. चीन का कहना है कि अमेरिका AI के क्षेत्र में अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है और दूसरे देशों की प्रगति रोक रहा है. चीनी AI कंपनियां भी विदेशी मॉडल्स पर निर्भर होने से इनकार करती हैं. हाल ही में चीनी स्टार्टअप Moonshot ने भी ट्रंप प्रशासन के उस दावे को गलत बताया, जिसमें कहा गया था कि उसका Kimi K3 मॉडल अमेरिकी AI मॉडल्स की डिस्टिलेशन से बनाया गया है. कंपनी का कहना है कि यह पूरी तरह उसका अपना विकसित किया गया मॉडल है.

फायदे, सीमाएं और सुरक्षा का खतरा

अमेरिकी सरकार द्वारा हाई-एंड चिप्स के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के कारण चीन के पास हाईटेक कंप्यूटिंग पावर की कमी है. इस कमी को दूर करने के लिए मॉडल डिस्टिलेशन चीन के लिए संजीवनी बन गया है हालांकि चीनी सेना इसके जोखिमों को भी समझती है. जनवरी में आर्मी इंजीनियरिंग यूनिवर्सिटी ने डेटा-फ्री डिस्टिलेशन के खतरे पर एक पेपर पब्लिश किया, जिसमें बताया गया कि कैसे कोई बिना सीधे एक्सेस के मॉडल को रिवर्स-इंजीनियर कर सकता है.

अमेरिका ने बीते कुछ सालों में एनवीडिया और AMD जैसी कंपनियों के हाइटेक AI चिप्स (जैसे H100 और A100 GPU) के चीन निर्यात पर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया है. इन चिप्स के बिना बड़े AI सिस्टम को शून्य से बनाना लगभग असंभव है. यही कारण है कि चीन ने शॉर्टकट के तौर पर अमेरिकी AI मॉडल्स के रिस्पॉन्स डेटा का इस्तेमाल करके अपने घरेलू मॉडल्स को ट्रेन करने की यह राह पकड़ी है, जिससे कम कंप्यूटिंग पावर में भी बेहतरीन नतीजे मिल सकें.

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शुभेंदु प्रताप भूमंडल

शुभेंदु प्रताप भूमंडल

पत्रकारिता में बीते 5 साल से सक्रिय हैं. नेशनल और इंटरनेशनल न्यूज राइटिंग का अनुभव. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से साइंस में ग्रेजुएशन, फिर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता और वीडियो प्रोडक्शन की पढ़ाई. दैनिक भास्कर डिजिटल से करियर की शुरुआत. बतौर न्यूज ब्रीफ एडिटर भास्कर डिजिटल में 800 से ज्यादा बाइलाइन स्टोरी. वीडियो स्क्रिप्टिंग का भी अनुभव. अगस्त 2025 से टीवी9 डिजिटल के साथ नई पारी का आगाज.

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