What is PDO: गुजरात में इन दिनों मॉनसून ने अपना बेहद विकराल और भयावह रूप दिखाया है. राज्य के कई हिस्सों में सामान्य बारिश नहीं, बल्कि भारी तबाही मचाने वाली आफत बरस रही है. सिर्फ 14 घंटों के भीतर ही राज्य के कई इलाकों में 400 मिलीमीटर से भी ज्यादा पानी बरस चुका है. नवसारी के चिखली में 451 मिलीमीटर, अहमदाबाद के ढोलका में 440 मिलीमीटर, खेरगाम में 431 मिलीमीटर, सूरत के उमरपाडा में 405 मिलीमीटर और वलसाड के उमरगांव में 365 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है. इन आंकड़ों से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि बारिश की रफ्तार कितनी खतरनाक रही है.
इस मूसलाधार बारिश के चलते नदियां अपने उफान पर हैं और आसपास के इलाकों को डुबो रही हैं. मुख्य सड़कें पूरी तरह जलमग्न हो चुकी हैं, जिससे यातायात ठप्प पड़ गया है. किसानों के लहलहाते खेत पानी में डूबकर बर्बाद हो चुके हैं. आम जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया है और लोग अपने घरों में रहने को मजबूर हैं. यह बारिश आम मॉनसून के मौसम से कहीं ज्यादा तीव्र, खतरनाक और विनाशकारी साबित हो रही है. इस अचानक आई तबाही के बीच अब मौसम वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और सोशल मीडिया पर एक नई बहस छिड़ गई है.
/filters:format(webp)/newsnation/media/media_files/2026/07/24/imd-gujarat-2026-07-24-18-39-46.jpg)
सूखे की भविष्यवाणी और जमीनी हकीकत
दरअसल, कुछ महीनों पहले तक अल-नीनो का इतना ज्यादा खौफ खड़ा किया गया था कि पूरे देश के लोग सूखे की आशंका से बुरी तरह डर गए थे. देश के मौसम फॉरकास्टर से लेकर बड़ी अमेरिकी वैज्ञानिक संस्थाओं ने कंप्यूटर मॉडल रन करके भारत में सूखा पड़ने की पक्की भविष्यवाणी की थी. हालांकि, जमीनी हकीकत इन भविष्यवाणियों के बिल्कुल उलटी निकली है. मॉनसून ने न केवल सामान्य बारिश दी, बल्कि गुजरात समेत कई राज्यों में अत्यधिक बारिश से तबाही मचा दी. अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने पैसिफिक डिकेडल ऑसीलेशन यानी पीडीओ को इतना कम क्यों आंका.
क्या है पैसिफिक डिकेडल ऑसीलेशन यानी पीडीओ?
पैसिफिक डिकेडल ऑसीलेशन यानी पीडीओ वास्तव में प्रशांत महासागर में समुद्र के सतही तापमान में होने वाले लंबे समय के बदलाव का एक बड़ा पैटर्न है. यह एक दशकीय चक्र है जो लगभग 20 से 30 साल के लंबे अंतराल में चलता है. यह अल-नीनो और ला-नीना जैसा ही एक समुद्री बदलाव है, लेकिन इसका समय चक्र इनसे बहुत ज्यादा लंबा होता है. अल-नीनो और ला-नीना का असर कुछ महीनों से लेकर दो साल तक रहता है, जबकि पीडीओ दशकों तक अपना असर पूरी दुनिया के मौसम पर बनाए रखता है.
पीडीओ के दो मुख्य रूप होते हैं, जिन्हें पॉजिटिव और नेगेटिव कहा जाता है. पॉजिटिव रूप में उत्तर पूर्वी प्रशांत महासागर के तट के पास का पानी काफी गर्म हो जाता है और मध्य उत्तर प्रशांत हिस्सा ठंडा रहता है. नेगेटिव रूप में बिल्कुल इसके उलटा पैटर्न देखने को मिलता है, जहां उत्तर पूर्वी तट ठंडा और मध्य भाग अपेक्षाकृत ज्यादा गर्म रहता है. वर्तमान में पीडीओ बहुत ही मजबूत नेगेटिव रूप में चल रहा है, जिसकी वैल्यू काफी ज्यादा दर्ज की गई है.
/filters:format(webp)/newsnation/media/media_files/2026/07/24/gujarat-flood-2026-07-24-18-45-47.jpg)
भारत के मॉनसून पर पीडीओ का सीधा असर
यह बदलाव केवल समुद्र का तापमान ही नहीं बदलता, बल्कि हवा के दबाव, हवाओं की दिशा और पूरे वैश्विक मौसम चक्र को बहुत गहराई से प्रभावित करता है. भारत के मॉनसून के साथ भी इसका बहुत ही गहरा और सीधा संबंध माना जाता है. वैज्ञानिक अध्ययनों से यह बात साफ साबित होती है कि नेगेटिव पीडीओ हमेशा भारतीय मॉनसून को बहुत ज्यादा मजबूत बनाता है. इसमें भारत के ऊपर नमी से भरी समुद्री हवाओं का बहाव बहुत बेहतर हो जाता है.
यह पश्चिमी प्रशांत और हिंद महासागर से बहुत ज्यादा नमी खींचकर मॉनसून को बेहद मजबूत कर देता है. इसका सीधा नतीजा यह निकलता है कि देश में सामान्य से काफी ज्यादा और कुछ इलाकों में अत्यधिक भारी बारिश होती है. इसके ठीक विपरीत, पॉजिटिव पीडीओ अक्सर भारत में कमजोर मॉनसून और सूखे जैसी भयावह स्थिति पैदा करता है. पिछले कुछ दशकों के रिकॉर्ड को देखें तो नेगेटिव पीडीओ के समय में भारत में हमेशा ज्यादा बारिश दर्ज की गई है.
गुजरात में तबाही का असली वैज्ञानिक कारण
गुजरात में हुई भारी बारिश एक अकेली घटना नहीं बल्कि बड़े मौसम चक्र का हिस्सा है. नेगेटिव पीडीओ ने मॉनसून को दक्षिण की ओर शिफ्ट होने में मदद की, जिससे अरब सागर से लगातार नमी आती रही. गुजरात के चिखली और उमरगांव जैसे इलाके भौगोलिक रूप से ऐसे हैं जहां पहाड़ी क्षेत्र और समुद्र की निकटता भारी बारिश को और बढ़ा देती है. 24 घंटे में 400 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश होना सामान्य बात नहीं है. यह एक चरम मौसमी घटना है जो जलवायु परिवर्तन के इस दौर में अब ज्यादा देखने को मिल रही है.
मौसम पूर्वानुमान में केवल अल-नीनो पर निर्भर रहना सही नहीं है. पीडीओ, हिंद महासागर के बदलाव और अटलांटिक महासागर के पैटर्न जैसे दूसरे कारणों को भी बराबर महत्व देना बहुत जरूरी है. किसानों, प्रशासन और आम लोगों को भी इन बड़े पैटर्न की जानकारी होनी चाहिए. अगर पीडीओ नेगेटिव बना रहता है, तो आने वाले सालों में भी भारी बारिश और बाढ़ की संभावना बनी रहेगी.
यह भी पढ़ें: गुजरात में बाढ़ का कहर! पानी में डूबे घर, पंचायत, पेट्रोल पंप, 67 लोगों का किया रेस्क्यू