एक ही मिट्टी, दो तकदीरें: जम्मू-कश्मीर बना ‘सेब की टोकरी’, PoJK में ‘आटे की मारामारी’

जम्मू कश्मीर बनाम पीओजेके.

नियंत्रण रेखा के इस पार जम्मू-कश्मीर देश के 70 प्रतिशत से अधिक सेब उगाता है और खेती में करोड़ों रुपये लगा रहा है. उस पार पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) अपनी रोटी के लिए भी इस्लामाबाद का मुंह ताकता है, और आटे के दाम बार-बार लोगों को सड़कों पर उतार देते हैं. 2024-25 में कश्मीर की मंडियों ने 6.37 लाख टन फल देश के दूसरे राज्यों में भेजे. उसी वर्ष मई में पीओजेके के लोग आटे और बिजली के बढ़ते दामों के विरोध में सड़कों पर उतरे.

मुजफ्फराबाद में पाकिस्तानी रेंजर्स ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं और तीन लोगों को मार डाला. एक ओर खेत और उद्यान समृद्धि बांट रहे हैं, दूसरी ओर परिवार दो जून की रोटी के लिए जूझ रहे हैं.

देश की सेब की टोकरी

जम्मू-कश्मीर देश के कुल सेब उत्पादन में 70 प्रतिशत से अधिक योगदान देता है. प्रदेश ने 2022-23 से 2024-25 तक हर वर्ष 20 लाख टन से अधिक सेब उगाए और तीन वर्षों में लगभग 62 लाख टन की उपज ली. बागवानी लगभग सात लाख परिवारों और 35 लाख लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आजीविका देती है.

प्रदेश का कुल फल उत्पादन 2024-25 में 26.92 लाख टन तक पहुंचा, और सरकार ने 2029-30 तक इसे 29.72 लाख टन तक ले जाने का लक्ष्य रखा है. किसानों ने 18,533 हेक्टेयर में उच्च और मध्यम घनत्व वाले उद्यान विकसित किए हैं.

खेती में निवेश, गांवों में आजीविका

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 2024 में 5,013 करोड़ रुपये का समग्र कृषि विकास कार्यक्रम आरंभ किया. इसकी 29 परियोजनाओं के अंतर्गत किसानों ने दो वर्ष से कम समय में 92,000 से अधिक इकाइयां स्थापित कीं. 3.7 लाख से अधिक किसानों ने इसमें पंजीकरण कराया, और इन इकाइयों ने 1.9 करोड़ मानव-दिवस का काम दिया. सरकार इस कार्यक्रम से 2.88 लाख लोगों को काम और लगभग 19,000 उद्यम खड़े करने का लक्ष्य रखती है.

केंद्र सरकार भी किसानों के साथ खड़ी है. 2024-25 में पीएम-किसान योजना ने 9.19 लाख किसानों को 3,907.49 करोड़ रुपये दिए. प्रदेश सरकार ने 2026-27 के बजट में कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के लिए 1,878 करोड़ रुपये रखे. पिछले वर्ष प्रदेश ने 21.18 लाख टन खाद्यान्न उगाया.

पीओजेके: प्यासे खेत, सूने भंडार

पीओजेके की अपनी सांख्यिकीय पुस्तिका ठीक उलटा चित्र प्रस्तुत करती है. क्षेत्र की 1,95,613 हेक्टेयर कृषि भूमि में से केवल 24,984 हेक्टेयर सिंचित है, अर्थात लगभग 13 प्रतिशत। शेष 87 प्रतिशत खेत वर्षा के भरोसे हैं. पूरे क्षेत्र के सरकारी विभाग के पास केवल 48 ट्रैक्टर और 23 थ्रेशर हैं. पीओजेके ने 2024 में 1,54,022 टन गेहूं उगाया. उसके 43.89 लाख निवासियों के लिए यह उपज प्रति व्यक्ति वर्ष भर में लगभग 35 किलो बैठती है.

गेहूं, मक्का और धान मिलाकर भी क्षेत्र प्रति व्यक्ति लगभग 69 किलो अनाज ही उगाता है, जबकि जम्मू-कश्मीर अपने 1.39 करोड़ निवासियों के लिए प्रति व्यक्ति लगभग 152 किलो खाद्यान्न उगाता है. फिर भी पीओजेके के शासन ने 2024-25 में कृषि विकास पर केवल 21.24 करोड़ पाकिस्तानी रुपये रखे, जो उसके विकास कार्यक्रम का मात्र 0.76 प्रतिशत है.

आटे के लिए सड़कों पर

जनवरी 2023 में बाग और मुजफ्फराबाद में आटे का अभूतपूर्व संकट खड़ा हुआ, और सस्ते सरकारी गेहूं की आपूर्ति लगभग ठप हो गई. उसी वर्ष स्थानीय विधायक नसीरा अब्बासी ने स्वयं स्वीकार किया कि मुजफ्फराबाद को 10,000 टन गेहूं चाहिए, पर उसे केवल 3,000 टन मिलता है. सस्ते गेहूं की हेराफेरी के आरोपों के बीच पीओजेके के तत्कालीन तथाकथित प्रधानमंत्री चौधरी अनवारुल हक ने खाद्य सचिव को निलंबित किया.

मई 2024 तक आटे की 40 किलो की बोरी का दाम 3,100 रुपये तक पहुंच गया. जब लोगों ने पूरा क्षेत्र ठप कर दिया, तब इस्लामाबाद को 23 अरब रुपये देकर दाम 2,000 रुपये पर लाना पड़ा. जून 2026 में 20 दिन के बंद के बाद सरकारों को फिर आटे और बिजली के लिए 72 अरब रुपये का पैकेज घोषित करना पड़ा.

गिलगित-बाल्टिस्तान में भी वही भूख

जनवरी 2024 में गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों ने सस्ते गेहूं के दाम बढ़ाने के विरोध में लगातार 25 दिन तक प्रदर्शन किया. उन्होंने नगर घाटी में तीन स्थानों पर काराकोरम राजमार्ग रोका, पर क्षेत्र के खाद्य मंत्री ने बढ़े हुए दाम वापस लेना अस्वीकार कर दिया. जुलाई 2026 के अंतरिम बजट में क्षेत्र को केवल एक तिमाही के गेहूं अनुदान के लिए 15 अरब रुपये रखने पड़े.

एक ही धरती, दो भाग्य

शोपियां का किसान आज अपनी सेब की पेटियां देश भर की मंडियों में भेजता है, सरकारी सहायता पाता है और नई विधियों से उद्यान लगाता है. रावलाकोट का परिवार आज भी आटे की अगली बोरी की चिंता में दिन काटता है. भारत ने कश्मीर की उपजाऊ भूमि को समृद्धि का स्रोत बनाया, जबकि पाकिस्तान ने अपने अधिकृत क्षेत्र को सब्सिडी, घोटालों और गोलियों के भरोसे छोड़ दिया. जो भूमि अपना पेट नहीं भर पाती, वह अपना भविष्य भी नहीं संवार सकती.

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